
सलीम अख्तर सिद्दीक़ी
संघ परिवार हिन्दुत्व और राम मंदिर के आगे कुछ भी नहीं सोच पाता। कम से कम मुझे याद नहीं पड़ता कि चुनाव की बेला में कभी उसने हिन्दुत्व और राम मंदिर का राग न अलापा हो। उसे बेरोजगारी की चिंता नहीं है। किसानों की बदहाली से उसे कुछ लेना-देना नहीं है। गरीबी और बदहलाी उसके कभी एजेंडे में नहीं रही। पता नहीं आडवाणी साहब ने या फिर संघ परिवार ने वरुण (उनके नाम के आगे मैं गांधी जान बूझकर प्रयोग नहीं कर रहा हुं, क्योंकि ऐसा करना महात्मा गांधी का अपमान होगा) को यह समझा दिया कि मुसलमानों को गालियां देकर और जय श्रीराम का नारा लगाकर चुनाव की वैतरणी पार की जा सकती है। या फिर वरुण को लगा हो कि वे अपने चचेरे भाई राहुल गांधी से पिछड़ रहे हैं, इसलिए साम्प्रदायिक कार्ड चला हो। कारण कुछ भी रहा हो, लेकिन अब तक संघ परिवार की समझ में शायद यह नहीं आया है कि राम मंदिर का मुद्दा राख के ढेर में कब का तब्दील हो चुका है। वरुण उसी राख के ढेर में चिन्गारी ढूंढने की कोशिश में वह सब कुछ कह गए, जिसने उन्हें सलाखों के पीछे पहुंचा दिया है। बहुत लोगों की राय है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने वरुण कों गिरफ्तार करके और फिर रासुका तामील करके उन्हें हीरो बना दिया है। कोई हीरो न बन जाए, महज इसी बात को लेकर कानून का पालन न किया जाए, बेमानी है। यदि वरुण को खुला छोड़ दिया जाता तो उनका हौसला और बढ़ता, जो प्रदेश की कानून व्यवस्था के लिए खतरनाक हो सकता था। वरुण गांधी की गिरफ्तारी के समय पूरा उत्तर प्रदेश शांत रहा। सिर्फ पीलीभीत के कुछ लड़के हाय तौबा मचाकर चुप हो गए। अब इतना तो होगा ही कि जो लोग साम्प्रदायिक वैमनस्य फैलाकर चुनाव की वैतरणी पार करने सोच रहे है, कुछ भी अनाप-शनाप बोलने से पहले दस बार सोचेंगे।
वरुण क्या यह नहीं जानते कि विनय कटियार, उमा भारती, प्रवीण तोगड़िया, साध्वी रितम्भरा और अशोक सिंहल जैसे लोग अब किनारे लगा दिए गए हैं। एक जमाना था, जब इन लोगों की नफरत भरी बातों से पूरे उत्त्र प्रदेश में आग लग जाती थी। इनकी सभाओं में लाखों की भीड़ जुटती थी। अब ये पुराने दिनों का याद करके सिर्फ आहें भरते हैं। इनकी सभाओं में सौ-पचास से अधिक लोग भी नहीं जुटते। कल्याण सिंह जैसे हिन्दुत्व के पुरोधा भी अब भाजपा को दफनाने का लक्ष्य लेकर समाजवादी के साथ हो गए हैं। आडवाणी तो पाकिस्तान में जाकर उन जिनाह की मजार पर जाकर उन्हें धर्मरिपेक्ष व्यक्ति का खिताब दे आए, जिन्हें कोसते-कोसते आडवाणी साहब ने अपनी उम्र गुजार दी। आडवाणी साहब भी यह समझ चुके हैं कि साम्प्रदायिक राजनीति की एक सीमा है। यह बात मायावती की समझ में भी आ गयी है कि केवल दलितों के सहारे लम्बे समय तक राजनीति नहीं की जा सकती। इसलिए वे भी अब सर्वसमाज की बात करने लगीं हैं। यह बात वरुण को भी यह बात समझ लेनी चाहिए कि साम्प्रदायिक राजनीति शॉर्टकट रास्ता तो है, लेकिन उससे राजनीति की लम्बी पारी नहीं खेली जा सकती।
अब पशु प्रेमी वरुण की मां मेनका की बात करें। मेनका पशु और पक्षियों की बहुत हमदर्द हैं। जब वे पीलीभीत से लौट रही थीं तो उन्हें एक ट्रक में कुछ भैंसें दिखायी दीं। उनका पशु प्रेम जागा। उनसे रहा नहीं गया। उन्होंने ट्रक रुकवाकर भैंसों को आजाद करा दिया। इधर, हमारे शहर मेरठ में उन कुत्तों का बहुत आतंक बरपा है, जो पागल हो गए हैं। दो-तीन बच्च्े इन कुत्तों के शिकार हो गए। जनता का कहर कुत्तो पर टूट पड़ा। शहर में लगभग पचास कुत्तों को मार गिराया गया। नगर निगम की टीम भी कुत्तों का पकड़ कर कांजी हाउस में बंद करने लगी। मेनका गांधी एक संस्था पीपुल्स फॉर एनिमल चलाती हैं। संस्था के स्थानीय पदाधिकारियों ने मेनका गांधी को सूचित किया कि कैसे मेरठ में कुत्तों का बेदर्दी से मारा जा रहा हैं। मेनका गांधी ने कुत्तों पर होने वाली ज्यादतियों के खिलाफ बयान जारी किए। इधर, जब उनके बेटे वरुण ने पीलीभीत की एक सभा में मुसलमानों के हाथ काटने जैसे उग्र्र भाषण दिए तो लोगों को उम्मीद थी कि पुश-पक्षियों के मामले में संवेदनशील मेनका अपने बेटे के बचाव में न आकर बेटे को संयम बरतने की सलाह देंगी। लेकिन हुआ उल्टा। मेनका न सिर्फ बेटे के बचाव में आगे आयीं बल्कि बेटे का समर्थन किया। सवाल यह पैदा होता है कि जानवरों को न मारने की बात करने वाली मेनका इन्सानों के हाथ काट लेने की बात का कैसे समर्थन कर सकती हैं ? क्या उनकी नजर में इंसान की कीमत जानवरों से भी कम है ? या फिर मुसलमानों की जान की कीमत कम है ?
170, मलियाना, मेरठ
09837279840
