Saturday, October 12, 2013

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुखौटा उतर चुका है

क़ुरबान अली
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुखौटा उतर चुका है। अपने आपको सांस्कृतिक संगठन कहने वाले भाजपा के जनक-संगठन ने पार्टी की बांह मरोड़ कर यह घोषित करवा लिया कि वह उसके चहेते नरेंद्र मोदी को आगामी लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए।
आखिर संघ ने लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और जसवंत सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी कर नरेंद्र मोदी को ही भाजपा के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कराने की जिद क्यों की, यह विचार का विषय है। इस पर चर्चा होनी चाहिए कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस देश में किस तरह की विचारधारा थोपना चाहता है और अगर उसके मन मुताबिक तरीके से नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी, जिस पर अब भी बहुत बड़ा सवालिया निशान लगा हुआ है, तो देश का संवैधानिक ढांचा क्या होगा? देश का संविधान क्या होगा? क्या उसका मूल स्वरूप यही होगा या उसमें परिवर्तन कर देश को लोकतांत्रिक समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के बजाय ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाया जाएगा, जिसमें केवल हिंदू धर्म के मानने वालों की श्रेष्ठता होगी और दूसरे धर्मों के लोग दूसरे दर्जे के नागरिक बन कर रहने को बाध्य होंगे। जहां जाति आधारित समाज की रचना होगी और मनुस्मृति के तहत देश का शासन चलाया जाएगा। जहां देश की राष्ट्र भाषा संस्कृत होगी और राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे की जगह भगवा होगा। जहां महिलाओं को कोई अधिकार नहीं होंगे और उन्हें मताधिकार भी नहीं होगा?
यह सर्वविदित है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 1857 में शुरू हुई आजादी की पहली लड़ाई से लेकर 1947 तक नब्बे सालों तक चले राष्ट्रीय आंदोलन को, उसके नेतृत्व को, उसकी विचारधारा को और उस आधार पर बने देश के संविधान को कभी स्वीकार नहीं किया। संघ और उसके आनुषंगिक संगठन राष्ट्रीय आंदोलन और नेता महात्मा गांधी से कितना बैर रखते थे, यह किसी से छिपा नहीं है। आजादी के बाद भी आरएसएस ने देश की संविधान सभा और उसके द्वारा निर्मित संविधान को कभी स्वीकार नहीं किया और लोकतांत्रिक व्यवस्था की हमेशा मुखालफत की। अपने को सांस्कृतिक संगठन कहने वाले और मुखौटा लगा कर पहले हिंदू महासभा, फिर भारतीय जनसंघ और 1980 से भारतीय जनता पार्टी के रूप में राजनीति करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की क्या विचारधारा है, इस पर गौर किया जाना जरूरी है।
संघ जिन्हें अपना पुरखा मानता है और स्वयंसेवक जिनके मानस पुत्र हैं, वे हैं विनायक दामोदर सावरकर, और संघ के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव (एमएस) गोलवलकर। सावरकर और जिन्ना के विचारों में गजब की समानता है। दोनों दो-राष्ट्रवाद के सिद्धांत को मानते थे और दोनों का कहना था कि हिंदू और मुसलमान दो अलग राष्ट्र हैं। इसके अलावा, हिटलर और गोलवलकर के विचारों में गजब की समानता है और अगर यह कहा जाए कि गुरुजी (गोलवलकर) हिटलर की विचारधारा से प्रभावित थे और उसे भारत में लागू करना चाहते थे तो गलत न होगा।
गुरुजी की एक किताब है ‘वी आॅर आॅवर नेशनहुड डिफाइंड’। 1947 में प्रकाशित इस किताब के चतुर्थ संस्करण में गुरुजी लिखते हैं, ‘हिंदुस्तान के सभी गैर-हिंदुओं को हिंदू संस्कृति और भाषा अपनानी होगी, हिंदू धर्म का आदर करना होगा और हिंदू जाति या संस्कृति के गौरव गान के अलावा कोई विचार अपने मन में नहीं रखना होगा।’ यानी उन्हें हिंदू राष्ट्र के अधीन होकर ही यहां रहने की इजाजत होगी, विशेष अधिकार की तो बात ही नहीं, उन्हें कोई भी लाभ नहीं मिलेगा।
इसी किताब के पृष्ठ 42 पर वे लिखते हैं कि ‘जर्मनी ने जाति और संस्कृति की विशुद्धता बनाए रखने के लिए सेमेटिक यहूदी जाति का सफाया कर पूरी दुनिया को स्तंभित कर दिया था। इससे जातीय गौरव के चरम रूप की झांकी मिलती है। जर्मनी ने यह भी दिखला दिया कि जड़ से जिन जातियों और संस्कृतियों में अंतर होता है उनका एक संयुक्त घर के रूप में विलय असंभव है।’ यह है आरएसएस की विचारधारा।
एक दूसरा नमूना इस विचारधारा का है गुरुजी की एक और किताब ‘बंच आॅफ थॉट्स’। इस किताब का एक संस्करण नवंबर 1966 में प्रकाशित हुआ है। इसमें गुरुजी ने देश में तीन आंतरिक खतरों की चर्चा की है: एक, मुसलमान; दूसरे, ईसाई और तीसरे, कम्युनिस्ट। ये सभी भारत के लिए खतरा हैं ऐसा गुरुजी मानते हैं। साथ ही वे वर्ण-व्यवस्था यानी जाति-व्यवस्था के भी प्रबल समर्थक हैं। वे लिखते हैं, ‘हमारे समाज की विशिष्टता थी वर्ण व्यवस्था, जिसे आज जाति व्यवस्था बता कर उसका उपहास किया जाता है। समाज की कल्पना सर्वशक्तिमान ईश्वर की चतुरंग अभिव्यक्ति के रूप में की गई थी जिसकी पूजा सभी को अपनी योग्यता और अपने ढंग से करनी चाहिए। ब्राह्मण को इसलिए महान माना जाता था, क्योंकि वह ज्ञान दान करता था। क्षत्रिय भी उतना ही महान माना जाता था, क्योंकि वह शत्रुओं का संहार करता था। वैश्य भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं था, क्योंकि वह कृषि और वाणिज्य के द्वारा समाज की आवश्यकताएं पूरी करता था और शूद्र भी जो अपने कला कौशल से समाज की सेवा करता था।’
इसमें बड़ी चालाकी से गुरुजी ने जोड़ दिया कि शूद्र अपने हुनर और कारीगरी से समाज की सेवा करते हैं। लेकिन इस किताब में गुरुजी ने चाणक्य के जिस ‘अर्थशास्त्र’ की तारीफ की है उसमें लिखा गया है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों की सेवा करना शूद्रों का सहज धर्म
है। सहज धर्म की जगह गुरुजी ने जोड़ दिया समाज की सेवा।
यों तो गुरु गोलवलकर लोकतांत्रिक प्रणाली और आम लोगों के मताधिकार के खिलाफ थे और उनका मानना था कि बालिग मताधिकार कुत्ते-बिल्लियों को देने जैसा है जिसके मिलने से वे आपस में ऐसे लड़ते-झगड़ते हैं जैसे कुत्ते-बिल्लियां। लेकिन वे महिलाओं को मताधिकार देने के तो सर्वथा खिलाफ थे। आरएसएस के मुखपत्र ‘आॅर्गेनाइजर’ के 30 जनवरी 1966 के अंक में प्रकाशित अपने एक लेख में गुरुजी लिखते हैं कि ‘अब यह साफ होता जा रहा है कि महिलाओं को मत देने का अधिकार देने का फैसला गलत और फिजूल था। एक हिंदू होने के नाते मैं यह मानने को मजबूर हूं कि हमारे लिए अभी और बुरे दिन आने वाले हैं। इतिहास गवाह है कि जब कहीं महिलाओं ने हुकूमत की है वहां अपराध, गैर-बराबरी और अराजकता इस तरह फैली है जिसका जिक्र नहीं किया जा सकता।’ साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि ‘महिला अगर विधवा हो और शासक हो जाए तो मुल्क की बदनसीबी शुरू हो जाती है।’
उल्लेखनीय है कि गुरुजी का यह लेख इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के एक सप्ताह बाद प्रकाशित हुआ था। श्रीमती गांधी उस समय देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनी थीं। इससे साबित होता है कि संघ और उसके गुरुजी महिलाओं के प्रति कितना आदर का भाव रखते थे।
आंबेडकर का कहना था कि ‘अगर इस देश में हिंदू राज समुचित हकीकत बन जाता है तो यह देश के लिए एक खौफनाक मुसीबत होगी, क्योंकि हिंदू राष्ट्र का सपना आजादी, बराबरी और भाईचारे के खिलाफ है, और यह लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों से मेल नहीं खाता और इसे हर हाल में रोका जाना चाहिए।’
चौथा मुद्दा है भाषा का। सारी लोक भाषाएं भारतीय हैं और हिंदी राष्ट्रभाषा। लेकिन गुरुजी का मानना है कि संस्कृत राष्ट्र भाषा होनी चाहिए। ‘बंच आॅफ थाट्स’ में वे लिखते है कि ‘संपर्क भाषा की समस्या के समाधान के रूप में जब तक संस्कृत स्थापित नहीं हो जाती तभी तक हिंदी को प्राथमिकता देनी चाहिए और अंतत: संस्कृत को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलना चाहिए।’
राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान संघ-राज्य की कल्पना को स्वीकार किया गया था, यानी केंद्र के जिम्मे कुछ निश्चित विषय होंगे। बाकी राज्यों के अंर्तगत होंगे। लेकिन आरएसएस और गोलवलकरजी ने हमेशा भारतीय संविधान के इस आधारभूत तत्त्व का विरोध किया। गुरुजी ‘बंच आॅफ थाट्स’ में लिखते हैं कि ‘संविधान का पुन: परीक्षण होना चाहिए और इसका पुनर्लेखन कर शासन की एकात्मक प्रणाली स्थापित की जानी चाहिए।’ यानी गुरुजी चाहते हैं कि केंद्र अनुगामी शासन। ये जो राज्य वगैरह हैं, खत्म होने चाहिए। उनकी कल्पना है, एक देश एक राज्य, एक विधायिका और एक कार्यप्रणाली और राज्यों के विधानमंडल, मंत्रिमंडल सब खत्म।
जिस तरह आरएसएस और गुरुजी संघ-राज्य की कल्पना को अस्वीकार करते हैं उसी तरह लोकतंत्र में भी उनका विश्वास नहीं है। उनका मानना है कि लोकतंत्र की कल्पना पश्चिम से आयात की हुई है और भारतीय विचार और संस्कृति के अनुकूल नहीं है। समाजवाद और कम्युनिज्म को तो गुरुजी पूरी तरह पराई चीज मानते हैं। वे लिखते हैं कि ‘यह जितने इज्म हैं यानी सेक्युलरिज्म, डेमोक्रेसी, सोशलिज्म, कम्युनिज्म, ये सब विदेशी धारणाएं हैं और इनका त्याग करके हमको भारतीय संस्कृति के आधार पर समाज की रचना करनी चाहिए।’
यानी ‘एकचालकानुवर्तित्व’ सिद्धांत। वे इस बात पर भी दुखी होते हैं कि देश आजाद हो जाने के बाद जमींदारी प्रथा का उन्मूलन कर दिया गया। सामाजिक न्याय और सामाजिक समानता के तो वे घोर विरोधी थे ही। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय झंडा था तिरंगा, तिरंगे की इज्जत और आन-बान-शान के लिए सैकड़ों लोगों ने अपनी जान कुर्बान की, लाखों लोगों ने तिरंगे को लेकर लाठियां खार्इं। लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कभी भी तिरंगे को राष्ट्रध्वज नहीं माना, वह तो भगवा ध्वज को ही मानता है और कहता है कि यही हिंदू राष्ट्र का प्राचीन झंडा है। वही उनका आदर्श और प्रतीक है।
राष्ट्रीय नेताओं ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में इस देश को एक ‘लोकतांत्रिक गणराज्य’ के रूप में स्थापित किया। उनमें सी राजगोपालाचारी के साथ-साथ पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद, डॉ राजेंद्र प्रसाद, डॉ भीमराव आंबेडकर, सरदार बलदेव सिंह और जॉन मथाई के अलावा श्यामाप्रसाद मुखर्जी भी शामिल थे। ये नेता चाहते तो 15 अगस्त 1947 को इस देश को हिंदू राष्ट्र घोषित कर सकते थे, क्योंकि मुसलिम लीग और उसके नेता मुहम्मद अली जिन्ना मुसलमानों के लिए अलग राष्ट्र (पाकिस्तान) हासिल कर चुके थे। लेकिन इन नेताओं ने सामूहिक रूप से प्रण लिया कि वे इस महान देश को पाकिस्तान नहीं बनने देंगे, बल्कि हिंदुस्तान ही बनाए रखेंगे और राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान उन्होंने देश की जनता से जो वादा किया था उसे पूरा करेंगे। यह स्वतंत्र भारत को सार्वभौम धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने का वादा था, जिसमें सभी नागरिकों को बराबरी और आजादी, अपने धर्म को मानने और पूजा-अर्चना करने और प्रचार करने की इजाजत और सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, भाईचारा और व्यक्ति की प्रतिष्ठा सुनिश्चित की गई थी।

2 comments:

  1. सराहनीय प्रस्तुति .हार्दिक आभार

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  2. सिकंदर हयातNovember 15, 2013 at 10:36 PM

    भड़ास पर मेहरुद्दीन खान साहब का लेख http://bhadas4media.com/article-comment/15777-2013-11-14-06-45-17.html पर मेरा कहना य हे उमीद हे कि कुर्बान अली साहब भी सुनेगे
    सिकंदर हयात 26 Hours Ago
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    इन सब वजहों से हम देखते ही हे कि इतने पुराने और नए मुस्लिम लेखक पत्रकार और बुद्धिजीवी भी हे लेकिन अधिकतर कोई मुसलमानो के बीच मौज़ूद कठ्मुल्लशाही और कटरपंथ ताकतो के खिलाफ आम तोर पर चू भी नहीं करते हे और बड़े उत्साह के साथ संघ और गोलवलकर के ही चारो तरफ चक्कर लगाते रहते हे इसी कारण आम मुस्लिम कही न कही इस ग़लतफ़हमी का शिकार हे कि साम्प्रदायिकता के लिए केवल हिन्दू कटटरपंथ ही दोषी हे खेर मेहर साहब तब अपने भी शायद य गलती कर दी होगी कि शायद मज़हब के खिलाफ लिख दिया होगा याद रहे कि मज़हब के खिलाफ नहीं बल्कि मज़हब कि आड़ लेकर अपने हित साध रहे लोगो के खिलाफ लिखना हे किसी कि भी मज़हबी भवनाव को ठेस पहुचाने से बचना चाहिए में भी पिछले कई सालो से मुस्लिम साम्प्रदायिक और कटरपंतियो तत्वो के खिलाफ लिख रहा हु मुझे भी कुछ कटटरपंती य कहते थे कि में मज़हब के खिलाफ लिखता हु मेने उन्हें चुनौती दी कि मेरी लाखो में से कोई सिर्फ 1 सिर्फ 1 लाइन ही दिखा दे जो मेने इस्लाम तो क्या किसी भी मज़हब के खिलाफ लिखी हो बहुत तलाशने पर भी जाहिर हे उन्हें कुछ नहीं मिला न कभी मिलेगा क्यों कि में धर्म के खिलाफ नहीं बल्कि धर्म कि आड़ में अपनी रोटिया सेक रहे लोगो के खिलाफ लिखता हु आगे भी लिखेगे और इंशाल्लाह केवल लिखेंगे ही नहीं जमींन पर भी काम कि कोशिश करेंगे

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