Wednesday, December 2, 2009

मैं हिन्दू विरोधी नहीं हूं

सलीम अख्तर सिद्दीकी
कुछ लोग मुझ पर आरोप लगाते रहे हैं कि मैं हिन्दु विरोधी हूंं। सच बात तो यह है कि धर्म की राजनीति करने वालों के खिलाफ लिखता हूं। मैं हिन्दू विरोधी तब होता, जब मैं हिन्दू धर्म के खिलाफ लिखता। संघ परिवार ऐसा संगठन है, जिसकी बुनियाद ही मुस्लिम विरोध पर रखी गयी थी। बाद में ईसाईयों को भी संघ परिवार ने अपने निशाने पर ले लिया। आरएसएस की कोख से निकली जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी ने धर्म की राजनीति शुरु की। उनकी इसी राजनीति के चलते देश में भयानक साम्प्रदायिक दंगे हुए, जिनमें हजारों बेगुनाह हिन्दु और मुसलमान मारे गए थे। संघ परिवार की धर्म आधारित राजनीति का विरोध करना हिन्दु विरोधी होना नही है। संघ परिवार देश के 85 प्रतिशत हिन्दुओं का प्रतिननिधत्व नहीं करता है। ऐसे ही मुस्लिम लीग या मुस्लिमों की राजनीति करने वाले मुसलमान देश के सभी मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं करते। यदि ऐसा होता तो देश में दो ही पार्टियां होतीं भाजपा और मुस्लिम लीग। इस देश की बहुसंख्यक हिन्दु और मुस्लिम जनता धर्मनिरपेक्ष रही है। आजादी के बाद मुसलमानों ने कभी जवाहरलाल नेहरु तो कभी इंदिरा तो कभी विश्वनाथ प्रतापसिंह को अपना नेता माना है। अभी चार दिन पहले ही मेरठ में विहिप के प्रवीण भाई तोगड़िया कह गए हैं कि देश में गुजरात फार्मूले को लागू करने की जरुरत है। अब ऐसे में क्या मुझे तोगड़िया की तारीफ में कसीदे पढ़ने चाहिएं ?
जब भी गुजरात दंगों की बात आती है तो कुछ लोग गोधरा को बीच में ले आते हैं। गोधरा को बीच में लाना नरेन्द्र मोदी के फार्मले का समर्थन करना होता है। गोधरा एक वीभत्स घटना थी। लेकिन उस घटना की जांच करने से पहले ही इस बात को सच क्यों मान लिया गया कि ये काम मुसलमानों का ही है। यदि गोधरा कांड मुसलमानों का ही किया हुआ था तो क्या सरकार की शह पर मुसलमानों का कत्लेआम एक सभ्य, लोकतान्त्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश में जायज है ? यदि हां तो क्या इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों का नरसंहार भी जायज था ? क्या मुबई दंगों के बाद मार्च 1993 के बम धमाकों को भी सही ठहराना चाहिए ? आखिर मुंबई धमाकों को करने वालों का तर्क भी तो यही था कि उन्होंने बाबरी मस्जिद और मुंबई दंगों का बदला लेने के लिए धमाके किए हैं।
मुझ पर हिन्दू विरोधी होने का आरोप संघी विचारधारा के लोग ही लगाते हैं। मेरा विरोध करने वाले यदि मेरे सभी आलेख पढ़ेंगे तो उन्हें मालूम पड़ेगा कि मेरी कलम हमेशा ही मजलूमों और समाज के सबसे निचले तबके के लोगों के लिए ही उठती है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मजलूम कौन है और जालिम कौन है। स्व उदयन शर्मा मेरे आदर्श रहे हैं। उन्हीं को पढ़कर मैंने जाना है कि कलम हमेशा मजलूमों के पक्ष में ही उठनी चाहिए। मेरी तो कुछ भी औकात नहीं है। स्व उदयन शर्मा को संघी विचारधारा के लोग हिन्दू विरोधी बताते थे।

16 comments:

  1. रवि सिंहDecember 2, 2009 at 6:21 AM

    अगर हिन्दू विरोधी हो भी तो क्या फर्क पड़ता है, जब इतने सारे हिन्दू विरोधियों को ढो रहे है तो एक बोझा और सही, चोर की दाड़ी में तिनका होता है इसीलिये सफाई दे रहे हो...

    यदि संघ की बुनियाद मुस्लिम विरोध पर रखी गई है तो इस्लाम की बुनियाद किस के ऊपर रखी गई है, कभी झांकने की कोशिश की है?

    कांग्रेस कितने प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करती है?

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  2. धर्म निरपेक्ष जो भी है वह पापी है .क्योकि धर्म मन्दिर मे घंटा बजाने और मस्जिद में अज़ान देने को नही होता .

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  3. मान लिया आप हिन्दू विरोधी नहीं है धर्म की राजनीती करने के वालों के विरुद्ध है
    लेकिन आप उन दलों के खिलाफ क्यों नहीं लिखते जो मुसलमानों का खुलेआम पक्ष लेते हुए राजनीती कर रहे |
    मुस्लिम तुष्टिकरण भी तो वोटो के लिए धर्म की ही राजनीती है जिसे माया, मुलायम, माकपा व कांग्रेस हमेशा से करते आये है |

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  4. हम भी मुसलमानों के खिलाफ नहीं है , उन लोगों के खिलाफ है जो मुसलमानों को संघ के नाम से डराकर व तुष्टिकरण कर वोट के लिए धर्म की राजनीती कर रहे है |
    यदि भाजपा द्वारा हिन्दू हितो की बात करना साम्प्रदायिक है तो मुलायम ,वामपंथियों द्वारा मुस्लिम हित की बात करना साम्प्रदायिक क्यों नहीं है ?

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  5. मैं हिन्दू विरोधी नहीं हो, आपतो हक़ बात कहने वाले हो

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  6. आप हिन्दू विरोधी नहीं हो, आपतो हक़ बात कहने वाले हो

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  7. पोस्ट का शीर्षक और आलेख की मुख्य धारा गलत हो गई। बात बिलुकल सही है।

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  9. आप की बात एक दम सही है , आज कल कीचड़ उछालने का जो खेल खेला जा रहा है वो राजनीती से जयादा प्रेरित है फिर भी अगर धरम पर बात होती है मैं यही कहूँगा की सभी धरम स्वयं में आत्मचिंतन करें , साथ में ये मुस्लिम धरम के लिए भी उतना ही आवश्यक है , क्योकि धर्मों का वास्तविक स्वरुप हर जगह कट्टरता फैला रहा है . इस पर बहस होनी चाहिए , पर बहस होनी चाहिए कीचड़ फेकाई नहीं .

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  10. आप हिन्दु विरोधी नही, मै मानता हुं, मैने आप के कई लेख पढे है, मै किसी भी राजनेतिक दल को अच्छा नही समझता सब को गालिया भी देता हुं, लेकिन आप सिर्फ़ इन निक्कर वालो को ही क्यो, कांग्रेस के बारे भि लिखे, काशमीर के बारे भी लिखे,इस कारण कई बार हम आप के अच्छे लेख पर भी टिपण्णी नही करते, खोलो तो सब की पोल खोलो

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  11. आप क्या, दुनिया का कोई व्यक्ति हिंदू विरोधी नहीं हो सकता. आप तो उन मुसलमानों में शामिल हैं जो जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं.
    क्या आप के पास इन सवालों का कोई जवाब है-
    - कि देश में कितने सांप्रदायिक दंगे हुए
    -इनमें कितने कांग्रेस के शासनकाल में हुए और कितने भाजपा के शासन काल में
    -देश में कांग्रेस ने कितने सालों तक शासन किया और भाजपा ने कितने सालों तक
    -क्या कोई मुसलमान मनमोहन सिंह के उस बयान का विरोध किया जिसमें उन्होंने कहा था कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है
    -कभी किसी आप जैसे मुसलमानों ने आतंकवाद के खिलाफ आवाज बुलंद की.
    -क्या कभी कोई मुसलमान मुसलमानों से ऊपर उठकर हिंदू हित की बात सोची, सोचो कितने ही हिंदू होंगे जो मुसलमान हित की बात करते हैं और काम करते हैं

    सवालों का जवाब दें.

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  12. हक़ बात लिखते रहो ,किसी की फ़िक्र करने की ज़रूरत नही है ,ना ही किसी से सर्टिफिकेट लेने की ज़रूरत है, अपनी नीयत साफ होनी चाहिए. इन लोगो का किया है? खुद को बुद्धिजीवी साबित करने मैं लगे हैं मानसिक रोगी ?

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  13. आखिरकार सर्टिफिकेट लेने की जरुरत पडी न ? यही आपकी कमी या खामी है मिंया, वक्त मिले तो ऐसा क्यों करना पडा आपको इस पर भी गौर करना !

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  14. हे प्रज्ञा-पुरूष! एक आँख से देखोगे और लिखोगे तो हिन्दू विरोधी ही कहलाओगे.

    हमने कभी मुसलमान की निंदा करते हुए नहीं लिखा, जो भी लिखा पोंगापंथ व जिहाद पर लिखा. साथ ही दुष्ट बाबाओं, हुड़दंगी हिन्दु संगठनों की आलोचनाएं लिखी, फिर भी मुसलिम विरोधी कहलाते है. आप तो फिर भी एक तरफा लिखते हो.

    मलाल न करो. लिखते रहो, पता है कौन कैसा है.

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  15. बेबाक लिखते रहे और हक बात लिखते रहें कौ क्या कहता है इस बात की फ़िक्र बिल्कुल ना करें,,,,,,,,,,,,

    अपना काम करते रहें तो सही हो उसकी तारीफ़ करें और जो गलत हो उसकी बुराई करें......

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