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Saturday, May 11, 2013

बोतल का समाजवाद, मुस्तैद व्यवस्था


सलीम अख्तर सिद्दीकी
घटना है मेरे शहर के कैंट इलाके की। बात उस समय की है, जब सेना ने कैंट को आम नागरिकों के लिए एक तरह से प्रतिबंधित कर दिया था। हर किलोमीटर पर चेकिंग प्वाइंट बना दिए गए थे, जिनसे निकलने में काफी वक्त जाया हो जाता था। बहरहाल, मैं कैंट में था और उसकी एक नीम अंधेरी सड़क पर मेरी मोटर साइकिल का पेट्रोल खत्म हो गया था। पेट्रोल पंप काफी दूर था। ऐसे में मेरे पास यही विकल्प था कि मैं कैंट में रहने वाले अपने मित्र को फोन करके पेट्रोल लाने के लिए कहूं। मित्र को फोन करने के बाद मैं नीम अंधेरी सड़क से निकलकर एक पान-सिगरेट के खोखे के पास आकर इंतजार करने लगा। खोखे के सामने एक बिल्कुल नई लग्जरी गाड़ी आकर रुकी। उस पर नंबर प्लेट नहीं लगी थी, लेकिन उसके आगे समाजवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाली सरकार का झंडा जरूर लगा हुआ था। गाड़ी में बैठे महाशय ने कुछ इशारा किया और खोखे वाले ने उनको गाड़ी में ही सामान दिया। अब गाड़ी थोड़ा आगे जाकर रुक गई थी। गाड़ी के अंदर की लाइट जली। उसमें दो आदमी झक सफेद कलफ लगे कपड़ों में बैठे हुए थे। उनके जूते भी शायद सफेद रंग के होंगे, क्योंकि आजकल नेताओं और माफियाओं का यह डेÑस कोड बना हुआ है। दोनों के हाथों में बीयर की बोतलें थीं। एक आदमी की बोतल खत्म हुई, तो उसने उसे सड़क  पार उछाल दिया, जहां मिट्टी पड़ी हुई थी। धप की आवाज हुई और इतने में ही दो लड़के नीम अंधेरे से प्रकट हुए और बोतल पर झपट पड़े। दोनों में बोतल को हथियाने के लिए जद्दोजहद होने लगी। अंतत: बोतल लेने में वह लड़का कामयाब हो गया, जो दूसरे के मुकाबले थोड़ा ताकतवर था। उसने बोतल को अपनी उस छोटी बोरी के हवाले किया, जिसमें पहले से कई बोतलें भरी हुई लग रही थीं। दूसरे लड़के के पास भी ऐसी छोटी बोरी थी। थोड़ी देर बाद दूसरे आदमी ने अपनी बोतल खाली की। उस लड़के ने जो बोतल लेने में नाकाम रहा था, बड़ी आस से बोतल की ओर देखा। आदमी ने बोतल को इस तरह हवा में उछालने का अभिनय किया, जैसे उस लड़के पास ही उसे फेंकना चाहता हो, लेकिन ऐन वक्त पर उसने हाथ ढीला छोड़ दिया। बोतल पक्की सड़क के बीच में आकर गिरी और टूटकर ऐसे बिखर गई, जैसे समाजवाद के परखच्चे उड़ गए हों। लड़के के चेहरे पर मायूसी उभरी और गाड़ी से दोनों आदमियों का अट्टहास गूंजा। लड़के ने दोनों को भद्दी सी गाली दी और अंधेरे में गुम हो गया। हंसी की जगह अब उनके चेहरों पर गुस्सा उभर आया। उन्होंने तेजी के साथ गाड़ी आगे बढ़ाई। जहां यह सब हुआ, उससे चंद गज के फासले पर सेना के जवान बहुत मुस्तैदी से वाहनों की चेकिंग कर रहे थे।

Thursday, May 2, 2013

चुनाव नतीजे तय करेंगे मुशर्रफ का मुस्तकबिल

सलीम अख्तर सिद्दीकी
जब पाकिस्तान के पूर्व जनरल और राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के जहाज ने कराची एयरपोर्ट पर लैंड किया था, तो अधिकतर लोगों का कयास था कि शिकार खुद चलकर जाल में आ फंसा है। बाद के दिनों में जिस तरह से उनके सभी नामांकन पत्र खारिज किए गए और एक अदालत ने उनकी गिरफ्तारी के आदेश दिए और वह भागकर अपने फार्म हाउस में जा छिपे, उसके बाद तो यकीन कर लिया गया है कि शिकार वाकई जाल में फंस चुका है। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? मुशर्रफ सेना के जनरल रहे हैं। उनके पास थिंक टैंक है। वह ऐसे ही दौड़कर पाकिस्तान नहीं आ गए हैं। आज जो कुछ उनके साथ हो रहा है, उसके बारे में उन्होंने कई-कई बार सोचा होगा। ऐसा तब भी होता, जब और कुछ समय बाद आते। ठीक चुनाव के पहले पाकिस्तान आना उनकी रणनीति का हिस्सा है। वह ऐसा नहीं करते तो उन्हें अभी अगले चुनाव तक और इंतजार करना पड़ता। इस वक्फे में पाकिस्तान किस करवट बैठता, कोई नहीं जानता। 
मुशर्रफ की वापसी में अमेरिका व सऊदी अरब की भूमिका से भी इंकार नहीं किया जा सकता। मीडिया रिर्पोटें बताती हैं कि मुशर्रफ की वापसी से पहले पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के खास नेताओं और नवाज शरीफ को सऊदी अरब बुलाया गया था और इच्छा जाहिर की थी कि मुशर्रफ के राजनीतिक धारा में लौटने में रोड़े न अटकाएं जाएं। अमेरिका और सऊदी अरब ऐसे देश हैं, जिनकी नाफरमानी कोई भी पाकिस्तान सरकार नहीं कर सकती। लेकिन वहां की न्यायपालिका ने वह कर दिया, जो सरकार भी नहीं करना चाहती थी। इसे उसकी प्रतिशोध की भावना भी कहा जा सकता है।  
मुशर्रफ सेना में लोकप्रिय रहे हैं। उन्हें सेना ने जरूर विश्वास दिलाया होगा कि यदि उनके साथ ज्यादती की जाती है, तो वह चुप नहीं बैठेगी। कई रिटायर्ड पाकिस्तानी जनरलों ने चेतावनी दी भी है कि अगर न्यायपालिका ने उनके पूर्व जनरल का का अपमान किया, तो इसकी प्रतिक्रिया हो सकती है। पूर्व सैन्य प्रमुख जनरल (रिटायर्ड) मिर्जा असलम बेग ने भी साफ कहा है कि ‘खास स्तर’ से नीचे जाने के बाद सेना मुशर्रफ के मामले में हस्तक्षेप कर सकती है। नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तान सेना में कम से कम नौ सैन्य अधिकारी ऐसे हैं, जिन्हें मुशर्रफ ने ही प्रमोशन दिया था। ये कुछ संकेत ऐसे हैं, जो बताते हैं कि मुशर्रफ अकेले नहीं हैं। ऐसा भी नहीं है कि पाकिस्तान में उनकी लोकप्रियता बिल्कुल भी नहीं है। वहां की प्र्रगतिशील अवाम में वह ऐसे शासक के रूप में जाने जाते हैं, जिसने फौजी तानाशाह होते हुए थी जनरल जिया-उल-हक के विपरीत धार्मिक कट्टरपन की जगह आधुनिक समाज को तरजीह दी। पाकिस्तान में प्रगतिशील लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है, जो धार्मिक उन्माद में जीना नहीं चाहते। भले ही मुशर्रफ के नामांकन रद्द कर दिए गए हों, लेकिन उनकी आल पाकिस्तान मुसलिम लीग चुनाव मैदान में है। उम्मीद की जा रही है कि उसके उम्मीदवारों को समर्थन मिलेगा। मुशर्रफ की जिस तरह से बेइज्जती की जा रही है, उसके बाद तो उनकी पार्टी को सहानुभूति वोट मिलने की उम्मीदें भी हैं।
मुशर्रफ की गिरफ्तारी से चुनाव पर तो असर पड़ेगा ही, चुनाव के बाद पैदा होने वाले हालात भी असरअंदाज होने की उम्मीद है। पाकिस्तान में त्रिशंकु असेंबली के कयास लगाए जा रहे हैं। यदि ऐसा हुआ तो पाकिस्तान की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी मुत्तेहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) किंग मेकर की भूमिका में हो जाएगी। मौजूदा असेंबली में एमक्यूएम के 25 सदस्य हैं। अबकी बार भी इससे कम सदस्य नहीं होंगे। इसकी वजह यह है कि कराची और हैदराबाद मुहाजिर बहुल क्षेत्र हैं और सबका वोट एकमुश्त एमक्यूएम को जाता है। इस सूरत में वह नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुसलिम लीग (एन) और आसिफ जरदारी की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी से सौदेबाजी करने की हैसियत में होगी। जनरल मुशर्रफ को मुहाजिर होने के नाते एमक्यूम का पूरा समर्थन हासिल है। वह उस पार्टी को समर्थन दे सकती है, जो जनरल मुशर्रफ से तमाम केस वापस लेने की गारंटी दे सके। खुद मुशर्रफ की पार्टी आल पाकिस्तान मुसलिम लीग को भी कुछ सीटें मिल जाती हैं तो  काम और ज्यादा आसान हो जाएगा। जब पाकिस्तान में ‘मिस्टर टेन परसेंट’ से मशहूर आसिफ अली जरदारी, जो खरबों रुपयों की लूट के आरोप में जेल बंद थे, वहां से सीधे राष्ट्रपति की कुर्सी पर पहुंच सकते हैं, तो जनरल मुशर्रफ के केस भी वापस हो सकते हैं। सत्ता के लिए दुश्मन से दोस्त और दोस्त से दुश्मन बनने का सिलसिला बहुत पुराना है।
इन बातों को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि मुशर्रफ की गिरफ्तारी के बाद भी उनका खेल अभी खत्म नहीं हुआ है। असली खेल तो चुनाव के बाद शुरू होगा। दरअसल, चुनाव ही मुशर्रफ का तुरप का पत्ता है। इसमें बस एक खामी यह है कि वह पत्ता इक्का नहीं है। यानी यदि हंग असेंबली नहीं आई, तो उनकी तुरप पिट भी सकती है। ऐसा हुआ, तो उनका हश्र कुछ भी हो सकता है। शायद जुल्फिकार अली भुट्टो जैसा? लेकिन अमेरिका, सऊदी अरब और फौज उन्हें बचा भी सकती है। बहरहाल, मुशर्रफ के मुस्तकबिल का फैसला चुनाव के नतीजे तय करेंगे।

Monday, April 29, 2013

भ्रष्टाचार के बीच शहर की चिंता


सलीम अख्तर सिद्दीकी
वह चाय की दुकान उस बिल्डिंग के पास थी, जहां शहर का विकास कराने वाले लोग बैठते थे। मैं भी उस बिल्डिंग में अपने किसी काम के लिए गया था। पता चला कि संबंधित बाबू अपने किसी मित्र के साथ चाय पीने गए हैं। मैं उनको ढूंढ़ता हुआ उस चाय की दुकान का हिस्सा बन गया था, जहां एक कोने में टीवी चल रहा था। उस दुकान पर बिल्डिंग में काम करने वाले कर्मचारी आते थे या मुझ जैसे लोग, जो कभी वक्त गुजारने के लिए, तो कभी संबंधित अधिकारी को ढूंढ़ते हुए पहुंचते थे। मैंने दुकान में चारों ओर नजर दौड़ाई, लेकिन वह अधिकारी मुझे कहीं नजर नहीं आए। मैंने उनका इंतजार वहीं करने का इरादा किया और वक्त गुजारी के लिए चाय का आॅर्डर दिया। मैंने वहीं एक सीट संभाली और टीवी पर चलने वाली खबरों पर ध्यान केंद्रित कर दिया। मेरी सीट के बराबर में ही दो सज्जन बैठे हुए थे। उनकी बातचीत से पता चल रहा था कि उनमें एक किसी वार्ड का पार्षद और दूसरा ठेकेदार था, जो पार्षद के इलाके में विकास कार्य करा रहा था। ठेकेदार पार्षद से किए गए काम को ओके कर देने का आग्रह कर रहा था। पार्षद का कहना था कि जब तक मेरा कमीशन नहीं मिलेगा, काम पास नहीं करूंगा। ठेकेदार का कहना था कि इलाके के लोगों ने घटिया काम नहीं होने दिया, इसलिए मुझे ज्यादा फायदा नहीं हुआ, तो कमीशन कैसे दे दूं। आखिरकार दोनों में सहमति यह बनी कि जितना कमीशन तय हुआ था, उससे आधा कमीशन दिया जाएगा और इसकी एवज में पार्षद काम पास कर देगा। दोनों के चेहरों पर इत्मीनान के भाव आए। एक बार फिर चाय का आॅर्डर दिया गया। दोनों ने अपना ध्यान टीवी पर चलने वाली खबरों पर लगा दिया। न्यूज चैनल हजारों करोड़ रुपयों के घोटाले का पर्दाफाश होने की खबर ब्रेक कर रहा था। पार्षद ने खबर पर प्रतिक्रिया दी, ‘देख लेना यह नेता देश को बेचकर खा जाएंगे।’ ठेकेदार ने गर्दन हिलाकर उसका समर्थन किया। मुझे दुकान में दाखिल हुआ, वह अधिकारी दिखाई दिया, जिसका मैं इंतजार कर रहा था। वह सीधा पार्षद और ठेकेदार के पास गया और बोला, ‘क्यों, हो गया आप दोनों को सेटेलमेंट?’ दोनों ने एक साथ गर्दन हिलाकर हां कहां। अधिकारी ने दोनों को नसीहत दी, ‘देखो मिलजुल कर काम निकला लेना चाहिए। इस काम में नुकसान हो गया, तो क्या आगे किसी काम में नुकसान पूरा कर लेना। हर क्षेत्र के लोग इतने जागरूक नहीं होते कि इस पर ध्यान दें कि उनके इलाके में काम कैसा हो रहा है?’ अधिकारी का ध्यान टीवी पर चलती हुई भ्रष्टाचार की खबर पर गया और बुदबुदाया, ‘पता नहीं इस देश का क्या होगा?’

Monday, April 22, 2013

अनूठा है साइबर संसार


सलीम अख्त सिद्दीकी

साइबर संसार भी अनूठा है। कोई बा
त शेयर करो, तो कहीं की कहीं पहुंच जाती है। अब देखिए न। ‘दैनिक जनवाणी’ में मेरा रह रविवार एक कॉलम चलता है ‘तमाशबीन’। इसके जरिए मैं समाज की विसंगतियां उजागर करता रहता हूं। अखबार में प्रकाशित होने के बाद मैं इसे बपने ब्लॉग पर शेयर करता हूं। इसके बाद यह कहां-कहां पहुंच जाता है, इसका पता तब चलता है, जब वह कहीं ओर नजर आता है। मैंने अपने ब्लॉग पर पिछले सप्ताह ‘ये हमारे-तुम्हारे बच्चे तो नहीं?’ शीर्षक से पोस्ट डाली। उस पोस्ट को ‘100 फ्लावर्स’ ब्लॉग ने उठा लिया। वहां से ‘हिंदुस्तान’ने अपने ‘साइबर संसार’ में आज प्रकाशित किया। बात यहीं खत्म नहीं हुई। ‘ब्लॉग इन मीडिया डॉट कॉम’ने यह बता दिया कि यह पोस्ट आज के हिंदुस्तान में प्रकाशित हुई है। वाकई है न साइबर संसार अद्भुत 

Sunday, April 21, 2013

मजहब पर भारी समाज

सलीम अख्तर सिद्दीकी
सुबह के लगभग सात बजे थे। मैं अभी सोकर नहीं उठा था। दरवाजे पर दस्तक हुई। बाहर निकल कर देखा, तो मेरे मोहल्ले के कुछ ‘मौअजिज’ लोग खड़े थे। उनमें से कुछ हज कर आए थे और कुछ जाने की तैयारी में थे। कुछ ऐसे भी थे, जो कई साल से इस्लाम की दावत दे रहे थे और इस काम के लिए दुनियाभर में घूमते थे। उन्होंने मुझसे दरियाफ्त किया कि मोहल्ले की कुछ समस्याओं के लिए इलाके के पार्षद के यहां जाना है। पार्षद दलित हैं तथा हमारे घर से कुछ ही दूरी पर उनका मकान है। सुबह-सुबह जाने का मकसद यही था कि वह घर पर ही मिल जाएंगे। सभी पार्षद के घर पहुंचे। उन्होंने बड़ी गर्मजोशी से सबका इस्तकबाल किया। बैठे हुए थोड़ी ही समय हुआ कि एक छोटी बच्ची गिलास में पानी लेकर हाजिर हुई। सभी ने एक-एक करके पानी के लिए मना कर दिया। अकेले मैंने ही पानी के गिलास की ओर हाथ बढ़ाया। पानी पीते हुए मेरी नजर अपने एक साथी पर पड़ गई। वह मुझे अजीब नजरों से देख रहे थे, जैसे कह रहे हों कि ‘यह क्या कर रहे हो।’ मैं उनकी नजरों को समझने की कोशिश कर ही रहा था कि एक टेÑ में चाय, नमकीन और बिस्कुट आ गए। पार्षद ने सभी से चाय लेने का आग्रह किया। लेकिन, सभी ने कोई न कोई बहाना बना इंकार कर दिया। पार्षद के चेहरे पर व्यंग्यात्मक भाव आए। पार्षद ने मेरी ओर देखा। मैंने ट्रे से चाय का कप उठा लिया। बाकी चाय के कप ट्रे में रखे रहे। किसी ने नमकीन और बिस्कुट की ओर भी हाथ नहीं बढ़ाया। पार्षद ने संबंधित समस्याएं सुनीं और उन्हें दूर करने का आश्वासन दिया। थोड़ी देर बाद पार्षद से चलने की आज्ञा मांगी, तो उन्होंने कहा, ‘मैं भी आपसे कुछ कहना चाहता हूं।’ सभी ने उनकी ओर सवालिया नजरों से देखा। पार्षद ने कहना शुरू किया, ‘जिस धर्म से आप हैं, मैंने उसका थोड़ा-बहुत अध्ययन किया है। मुझे हजरत मुहम्मद साहब की वह बात बहुत अच्छी लगती है, जब उन्होंने एक हब्शी गुलाम को खरीदकर उस समय गले लगाया था, जब कोई उनके पास जाना भी नहीं चाहता था। वह गुलाम हजरत बिलाल थे। मेरा यही अनुरोध है कि कम से कम इस्लाम के बुनियादी उसूलों पर समाज की कुरीतियों का बोझ डालकर उन्हें दबाइए मत।’ किसी के पास कोई जवाब नहीं था। बात में पता चला कि उनमें से कई को यही पता नहीं था कि हजरत बिलाल कौन थे?

Sunday, April 14, 2013

‘बपतिस्मा’ की खुशी में आज शाम की बीयर मेरी तरफ से


सलीम अख्तर सिद्दीकी
वह शहर का एक ऐसा पॉश इलाका था, जहां पर कई नामी पब्लिक स्कूल थे। बढ़ती गर्मी के बीच उस इलाके से गुजर रहा था, तो प्यास की वजह से गला सूखने लगा। मैंने पानी की तलाश में इधर-उधर निगाह दौड़ाई, लेकिन उस कंक्रीट के जंगल में कहीं हैंडपंप तक नहीं नजर आया। मैं एक दुकान पर पानी की बोतल लेने के लिए रुका। बोतल लेकर उसे खोला और मुंह से लगाया ही था कि दुकान के सामने पांच-छह मोटर साइकिलें आकर रुकीं। सभी धड़धड़ाते अंदाज में दुकान में घुसे। दुकान काफी बड़ी थी, जहां बैठने के लिए कुर्सियां मेज लगी हुई थी। छात्र नामी पब्लिक स्कूल के छात्र थे। उस स्कूल में अपने बच्चों का दाखिला दिलाने के लिए ‘दीवानगी’ थी। स्कूल का रिजल्ट शतप्रतिशत रहत था। इसकी वजह यह थी कि वह सिर्फ टेलेंटिड छात्रों का दाखिला ही लेता था। पढ़ाई में कमजोर बच्चों के लिए वहां कोई जगह नहीं थी। गरीब बच्चे वहां पढ़ नहीं सकते थे, क्योंकि वहां के खर्च उठाना उनके बस की बात नहीं थी। यानी उस स्कूल में इतनी काबिलियत नहीं थी कि वह पढ़ाई में कमजोर बच्चों को किसी काबिल बना सके। अमीर लोग स्कूल के दावों की जांच किए बगैर स्कूल संचालक की हर शर्त पूरी करते थे। एक होड़ थी और अभिजात्य वर्ग उसमें शामिल था।
बहरहाल, जो छात्र बाइक पर आए थे, उनकी की उम्र से लगता था कि वे 11वीं या 12वीं के छात्र लग रहे होंगे। दुकानदार को जैसे पता था कि उन्हें क्या चाहिए। छात्रों के कुछ कहने से पहले ही दुकानदार ने महंगी सिगरेट का एक पैकेट उनकी ओर बढ़ा दिया। सभी ने अपने-अपने लिए पैकेट में से एक-एक सिगरेट निकाली। एक छात्र ने बारी-बारी से सभी की सिगरेट सुलगाई। एक छात्र ऐसा भी था, जो शायद सिगरेट नहीं पीता था। उसका हाथ खाली देखकर एक छात्र ने कहा, ‘अबे! यह क्यों सिगरेट नहीं पी रहा है?’ दूसरे छात्र ने सिगरेट न पीने वाले छात्र का मजाक उड़ाते हुए कहा, ‘तू जानता नहीं, यह अपने स्कूल में ‘भाई साहब’ के नाम से मशहूर है।’ सभी ने ठहाका लगाया। लड़का झेंप गया। तभी एक छात्र अपनी सिगरेट लेकर आगे बढ़ा, ‘आज इसका ‘बपतिस्मा’ करते हैं।’ इतना कहकर उसने सिगरेट उसके मुंह से लगा दी। छात्र ने नानुकर की तो एक छात्र बोला, ‘अबे! नखरे मत कर। तेरा बपतिस्मा हो जाएगा, तो आज सभी को कोल्ड ड्रिंक मेरी तरफ से।’ यह प्रस्ताव सुनकर सभी उससे सिगरेट में कश लगाने की जिद करने लगे। उस छात्र ने थोड़े अनमने ढंग से सिगरेट में दो-तीन कश लगाए और खांसता हुआ बाहर चला गया। सभी छात्रों ने जोरदार तरीके से ‘हुर्रे’ बोला। कोल्ड ड्रिंक की बोतलें खुलने लगीं। वह छात्र दोबारा दुकान में घुसा। अब उसने खुद एक छात्र के हाथ से सिगरेट लेकर कश लगाए। तभी छात्रों में से एक की आवाज आई, ‘यह तो बहुत जल्दी सैट हो गया। इसके बपतिस्मा की खुशी में आज शाम की बीयर मेरी तरफ से।’ दुकान में बीयर पिलाने की बात करने वाले छात्र के पक्ष में नारे लगने लगे। जरा सोचिए, इनमें हमारे-तुम्हारे बच्चे तो नहीं हैं?

Sunday, March 17, 2013

छपास रोग से पीड़ित

सलीम अख्तर सिद्दीकी
शहर का एक ऐसा चौराहा, जहां पर अक्सर ही धरने-प्रदर्शन होते रहते थे। आज भी एक ऐसा संगठन जनसंख्या को लेकर प्रदर्शन कर रहा था, जिसे छपास रोग से पीड़ित लोगों का संगठन कहा जाता था। मैं उस चौराहे से गुजर रहा था, तो प्रदर्शन में मेरे एक परिचित ने मुझे आवाज देकर बुला लिया था। उस संगठन का अखबारों में बहुत नाम था। रोज ही किसी न किसी समस्या को लेकर वह सड़कों पर प्रदर्शन करता रहता था। सुना गया था कि उसके अध्यक्ष की अखबारों में अच्छी घुसपैठ थी, जिसकी वजह से उसे अखबारों में प्रमुखता से जगह मिल जाती थी। संगठन में गिनती के लोग थी। बमुश्किल आठ-दस। आज भी इतने ही लोग थे। उन्होंने अपनी शर्ट उतारी हुई थी। वे उल्टे लेटे हुए थे। उनकी पीठ पर बढ़ती जनसंख्या को लेकर कुछ स्लोगन लिखे थे। आते-जाते लोग उन्हें देखते और मुस्कुराकर आगे बढ़ जाते। प्रदर्शन चलते हुए अभी आधा घंटा हुआ था कि अध्यक्ष महोदय की बैचेनी बढ़ने लगी। धूप में तेजी आने लगी थी। थोड़ी देर बाद वहां कुछ मोटर साइकिलें आकर रुकीं। प्रदर्शनकारियों में जैसे जान-सी पड़ गई। वे प्रेस फोटोग्राफर थे। सभी प्रदर्शनकारी अलर्ट हो गए। फोटोग्राफर उन्हें जैसा आदेश दे रहे थे, वे वैसा ही कर रहे थे। चंद मिनटों का यह कार्यक्रम खत्म हुआ। एक प्रदर्शनकारी ने प्रेस विज्ञप्ति बांटी। अब प्रदर्शनकारी तितर-बितर से हो गए। कुछ मोबाइल पर बतियाने लगे। कोई फोन पर बस थोड़ी देर में पहुंचने का संदेश दे रहा था,  कोई नौकर से दुकान खोलकर सफाई करने का आदेश दे रहा था। इसी बीच एक बार फिर दो मोटर साइकिल वहां आकर रुकीं। इधर-उधर हुए प्रदर्शनकारियों में हड़कंप मचा। वे जल्दी-जल्दी फिर एक जगह जुट गए। अबकी बार प्रदर्शनकारी ज्यादा खुश थे, क्योंकि आने वाले एक लोकल चैनल के पत्रकार थे। अध्यक्ष महोदय सतर्क हो गए। वह फौरन कैमरे के सामने आए। पत्रकार ने उनके सामने माइक किया। अध्यक्ष जोर से जोर से जनसंख्या वृद्धि के खिलाफ बोलने लगे। सभी प्रदर्शनकारी कोशिश कर रहे थे कि वे भी कैमरे की जद में आ जाएं। अध्यक्ष महोदय ने अपनी बात खत्म की। प्रदर्शन खत्म हो गया। सभी अपने-अपने वाहन की ओर बढ़ गए।