Friday, January 8, 2010

क्या सिर्फ राठौड़ ही कानून को ठेंगे पर रखकर मुस्कराया है ?

सलीम अख्तर सिद्दीकी
रुचिका मामले में मीडिया की अति सक्रियता के चलते हरियाणा के पूर्व महानिदेशक एसपीएस राठौड़ पर कानून का जो चाबुक चला है, उसे मीडिया अपनी बहुत बड़ी उपलब्धि मान रहा है। मीडिया अपनी पीठ खुद ही थपथपा रहा है। मान लो अगर राठौड़ अदालत से बाहर आते हुए मुस्कराता नहीं तो क्या मीडिया रुचिका केस में इतनी ही दिलचस्पी लेता? क्या राठौड़ का मुस्कराना ही गजब हो गया? राठौड़ का मुस्कराना मीडिया को बहुत बुरा लगा। सभी को लगा था। लगना भी चाहिए। लेकिन क्या एक राठौड़ ही ऐसा है जो कानून को अपने ठेंगे पर रखकर मुस्कराया है। जब लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट आयी थी तो एक न्यूज चैनल पर उमा भारती मंद मंद मुस्करा कर बता रही थीं कि कैसे बाबरी मस्जिद को ढहाया गया था। उनका साक्षात्कार लेने वाले पत्रकार महोदय भी मुस्करा कर सवाल पूछ रहे थे। उमा भारती की मुस्कराहट पर तो मीडिया खफा नहीं हुआ। याद किजिए जब अदालत ने कल्याण सिंह को एक दिन की सजा दी थी तो उस समय उनके चेहरे पर विजेताओं जैसी मुस्करहाट थी या नहीं? यकीन नहीं आता तो उस वक्त की वीडियो क्लिपिंग देख लें। बाबरी मस्जिद को ढहाने वाले और हजारों लोगों का खून बहाने वाले लोग इस देश पर छह साल तक शासन कर गये। 17 साल से बाबरी मस्जिद ढहाने वालों पर मुकदमा चल रहा है। आगे कब तक चलेगा कुछ पता नहीं है। रुचिका को इंसाफ मिलने में 19 साल लग गये। इस बात को ऐसे पेश किया जा रहा है, जैसे इस देश में यह कोई अनोखी बात हो। 19 और 17 साल में तो ज़्यादा अंतर नहीं है।
25 साल हो गये सिखों को इंसाफ मांगते हुए। क्या इंसाफ मिला? 25 साल ही भोपाल गैस कांड को हो गये हैं। क्या उन्हें इंसाफ मिला? 1987 को मेरठ में दो बदतरीन हादसे हुए थे। 22 मई को पीएसी ने हाशिमपुरा के 44 युवाओं को गोलियों से भूनकर उनकी लाशों को मुरादनगर (गाजियाबाद) की गंगनहर में बहा दिया था। 24 साल बाद किसी का कुछ नहीं बिगड़ा। इतना भी नहीं हुआ कि किसी को सस्पेंड तक किया गया हो। 23 मई को मेरठ के ही मलियाना में पीएसी ने ढाई घंटे के अंदर 73 लोगों को गोलियों से भून दिया था। ज़‍िम्मेदार पुलिस और पीएसी के जवान आराम से नौकरी करते रहे। तरक्की पाते रहे। कहने को मलियाना का केस मेरठ की फास्ट ट्रैक कोर्ट में चल रहा है, लेकिन रफ्तार इतनी सुस्त है कि अभी तक एक गवाह की गवाही भी पूरी नहीं हो पायी है। क्या मीडिया की यह जिम्मेदारी नहीं है कि चौथाई सदी पुराने केसों पर भी वह निगाह डाले? जब इशरत जहां को फर्जी मुठभेड़ में मारा गया था तो यही मीडिया गुजरात सरकार द्वारा खींची गयी लाइन को लांघने की हिम्‍मत नहीं कर पाया था। 2002 के गुजरात दंगों के दौरान इलैक्ट्रॉनिक मीडिया नरेंद्र मोदी के खिलाफ बहुत मुखर था। लेकिन जब एनडीए सरकार ने न्यूज चैनलों को धमकाया तो सभी न्यूज चैनलों की घिग्घी बंध गयी थी। जब राठौड़ हरियाणा के पुलिस महानिदेशक थे, तब मीडिया उनके प्रति इतना सख्त क्यों नहीं हुआ था?
सवाल यह भी है कि मीडिया केवल जेसिका लाल, नीतीश कटारा और रुचिका जैसे मामलों में ही इतनी दिलचस्पी क्यों लेता है? क्या इसलिए कि इन केसों से न्यूज चैनलों की टीआरपी बढ़ती है? यदि मीडिया देश की अदालतों में झांक कर देखने की ज़हमत उठाये तो वहां कानून के सताये हुए सैकड़ों लोग मिल जाएंगे, जिनकी इंसाफ मांगते-मांगते कमर झुक गयी है। अदालतों में किस रफ्तार से काम होता है, इस बात का अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि 2009 में उत्तर प्रदेश की अदालतों में केवल 138 दिन ही काम हो पाया है। अदालतों में छुट्टियां ऐसी होती है, जैसे किसी सरकारी स्कूल की होती है। छुट्टियों के अलावा आये दिन होने वाली हड़तालों ने अदालती काम को बेहद धीमा कर रखा है। ऐसे में अदालतों से इंसाफ मिलने में बीस बरस लग जाते हैं तो ताज्जुब वाली बात नहीं है। सच तो यह है कि देश की अधिकांश अदालतें संगठित भ्रष्टाचार का अड्डा बन गयी हैं। पैसे और रसूख वाले लोग केस को लंबा खींचने के लिए पैसा पानी की तरह बहाते हैं। अदालतों में बहुत से वकीलों की वकालत ही इस बात पर चलती है कि उसकी किस जज से कैसी सैटिंग है। जज का पेशकार जज के सामने ही रिश्वत लेता है। लेकिन जज की मुद्रा ऐसी होती है, जैसे उसे कुछ मालूम ही नहीं है। इंसाफ़ देर से मिलने का एक कारण भ्रष्टाचार भी है। यह सही है कि मीडिया ने रुचिका के बहाने सांकेतिक रूप से ही सही समाज और सरकार को सोचने के लिए मजबूर किया है। लेकिन क्या इतना ही काफी है? इस देश में जेसिकाओं, नीतिशों और रुचिकाओं के अलावा भी सताये हुए लोग हैं, जिनकी नज़र मीडिया पर नहीं पड़ती या वे लोग मीडिया तक पहुंचने में सक्षम नहीं है। कोशिश करिए – ऐसे सताये हुए लोगों को खोजिए। इतने लोग हैं कि उनकी कहानियां दिखाते और छापने से फुरसत नहीं मिलेगी।

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