<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325</id><updated>2012-01-30T18:52:13.058-08:00</updated><category term='गुनाह'/><category term='कत्लेआम'/><category term='तालिबान'/><category term='वरुण आजकल संघ pariwar'/><category term='सलीम सिद्दीक़ी'/><category term='इमरान हाशमी'/><category term='पाकिस्तान'/><category term='गैरइस्लामी'/><category term='आवाम'/><category term='रविवार'/><category term='मुसलमान'/><category term='हाशिमपुरा'/><category term='भाजपा'/><category term='उदयन'/><title type='text'>हक बात</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default?start-index=101&amp;max-results=100'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>134</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-6601606989308401451</id><published>2011-12-25T05:49:00.000-08:00</published><updated>2011-12-25T05:53:57.075-08:00</updated><title type='text'>विधानसभा चुनाव के पहले अल्पसंख्यक आरक्षण का दांव</title><content type='html'>&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:100%;" &gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;सलीम अख्तर सिद्दीकी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव बेहद नजदीक होने के साथ ही सर्द मौसम में राजनीतिक पार्टियों की सरगर्मियां बेहद गरम हो गई हैं। कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों के लिए 4.5 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा करके माहौल को और ज्यादा गरम कर दिया है। बसपा तो कांग्रेस के इस कदम से ह्यसकतेह्ण की हालत में लगती है। किसी भी तरीके से सभी राजनीतिक दलों को मुसलमानों के वोट दरकार है। यहां तक कि भारतीय जनता पार्टी भी मुसलिम वोटों का मोह नहीं त्याग पा रही है। ऐसा हो भी क्यों नहीं, उत्तर प्रदेश में मुसलिम वोट 18 से 20 प्रतिशत तक हैं। यह वोट प्रदेश की लगभग 130 विधानसभा सीटों पर निर्णायक सिद्ध होते हैं।&lt;br /&gt;बसपा, सपा और कांग्रेस मुसलिम वोटों को अपने पक्ष में करने लिए हरसंभव कोशिश कर रही हैं। फिलहाल तो ऐन वक्त पर आरक्षण का तीर छोड़कर कांग्रेस ने बाजी मार ली है। आरक्षण दिए जाने की खबर लगते ही कांग्रेस के घोर विरोधियों के भी सुर बदले हुए लग रहे हैं। राममंदिर के बाद मुद्दे की तलाश में भटक रही भाजपा को भी अपनी जुबानी जंग तीखी करने का अच्छा मौका मिल गया है। अब भाजपा मतों के ध्रुवीकरण में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। बिना ध्रुवीकरण के उसकी राजनीति चलती भी नहीं।&lt;br /&gt;अब तक मुसलिम वोटर भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए सूबे की कथित तौर पर धर्मनिरपेक्ष पार्टियों, सपा, कांग्रेस और बसपा को वोट करता रहा है, लेकिन इस बार स्थिति ऐसी नहीं है। भाजपा का 20 साल पहले जैसा डर अब मुसलिम वोटर के दिल में नहीं है। अब वह उसी पार्टी के साथ जाएगा, जो उनके वास्तविक विकास की बात करेगा।&lt;br /&gt;1992 में बाबरी मसजिद विध्वंस के बाद मुसलमानों का कांग्रेस से मोह भंग हुआ। इसी कारण कांग्रेस तभी से उत्तर प्रदेश में बियाबान में भटक रही है। मुलायम सिंह यादव को उन्होंने अपना रहनुमा बनाया, लेकिन वे मुसलिम वोट लेकर यादवों को भला करते रहे। बाद में उन्होंने कल्याण सिंह को गले लगाया, जिसकी कीमत उन्हें मुसलमानों की नाराजगी ङोलकर उठानी पड़ी।&lt;br /&gt;उन्होंने मुसलमानों से माफी भी मांगी, जिसका कोई मतलब नहीं रह गया था। मुसलमानों ने माफ किया भी नहीं।&lt;br /&gt;बसपा ने भी मुसलिम वोट लेकर सत्ता तो ली, लेकिन सत्ता में भागीदारी देने के नाम पर कुछ मुसलिम चेहरों को नवाजा। उन चेहरों ने सिर्फ अपना ही भला किया। आम मुसलमान को सत्ता में भागीदारी नहीं मिली। इसी वजह से मुसलमानों में अपना नेतृत्व खड़ा करने का जोश भरा। इसी जोश में कई राजनीतिक दल वजूद में आए, जो कहते हैं कि सबको आजमाने के बाद हमें आजमाया जाए। इनमें पीस पार्टी सबसे आगे नजर आती है। 2010 में हुए डुमरियागंज उपचुनाव में उसने सपा और कांग्रेस के कुल वोटों से भी ज्यादा वोट लेकर अपनी ताकत का एहसास कराया। यह अलग बात है कि उसे कुल मिले वोटों में मुसलिम वोट ही थे।&lt;br /&gt;पीस पार्टी के साथ दिक्कत यह है कि मुसलमानों में उसके बारे में यह धारणा बनती जा रही है कि वह भाजपा के लिए काम कर रही है। इसके पीछे कारण भी हैं। उनके भाषणों और बयानों में सबसे ज्यादा तीर बसपा, सपा और कांग्रेस पर ही छोड़े जाते हैं।&lt;br /&gt;भाजपा के लिए उसमें एक ह्यसॉफ्ट कॉर्नरह्ण नजर आता है। हालांकि पीस पार्टी दूसरे समुदायों को भी टिकट देकर अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि गढ़ने में लगी है, लेकिन दूसरे समुदाय को वोट उसे इसी तरह नहीं मिलेगा, जिस तरह भाजपा को मुसलिम वोट नहीं मिलता है।&lt;br /&gt;माना यही जा रहा है कि पीस पार्टी जैसे राजनीतिक दल मुसलिम वोटों को बरबाद ही करेंगे। वोटों की यह बरबादी सपा और कांग्रेस को ही नुकसान पहुंचाएगी और भाजपा को फायदा।&lt;br /&gt;अजीत सिंह का राष्ट्रीय लोकदल जाट-मुसलिम समीकरण के सहारे चुनाव में ताल ठोकेगा। लेकिन मुसलिमों को आरक्षण मिलने और जाटों की उपेक्षा से समीकरण गड़बड़ा भी सकता है।&lt;br /&gt;मुसलमान भी अभी 2009 में हुए लोकसभा की मुजफ्फरनगर सीट का चुनाव भूले नहीं हैं। उस वक्त रालोद का भाजपा से गठगंधन था। अजीत सिंह ने अपनी खास सहयोगी अनुराधा चौधरी को जिताने के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को मुजफ्फरनगर बुलाया था। पूरे शहर में जो पोस्टर लगाए गए थे, उनमें अजीत सिंह और अनुराधा चौधरी के साथ नरेंद्र मोदी की भी बड़ी तस्वीर लगाई गई थी। यही वजह रही कि मुसलमानों ने अनुराधा चौधरी को वोट नहीं दिया और उन्हें जबरदस्त हार का मुंह देखना पड़ा था। अजीत सिंह का जनाधार पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही है। यदि यहां के मुसलमान अभी भी 2009 के लोकसभा चुनाव को नहीं भूले हैं, तो उनके लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। हालांकि अभी पक्के तौर पर कहना मुश्किल है कि मुसलिम वोट कहां जाएगा, लेकिन इतना तय है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में मुसलिम वोट निर्णायक होने जा रहे हैं। हमेशा की तरह। हालिया मुसलिम आरक्षण के कार्ड में अन्य दल वोटों की इस लगभग कामयाब लगती कांग्रेसी काट के लिए क्या रणनीति अपनाते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा।&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 0, 0);"&gt;(जनवाणी के 26 दिसंबर के अंक में प्रकाशित)&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-6601606989308401451?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/6601606989308401451/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=6601606989308401451' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/6601606989308401451'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/6601606989308401451'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='विधानसभा चुनाव के पहले अल्पसंख्यक आरक्षण का दांव'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-729485253721547195</id><published>2011-11-27T09:40:00.000-08:00</published><updated>2011-11-27T09:42:22.575-08:00</updated><title type='text'>मुफ्तखोर हैं सब</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;a href="http://www.facebook.com/saleem.iect" hovercardx="/ajax/hovercard/user.php?id=1270893033" style="font-family: 'lucida grande', tahoma, verdana, arial, sans-serif; font-size: 11px; line-height: 14px; background-color: rgb(255, 255, 255); cursor: pointer; color: rgb(59, 89, 152); text-decoration: none; "&gt;&lt;b&gt;Saleem Akhter Siddiqui&lt;/b&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'lucida grande', tahoma, verdana, arial, sans-serif; font-size: 11px; line-height: 14px; background-color: rgb(255, 255, 255); "&gt;शहर के एक खाने के होटल के बाहर लाइन लगाकर बैठे लगभग दस- पंद्रह लोग होटल में आने वाले हर आदमी को उम्मीद भरी निगाह से देख रहे हैं। चेहरे-मोहरे से भिखारी लग रहे हैं। बदन के कपड़े मैलेकु चैले हैं। सर्दी से लड़ने के लिए कुछ के पास जगह-जगह से फटे हुए कंबल का सहारा है, तो कुछ महज एक ङीनी सी चादर से सर्दी से लड़ रहे हैं। जब कोई इन्हें पहली बार देखता है, तो समझ नहीं पाता कि ये लाइन लगाकर क्यों बैठे हैं। द&lt;/span&gt;&lt;span class="text_exposed_show" style="display: inline; font-family: 'lucida grande', tahoma, verdana, arial, sans-serif; font-size: 11px; line-height: 14px; background-color: rgb(255, 255, 255); "&gt;रअसल, इन फटेहाल लोगों को किसी ऐसे सखी शख्स का इंतजार है, जो उन्हें खाना खिला दे। इस होटल पर इस तरह का नजारा रोज ही दिखाई देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंतजार के लम्हे लंबे होते देख उनमें बैचेनी बढ़ रही है। उम्मीद खत्म होती जा रही है। गहराती सर्दियों की रात होने की वजह से सड़क भी सुनसान होने लगी है। घनी होती कोहरे की चादर के बीच उनमें से कुछ लोग और ज्यादा सिकुड़ गए हैं। एक शख्स अपने बच्चे के साथ होटल से खाना पैक करवा रहा है। बच्चा उन लोगों को बैठा देखकर अपने पिता से सवाल करता है, ‘पापा ये लोग यहां इस तरह क्यों बैठे हैं!’ उसके पिता ने कहा, ‘ये लोग इस इंतजार में हैं कि कोई आए और इन्हें खाना खिला दे, मुफ्तखोर हैं ये सब।’ थोड़े वक्फे के बाद चार-पांच युवाओं की टोली होटल में खाना खाने पहुंची है। हावभाव से लग रहा है कि वे नशे में हैं। हंसी-ठिठोली के बीच खाना खाते समय उनके बीच बाहर बैठे लोगों का जिक्र चल पड़ा है। ‘यार, इस देश में गुरबत बहुत है, देखो लोग बाहर कैसे खाने के लिए लाइन लगाए बैठे हैं।’ दूसरा उसकी बात काटते हुए कहता है, ‘सब हरामखोर हैं, नशेबाज। पैसा नशे में उड़ा देते हैं, चाहते हैं कि कोई खाना और खिला दे।’ ‘सच कह रहे हो! और अगर एक बार इन्हें खाना खिला दो, तो बस पीछे ही पड़ जाएंगे, अगले दिन फिर सामने आकर खड़े हो जाते हैं। जैसे दूसरों के पास इन पर खर्च करने के लिए ही पैसा है।’ बिल आ गया है। बिल भरकर वेटर को 50 रुपये टिप देना वे नहीं भूले।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-729485253721547195?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/729485253721547195/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=729485253721547195' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/729485253721547195'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/729485253721547195'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2011/11/blog-post_27.html' title='मुफ्तखोर हैं सब'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-3902521821047261450</id><published>2011-11-25T09:52:00.000-08:00</published><updated>2011-11-25T09:54:47.439-08:00</updated><title type='text'>यही फिजूलखर्ची पसंद नहीं</title><content type='html'>&lt;table width="100%" style="font-family: Arial; background-color: rgb(255, 255, 255); "&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td&gt;&lt;p class="haedlinesstory" style="font-size: 26px; text-align: left; text-decoration: none; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-weight: 800;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td&gt;&lt;b&gt;सलीम अख्तर सिद्दीकी&lt;/b&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td&gt;&lt;span   class="bodyd" style="text-align: justify; text-decoration: none; "&gt;&lt;p&gt;रात के ग्यारह बजे थे। शहर के व्यस्ततम चौराहे की एक पान की दुकान गुलजार थी। चमकते चेहरे लग्जरी गाड़ियों से आ रहे थे। पनवाड़ी सभी को उनकी पसंद के मुताबिक पान लगा रहा था। तरह-तरह के पान की फरमाइश हो रही थी। पान पर भी लोग इतने पैसे खर्च कर सकते थे, यही सोचकर हैरानी हो रही थी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन्हीं लोगों के बीच कुछ बच्चे बड़ी उम्मीद से पान खाने के शौकीनों के सामने हाथ फैलाते हुए दूर तक जाते थे। कई उनको ङिाड़कते हुए अपनी गाड़ी में जा बैठते थे, तो कई एक या दो रुपये उनके हाथ पर रख देते थे। इसी समय एक शानदार गाड़ी पनवाड़ी की दुकान पर आकर रुकी। उसमें से एक शानदार शख्सियत का मालिक उतरा। पनवाड़ी उसको पहचानता था। उसने दूर से ही आने वाले को जोरदार सलाम किया। उस शख्स को पनवाड़ी को कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शायद वह दुकान का नियमित ग्राहक था। पान वाले ने उसके लिए पान तैयार करके उनको पैक किया। कुछ सिगरेट के पैकेट दिए। आने वाला शख्स अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ा, तो एक बूढ़ी औरत ने उसकी तरफ हाथ बढ़ा दिया। उस शख्स ने हिचकिचाहट के साथ औरत की ओर देखते हुए अपना हाथ जेब की तरफ बढ़ाया और दस का नोट उस औरत के हाथ पर रख दिया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह शख्स ड्राइविंग सीट पर बैठा, तो पिछली सीट पर बैठी एक महिला की आवाज उभरी, जो शायद उस शख्स की पत्‍नी थी, ‘बस मुङो तुम्हारी यही फिजूलखर्ची पसंद नहीं है। क्या जरूरत थी उस औरत को दस रुपये देने की?’ पति ने प्रतिवाद किया, ‘अरे, मेरे पास खुल्ले पैसे नहीं थे तो क्या करता?’ मुझसे ले लेते, लेकिन आपको तो फिजूलखर्ची करने की आदत ही हो गई है। इन मांगने वालों को कितना भी दे दोगे, इनका पेट नहीं भरेगा। चलो अब मूड खराब हो गया है, कहीं ले जाकर आइसक्रीम खिलवा दो।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गाड़ी एक झटके से आगे बढ़ गई।&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-3902521821047261450?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/3902521821047261450/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=3902521821047261450' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/3902521821047261450'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/3902521821047261450'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2011/11/blog-post_25.html' title='यही फिजूलखर्ची पसंद नहीं'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-4231411196717899205</id><published>2011-11-04T00:35:00.000-07:00</published><updated>2011-11-04T00:36:02.274-07:00</updated><title type='text'>बिखराव के रास्ते पर अन्ना टीम</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(204, 0, 0);"&gt;सलीम अख्तर सिद्दीकी &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि अगस्त में अन्ना आंदोलन से जो उबाल जनता में आया था, नवंबर आते-आते वह इस तरह बैठ जाएगा, जैसे दूध में आया उबाल बैठ जाता है। अन्ना आंदोलन जितनी तेजी के साथ ऊंचाइयों पर गया था, उतनी तेजी के साथ नीचे आता जा रहा है। अन्ना टीम के बिखराव का दौर शुरू हो गया है। बिखराव का ही नतीजा है कि आंदोलन की धार कुंद पड़ने लगी है। यह इस बात से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश का दौरा कर रही अन्ना टीम के कार्यक्रमों में भीड़ नहीं जुट रही है। जब कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा जोड़कर शुरूआत की जाती है, तो ऐसा ही होता है। कई विचारधाराओं के लोग मिले और जल्दबाजी में एक ऐसी मुहिम छेड़ दी, जिसके लिए जबरदस्त ‘होमवर्क’ की जरूरत थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भ्रष्टाचार से उकताई जनता को अन्ना हजारे का चेहरा मिला और रामलीला मैदान में चले आमरण अनशन के दौरान मिले व्यापक जनसमर्थन से अन्ना टीम एक तरह से घमंड का शिकार होकर संसद से ऊपर होने का भ्रम पाल बैठी। यही भ्रम उसके बिखराव का कारण बना और उसके अंत की शुरूआत हो गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टीम के विचित्र बयानों ने बिखराव को तेज किया। टीम में तब वैचारिक मतभेद भी उभरकर आए, जब प्रशांत भूषण के कश्मीर संबंधी बयान से टीम ने अपने आपको अलग कर लिया। इससे पता चला कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भले ही टीम अन्ना एकजुट नजर आती हो, लेकिन राष्ट्रीय मुद्दों पर एक नहीं है। प्रशांत भूषण के बयान से अपने आप को अलग करने का एक नुकसान सबसे ज्यादा यह हुआ कि उस पर आरएसएस का समर्थन लेने के आरोप की एक तरह से पुष्टि हो गई। क्योंकि कश्मीर मुद्दे पर संघ परिवार की राय वही है, जो अन्ना टीम की तरफ से आई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल यह है कि टीम का ‘गठन’ करते समय ‘विचारधारा की समानता’ का ख्याल क्यों नहीं रखा गया? प्रशांत भूषण के बयान से अलग करने की एक वजह दक्षिणपंथी ताकतों का समर्थन खोने का डर भी अन्ना टीम को रहा होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे ज्यादा ‘घातक’ हिसार उपचुनाव में कांग्रेस को हराने की अपील रही। इससे टीम के उन नारों की धज्जियां उड़ गईं, जिनमें कहा जाता था कि ‘न हाथ, न हाथी, हम हैं अन्ना के साथी’ और ‘न साइकिल, न कमल, हम करेंगे अन्ना पर अमल’।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे नारों को जल्द ही भुलाकर इस मिथक को तोड़ दिया गया कि अन्ना आंदोलन गैरराजनीतिक है। हिसार में अन्ना टीम की अपील से यह भी पता नहीं चला कि कांग्रेस नहीं, तो फिर कौन? अधिकतर लोगों ने इसका मतलब यही निकाला कि ‘हाथ नहीं, कमल’ के साथ जाना है। लोग यह भी जानते हैं कि कमल पर भी तो ‘कीचड़’ लगी है। बात कमल की भी नहीं है, कौनसा ऐसा ‘निशान’ है, जो पाक-साफ है? आंदोलन के राजनीतिक होने से सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि जो लोग भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अन्ना के साथ आए थे, वे अलग होते जा रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मतभेदों, बयानबाजियों और आर्थिक विवादों में घिरने से अन्ना टीम की साख पर सवालिया निशान लगे हैं। टीम अन्ना के दो सदस्यों राजेंद्र सिंह और पीवी राजगोपाल ने अन्ना की कोर कमेटी से अलग होकर यह बता दिया कि वे आंदोलन के राजनीतिक होने के खिलाफ हैं। किरण बेदी का छूट के टिकट पर हवाई यात्राएं करना और आयोजकों से टिकट का पूरा पैसा वसूलना भ्रष्टाचार नहीं तो और क्या है? इस पर उनका मासूमियत भरा यह जवाब भी गला नहीं उतरता कि वे पूरा किराया वसूल करके गरीबों के लिए चल रहे एनजीओ में लगाती थीं। यह ऐसा ही हुआ, जैसे लुटेरा यह कहे कि मैं तो अमीरों को लूटकर गरीबों की मदद करता हूं। अरविंद केजरीवाल पर आरोप लगे हैं कि उन्होंने आंदोलन के लिए मिले चंदे का पैसा अपनी निजी संस्था के खाते में जमा किया है। कुमार विश्वास का का ‘विश्वास’ भी कठघरे में आ गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल यही है कि जो लोग भ्रष्टाचार खत्म करने का लक्ष्य मैदान में उतरें और उन्हीं का अतीत और वर्तमान काला नजर आने लगे तो जनता की उम्मीदें क्यों नहीं टूटेगीं? दरअसल, अन्ना ‘दूसरे जेपी’ बनने का सपना पाल बैठे थे, तो उनके सिपहासालार अन्ना के कंधों पर बैठकर 1977 दोहराने की कल्पना करने लगे थे। लेकिन अन्ना टीम कुछ ज्यादा ही जल्दी में थी। इसीलिए हिसार में वह ऐतिहासिक गलती कर बैठी। वह यह भी भूल गई कि 1977 और 2011 में बहुत अंतर आ गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1977 का आंदोलन भ्रष्टाचार को लेकर नहीं था। वह इमरजैंसी में हुई ज्यादतियों के खिलाफ ऐसा जनआंदोलन था, अन्ना आंदोलन जिसके आसपास भी नहीं ठहरता है। जेपी आंदोलन का ‘हिडन एजेंडा’ भी नहीं था यानी पूर्ण रूप से राजनीतिक था। जेपी आंदोलन में भी एकदम विपरीत विचारधाराओं के लोग थे, जिनका कम से कम आंदोलन के दौरान टकराव नहीं हुआ था। लक्ष्य पूरा हो जाने के बाद जरूर विचारधाराओं का टकराव हुआ, जिसकी परिणति जनता पार्टी के टूटने के रूप में हुई। अन्ना टीम लक्ष्य प्राप्त करने से पहले टूटने के कगार पर है। भले ही अन्ना टीम की कोर कमेटी को भंग न करने का फैसला लेकर एकजुटता दिखाने की कोशिश की गई हो, लेकिन आंदोलन की दरकती दीवारों को गिरने से रोकना मुश्किल नजर आ रहा है।&lt;br /&gt;(1 नवंबर को जनवाणी में प्रकाशित)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-4231411196717899205?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/4231411196717899205/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=4231411196717899205' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/4231411196717899205'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/4231411196717899205'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='बिखराव के रास्ते पर अन्ना टीम'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-1951921547220039991</id><published>2011-10-10T06:34:00.000-07:00</published><updated>2011-10-10T06:35:50.020-07:00</updated><title type='text'>इमाम बुखारी से कुछ सवाल!</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(204, 0, 0);"&gt;शीबा असलम फहमी ने मेल के जरिए बताया है कि कैसे इमाम बुखारी की सरपस्ती में जामा मसजिद इलाके में अपराध पनपते हैं। विरोध करने पर उनके घर पर हमला किया जाता है। सच यही है कि इमाम बुखारी ने एक तारीखी इमारत को अपनी जागीर बना लिया है। बहुत लोगों ने देखा होगा कि कैस जामा मसजिद के कैंपस को दुरुपयोग किया जाता है। हम शीबा पर हुए हमले की कड़े अलफाजों में मजम्मत करते हैं और दिल्ली पुलिस से दरख्वास्त करते हैं कि शीबा और उनके शौहर को सुरक्षा मुहैया कराए।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(0, 153, 0);"&gt;-सलीम अख्तर सिद्दीकी &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल जो कुछ मेरे परिवार के साथ हुआ है, उसकी संक्षिप्त पृष्ठभूमि इस प्रकार है। घटना-क्रम इतना लंबा है की इस समय एक एक घटना और लेखों पर प्रतिक्रिया का विवरण बताया नहीं जा सकता। मेरे परिवार पर अहमद बुखारी के गुंडों का यह पहला हमला नहीं है। हमारी सुरक्षा पर गंभीर खतरा देखते हुए कोर्ट ने अपनी तरफ से दिल्ली-पुलिस को आदेश दिए की हमें सुरक्षा मुहैया कराई जाए। 2008 से ही हमें पुलिस संरक्षण प्राप्त है। ऐसा इसलिए भी जरूरी है की बुखारी परिवार और उनका समर्थक अपराधी वर्ग भी, हमारे साथ एक ही गली/क्षेत्र में रहते हैं। साथियों आपको मेरे परिचय की जरुरत नहीं। मैं क्या लिखती हूँ, किन मुद्दों को उठती हूँ, ये कमोबेश आप जानते ही हैं। पिछले दिनों जेंडर-जिहाद कालम में, एनडीटीवी पर अभिज्ञान प्रकाश के 'मुकाबला' कार्यक्रम में 'जिहाद' पर हुई बहस के बाद भी मुझे धमकियाँ मिली थीं। इसके पहले के लेखों में गैर-प्रगतिशील मुल्ला वर्ग पर लिखने के कारण धमकियाँ मिलती ही रही हैं। कल भी जो घटना घटी, उसमें कहा गया की 'टीवी पर जो बोलती हो वो काम नहीं आएगा'। 'परिवार के एक भी आदमी को जिÞन्दा नहीं छोड़ेंगे'। 'चैनलवालों को बुला कर दिखा दो, अब इस इलाके में रहने तो नहीं देंगे।' जहाँ तक इमाम अहमद बुखारी का सवाल है, मैंने कई लेखों में राष्ट्रीय धरोहर जामा मस्जिद को, बुखारी परिवार के चंगुल से आजाद कराने पर सख्त लिखा है। इसके पीछे कई कारण हैं। सैद्धांतिक कारणों को अगर अलग भी कर दिया जाए तो एक ही परिवार के इस राष्ट्रीय धरोहर पर कब्जे के कारण एक आपराधिक माहौल और इसका आपराधिक दोहन भी जारी है। इसमें कई तरह की फीस/शुल्क का लगान, संपत्ति को किराये पर देने-लेने के मामलों के साथ ही ड्रग/नशा का तंत्र, सेक्स रैकेट, हवाला रैकेट, मटका/सत्ता जैसे अपराध धड़ल्ले से पनप रहे हैं। जिसको आप कभी भी स्वयं आ कर किसी भी शाम/रात देख सकते हैं। इस क्षेत्र की हालत ऐसी हो चुकी है की रहना तो दूर कोई शरीफ आदमी यहाँ से गुजारना भी ना चाहेगा।&lt;br /&gt;मेरे पति अरशद अली फहमी, जो की ‘दीन-दुनिया’ पत्रिका के उप-संपादक के साथ ही आरटीआई कार्यकर्ता भी हैं, अब तक विभिन्न मामलों में लगभग 20 आरटीआई लगा चुके हैं। यह इत्तेफाक है की मैंने और मेरे पति ने ही अब तक कई कवर स्टोरी, लेख और रिपोर्ट्स की हैं, जो की अहमद बुखारी के आर्थिक हितों के विरुद्ध हैं, जिनमें लीबिया के सदर कर्नल कज्जाफी के यहाँ से आने वाली कैश मदद को रुकवाने से लेकर बुखारी के अवैध निर्माण, जो शाही जामा मस्जिद परिसर के अन्दर जबरन बनाए गए हैं, और जिनके लिए कोर्ट से आदेश हैं की इन्हें हटाया (तोड़ा) जाए, भी शामिल हैं। बुखारी के चुनावी फतवों पर मैंने हिंदी-अंग्रेजी और मेरे पति ने उर्दू में खूब लिखा है। इसी के साथ-साथ हमने एक पोस्टर कैम्पेन भी चलाई है, जिसमें बुखारी के भ्रष्टाचार के स्रोतों पर सवाल उठाए हैं। ये सभी बातें राष्ट्रीय मीडिया में खूब उठाई गई हैं।&lt;br /&gt;इस समय जो सबसे जरूरी आरटीआई, जिसने बुखारी परिवार के हितों को आहत किया है वो है, जिसमें हमने संबंधित विभाग से पूछा है की ‘जामा मस्जिद परिसर के अन्दर मौजूद गली नंबर-3 में पार्क को कब्जा कर उसे पार्किंग में बदल कर जो पार्किंग चलाई जा रही है, उसका क्या स्टेटस है? क्या वह एमसीडी द्वारा आवंटित पार्किंग है?’ साथियों इस पार्किंग में कार के 50 /- प्रति घंटा और बस के 800/- प्रति दिन का रेट है, जो की पूरी दिल्ली में कहीं नहीं है। इस महंगी पार्किंग की कमाई सीधे बुखारी की जेब में जाती है। हर रोज यहाँ 150 से अधिक गाड़ियाँ आती हैं। अपने हालिया लेख 'ये शाही क्या होता है?' में भी इस मुद्दे को मैंने उठाया था, शायद आपको याद हो। इसके अलावा जामा मस्जिद में चोरी की गाड़ियाँ काटी जाती हैं। हाल ही में दो बार अपराधियों का रंगे हाथों पकड़वाया है। जामा मस्जिद क्षेत्र में अवैध करेंसी एक्सचेंज की लगभग 350 अवैध दुकाने हैं, जिनपर अगली आरटीआई कल ही तैयार की गई थी। इन सभी मामलों में आर्थिक अपराधियों का अहित लाजमी है और यह सभी अपराध किसकी छात्र छाया में पनप रहे हैं, यह बताने की जरुरत नहीं।&lt;br /&gt;परसों शाम ही एक कश्मीरी मजदूर जो की खाड़ी के एक देश से लौटा था, उसके लगभग 218000 /- के करेंसी एक्सचेंज के मामले में एक दूकानदार ने 44 हजार रुपए ये कह कर कम दिए की यह टैक्स और और सर्विस चार्ज में कट गए हैं। उसके पास इस कारोबार का लाइसेंस भी नहीं है, तो सरकारी टैक्स देने का सवाल ही नहीं पैदा होता। मजदूर ने जब पैसा माँगा तो उसे मार कर भगा दिया गया। ऐसी सूरत में किसी ने उसे हमारे अखबार के दफ़्तर भेजा की वहां मदद मिल सकती है। अरशद जी ने मामले को समझते हुए लोकल पुलिस को बुलाया और फिर उस दुकानदार को बुला कर मामला सुलझाने की कोशिश की। दुकानदार पैसा देने का राजी नहीं था। इत्तेफाक से वो उस अपराधी का बेटा निकला, जो की चोरी की गाड़ियां कटवाता है। बहरहाल पुलिस के दबाव में उसे उस मजदूर का पैसा वापिस करना पड़ा। लेकिन यह इत्तेफाक था की दोनों मामले बाप-बेटे के निकले और दोनों ही अपराधी हैं और बुखारी के नजदीकी हैं। वे लगातार उनके नाम की धौंस देते रहे। इस तरह कई चीजें आपस में  जुड़ गर्इं थीं। हमारे पास भी उसी शाम फोन आ गया था की कल हिसाब चुकाया जाएगा। हमने पुलिस को इत्तेला भी कर दी थी।कल की घटना की शुरूआत भी 'इमाम बुखारी जिÞन्दाबाद', के नारों से हुई। बाद की सारी घटना आप सब जानते हैं।&lt;br /&gt;कुछ सवाल&lt;br /&gt;    * सवाल है की अगर बुखारी परिवार इन अपराधियों को संरक्षित नहीं करता है, तो कैसे इनकी हिम्मत हो जाती है की वे इनका नाम अपने अपराध में इस्तेमाल करें?&lt;br /&gt;    * अपराध करते समय यह अपराधी 'अहमद बुखारी जिंदाबाद' के नारे लगाने से क्या संदेश देना चाहते हैं?&lt;br /&gt;    * आजतक उन्होंने इनकी इस हरकत पर रोक क्यों नहीं लगाई है?&lt;br /&gt;    * क्या इस देश की अदालत-पुलिस ने जामा मस्जिद को अपने कार्यक्षेत्र से अलग कर दिया है?&lt;br /&gt;    * क्या इस देश की अदालत का फैसला जामा मस्जिद इलाके में बेअसर है?&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(0, 102, 0);"&gt;शीबा असलम फहमी&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-1951921547220039991?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/1951921547220039991/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=1951921547220039991' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/1951921547220039991'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/1951921547220039991'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='इमाम बुखारी से कुछ सवाल!'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-5133296320269009010</id><published>2011-10-09T01:06:00.000-07:00</published><updated>2011-10-09T01:18:03.522-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div class="navbar section" id="navbar"&gt;&lt;div class="widget Navbar" id="Navbar1"&gt;  &lt;/div&gt;&lt;/div&gt; &lt;div class="body-fauxcolumns"&gt; &lt;div 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id="post-body-311015769215942232"&gt; &lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;उन्हें  साहित्य अकादमी पुरस्कार समेत करीब दो दर्जन पुरस्कारों से सम्मानित किया  जा चुका है। उनकी 24 पुस्तकें छप चुकी हैं, लेकिन यह तथ्य निदा फाजली की &lt;span&gt;ऊंचाई&lt;/span&gt; और कद की मिसाल पेश नहीं करते। असल में तो निदा पुरस्कारों, किताबों और अन्य &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;कामयाबियों&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt; से बड़े रचनाकार हैं, क्योंकि वे इंसानियत के  &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;फनकार&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt; हैं।&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family: trebuchet ms; font-size: 100%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 51, 0); font-weight: bold;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: trebuchet ms; font-size: 100%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;बहुत &lt;/span&gt;करीब  से देखने पर चीजें अक्सर बड़ी दिखाई देती हैं और करीब से बड़ी चीजों के सही  कद का अंदाजा लगाना भी मुमकिन नहीं होता। अपने समय से आगे के लोगों के बारे  में भी आज लिखना मुश्किल और उलझनों से भरा होता है। खासकर ऐसी शख्सियत के  बारे में, जिसने अपनी उम्र में अनगिनत पड़ाव देखे हों, जिसका जीवन टेढ़ी,  तिरछी, तंग गलियों से भी गुजरा हो और जिसने आसमानी ऊंचाई भी हासिल की हो।  हम बात कर रहे हैं मकबूल कवि, दार्शनिक शायर, संजीदा गीतकार और अपने समय के  सबसे बड़े रचनाकारों में शुमार निदा फाजली की। 12 अक्टूबर को निदा साहब 73  साल के हो जाएंगे। यह वह उम्र है, जहां किसी भी रचनाकार को इज्जत हासिल हो  सकती है, लेकिन निदा साहब की इज्जत करने के लिए उम्र कोई पैमाना नहीं। असल  में शायरी की लोकप्रियता भी इस इज्जत को सही ढंग से बयान नहीं करती है।  निदा उन शख्सियतों में शुमार हैं, जिन्हें तव्वजो देकर हमारे समाज, अदब और  इतिहास ने खुद इज्जत हासिल की है। यह बात पूरी गंभीरता से इसलिए सामने आनी  चाहिए, क्योंकि हमारे समय के अन्य शायर या कवि, जो शायद आज निदा के आसपास  की शख्सियत लगते हों, लेकिन असल में निदा उनसे बहुत बड़ी अदबी हैसियत रखते  हैं। निदा हमारे समय के उन गिने-चुने शायरों में हैं, जिनकी शायरी में कोई  कंट्राडिक्शन नहीं है। कोई भटकाव नहीं है। निदा एक-दो गजलों के शायर भी  नहीं है। हमारे समय की शायरी में मंचों पर ऐसे लोग भी प्रतिष्ठित हैं,  जिन्होंने अपने अश्आर के दर्शन को दूसरे मिसरे में ही काट दिया। यह भटकन,  यह उलझन, यह खम निदा में नहीं है। उनकी शायरी को कहीं से भी पकड़िए, आपको  इंसानी हक के पक्ष में सबसे जदीद बयान मिलेंगे। उनके मिसरों को कहीं से भी  उठाएं, निदा हमेशा दर्शन की सामाजिकता के पक्ष में मिलेंगे। यह इसलिए है कि  निदा सिर्फ हिट होने, या वाहवाही के शायरी नहीं है। शायरी उनके दिलो-दिमाग  में पैबस्त विचारों का खूबसूरत समुच्चय है। जिंदगी के उतार-चढ़ाव को करीब  से जीने वाले फाजली साहब ने हर रंग देखा है। इसीलिए उनकी शायरी जिंदगी की  शायरी है, अपनी पूरी आब और ताव में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;नन्हें &lt;/span&gt;निदा  के आसपास अदब का माहौल था। उनके पिता की शायरी में गहरी दिलचस्पी थी और घर  में उर्दू-फारसी के संग्रह बिखरे पड़े थे। लाजिमी था कि निदा को इन  किताबों, रिसालों से प्यार होना था। शायरी से प्यार हुआ और यह प्यार  हिंदुस्तान की सरजमीं से मुहब्बत में भी तब्दील हो गया। हिंदुस्तान से  प्यार की तस्दीक इस बात में होती है कि जब बंटवारे के बाद सारा फाजली  परिवार पाकिस्तान का रुख कर रहा था, तो भरी आंखों से निदा अपने कदम  हिंदुस्तान में ही जमाये रहे। 1954 में ग्वालियर से कॉलेज स्तर तक की पढ़ाई  की और आने वाली उम्र का खाका तैयार करने लगे। यही दौर था, जब निदा सूरदास  को पढ़ रहे थे। कबीर से रूबरू हो रहे थे और मीर-गालिब के दर्शन से परिचित हो  रहे थे। यह उर्दू साहित्य में परंपरिक लेखन का दौर था। गालिब के दर्शन की  ऊंचाई, मीर की गहराई, दाग की कशिश और जौक की रूमानियत पर उर्दू लेखन रुक  गया था। इन महान रचनाकारों के आगे नतमस्तक हिंदुस्तानी लेखन आगे बढ़ने की  तैयारी कर रहा था। निदा ने भी ठहरने के बजाए आगे बढ़ने को तरजीह दी।  उन्होंने अपनी शैली विकसित की और 1964 में मुंबई आ गए। मुंबई में मकबूलियत  से पहले मुफलिसी से दो-चार होना पड़ता है, और निदा के साथ भी ऐसा ही हुआ।  मुफलिसी से निजात के लिए लिए उन्होंने ‘धर्मयुग’ और ‘ब्लिट्ज’ जैसी  पत्रिकाओं में अपना योगदान दिया। नई शैली और जदीद सोच के कारण निदा फाजली  की प्रतिभा ने ध्यान खींचा और वे मुशायरों में हिस्सेदारी करने लगे। यहां  उन्हें शोहरत तो मिली, लेकिन आर्थिक तंगी से छुटकारा नहीं मिला था, जिस  कारण निदा अपना ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहे थे। इसके लिए उन्होंने  फिल्मों का रुख किया, लेकिन यहां कामयाबी उनसे रूठी रही। करीब दस साल तक  अखबारों, पत्रिकाओं और मुशायरों के सहारे जिंदगी खींचने के बाद 1980 में  ‘आप तो ऐसे ना थे’ फिल्म आई, जिसका एक गीत ‘तू इस तरह से मेरी जिंदगी में  शामिल है...’ लोगों की जुबान पर चढ़ा। इसके बाद फिल्म ‘आहिस्ता आहिस्ता’ में  ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता...’ जैसा गीत, जो आज मुहावरे की तरह  इस्तेमाल किया जाता है, भी निदा फाजली ने दिया। ‘रजिया सुल्तान’ से लेकर  ‘सरफरोश’ और ‘यात्रा’ तक निदा फाजली के गीत मुंबइया शैली के बीच अलग पहचाने  और सराहे जाते रहे हैं। लेकिन फिल्मी सफलता निदा फाजली की ऊंचाई का शीर्ष  नहीं है। असल में दोहे भी निदा की प्रतिभा और उनके फन की असली कसौटी नहीं  है। यही बात निदा को खास बनाती है। विधा कोई भी रही हो, निदा को अपने कहन  की वजह से जाना जाता है। आज रोजमर्रा की जिंदगी में हम-आप निदा के कई दोहों  को बातचीत के बीच लाते हैं। अपनी बात को सीधी-साधी भाषा में कहने के लिए  इस्तेमाल करते हैं। यही निदा की खासियत है। गरीबी और मुफलिसी को ‘सातों दिन  भगवान के क्या मंगल क्या पीर, जिस दिन सोए देर तक भूखा रहे फकीर’ जैसे  दोहे से बयान करने वाले निदा को भारत का बर्तोल्त ब्रेख्त भी कहा जाता है।  ब्रेख्त की तरह अपने पक्ष में मजबूती से खड़े निदा सत्ता प्रतिष्ठानों के  हमेशा खिलाफ रहे हैं। सांप्रदायिकता और उग्र राष्ट्रवाद की मुखालफत को पूरी  संजीदगी से धार देने वाले निदा ने महाराष्ट्र सरकार का पुरस्कार ठुकराकर  इसकी मिसाल पेश की थी। लहजे में तल्ख और विचारों में सादा निदा ने भटकने पर  अपने समकालीन लेखकों के खिलाफ भी खुलकर लिखा और बोला। जावेद अख्तर से उनके  मतभेद इसी की मिसाल हैं। अपनी इंसानी सोच के कारण निदा सत्ता के निशाने पर  भी रहे, बाल ठाकरे का अघोषित प्रतिबंध इसकी ताकीद करता है। निदा के बारे  में यह भी कहा जाता है कि वे अगर समझौते करते तो उन्हें कई और बड़ी फिल्मों  में गीत लिखने का मौका मिलता, लेकिन मुंबइया चाल के बजाए अपनी धुन को ही  उन्होंने इज्जत बख्शी और डिगे नहीं। निदा के बारे में जानना असल में उस  इंसान के बारे में जानना है, जो अपनी दुनिया में रहते हुए भी आगे की दुनिया  की खूबसूरती और इंसान को महफूज रखने के बारे में सोच रहा है। खुशामद से  परहेज करने वाले और हर किस्म के अन्याय के खिलाफ, हर मोर्चे पर मुखर होने  वाले निदा जिंदा शायर हैं। एक ऐसे शायर, जिसकी उम्र सालों में नहीं हो  सकती, उनकी उम्र शताब्दियों में होती है। आज के शायरों में निदा ऐसे अकेले  शायर हैं, जिनके बारे में कहा जा सकता है कि वे आने वाली कई शताब्दियों तक  इंसानी सोच को प्यार, मासूमियत, उसूल, नाजुकी और जिंदादिली बांटते रहेंगे,  क्योंकि वे बहुत छोटे काम करने के लिए प्रेरित करते हैं, लेकिन उनके मायने  बड़े होते हैं। मिसाल के तौर पर निदा कहते हैं,&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;घर से मसजिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें&lt;/span&gt; &lt;span style="font-weight: bold;"&gt;किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;यह  हंसाना, जिंदगी को जीने का ढंग भी बताता है, जो निदा को आता है, और वे  दूसरों को जिंदा रहने का हौसला देते हैं। ऐसे अजीम इंसान को जन्मदिन  मुबारक।&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;span style="font-size: 85%;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;br /&gt;(9 अक्तूबर 2011 को जनवाणी में प्रकाशित)&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;  &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-5133296320269009010?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/5133296320269009010/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=5133296320269009010' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/5133296320269009010'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/5133296320269009010'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2011/10/24-12-73-1954-1964-1980.html' title=''/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-7937535713124921076</id><published>2011-09-30T06:52:00.000-07:00</published><updated>2011-09-30T06:53:34.322-07:00</updated><title type='text'>अमेरिका पोषित ‘इसलाम’ का कहर</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(204, 0, 0);"&gt;सलीम अख्तर सिद्दीकी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अमेरिका उन लोगों को खत्म करना चाहता है, जिन्होंने अफगानिस्तान से रूस को बाहर निकालने में उसकी मदद की थी। वह उस ‘इसलाम’ से परेशान हो गया है, जो उसने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की मदद से अफगानिस्तान के बच्चों को घुट्टी में पिलाया था। जब उसका पढ़ाया इसलाम उसका ही दुश्मन बन गया है, तो वह पाकिस्तान से कह रहा है कि वह हक्कानी नेटवर्क खत्म करने में उसकी मदद करे। पाकिस्तान ने भी अमेरिका को आंखें दिखाते हुए अमेरिका के फरमान को यह कहकर मानने से इंकार कर दिया है कि हक्कानी नेटवर्क उसका ही पाला-पोसा हुआ है। बात यहां तक बिगड़नी शुरू हो गई कि यदि अमेरिका स्वयं वजीरिस्तान में सैनिक कार्रवाई करता है, तो पाकिस्तान उसका जवाब देगा।&lt;br /&gt;अमेरिका ने अफगानिस्तान से सोवियत सेनाओं को खदेड़ने के लिए जिन लोगों को तैयार किया था, वे आज न केवल पाकिस्तान और अमेरिका के लिए, बल्कि भारत के लिए भी बड़ा सिरदर्द बने हुए हैं। जिस तरह से पाकिस्तान में आतंकवादी मसजिदों और जनाजों पर गोलियां और बम बरसाकर लोगों को हलाक कर हैं, ये हरकत किसी ऐसे गुट की नहीं हो सकती, जो अपने आप को इसलाम का अनुयायी कहता है। ये सरासर गैरइसलामी हरकतें हैं। जो इसलाम पड़ोसी के भूखा रहने पर खाना हराम बताता हो, इसलाम शिक्षा के लिए चीन तक जाने की बात करता हो, औरतों की इज्जत करने की हिदायत देता है। सबसे बड़ी बात यह कि इसलाम एक बेगुनाह के कत्ल को पूरी इंसानियत का कत्ल बताता है, उस इसलाम के बारे में कुछ लोगों की करतूतों से पूरी दुनिया में यह संदेश गया है कि यह एक दकियानूसी और खून-खराबे वाला धर्म है। जेहाद के बारे में बता दिया गया है कि मानव बम बनकर लोगों को मारोगे, तो सीधे ‘जन्नत’ मिलेगी। उन मासूमों को क्या पता कि बेगुनाह लोगों का खून बहाओगे, तो जन्नत नहीं, ‘दोजख’ की आग मिलेगी। अमेरिका ने जो इसलाम पढ़ाया, वह अब इतना ताकतवर हो गया है कि पाकिस्तानी फौज तो पस्त हो ही गई है, अमेरिका और यूरोप भी परेशान हैं। अफगानिस्तान से फारिग होने के बाद अमेरिका द्वारा तैयार किए आतंकवादियों का रुख वहां भी हुआ, जो यह समझते थे कि हम सात समंदर पार  हैं, इसलिए महफूज हैं। वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद अमेरिका का यह गुरूर भी टूटा।&lt;br /&gt;इधर, जब नब्बे के दशक की शुरुआत में सोवियत यूनियन का मर्सिया पढ़ा जा रहा था, तो भारत में बाबरी-मसजिद और राममंदिर आंदोलन के चलते सांप्रदायिकता पूरे उभार पर थी, जिसकी परिणति बाबरी मसजिद विध्वंस और खूनी सांप्रदायिक दंगों के रूप में हुई। अमेरिकी पोषित आतंकवादियों का मुंह भारत की ओर हुआ और उन्हें खून खराबे करने के तर्क के रूप में बाबरी मसजिद विध्वंस और बाद में गुजरात दंगा मिल गया।&lt;br /&gt;मुंबई के आतंकी हमलावरों ने जब ताज होटल में बेकसूरों को बंधक बनाया था, तो बंधकों में से एक ने हिम्मत करके पूछा था, ‘तुम लोग ऐसा क्यों कर रहे हो ?’ इस पर एक आतंकी ने कहा था, ‘क्या तुमने बाबरी मसजिद का नाम नहीं सुना? क्या तुमने गुजरात के बारे में नहीं सुना?’ दरअसल, आतंकी बाबरी मसजिद और गुजरात का हवाला देकर अपनी नापाक हरकत को पाक ठहराने का कुतर्क दे रहे थे। इन आतंकियों को पता होना चाहिए कि जिन बेकसूर को उन्होंने निशाना बनाया था, वे बाबरी मसजिद विध्वंस और गुजरात दंगों के लिए जिम्मेदार नहीं थे? भारतीय मुसलमानों की हमदर्दी का नाटक करने वाले आतंकी संगठन क्या इस तरह से फायरिंग करते हैं या बमों को प्लांट करते हैं, जिससे मुसलमान बच जाएं और दूसरे समुदाय के लोग मारे जाएं? मुंबई हमलों में ही 40 मुसलमानों ने अपनी जान गंवाई थी और 70 के लगभग घायल हुए थे। बेगुनाहों को निशाना बनाकर बाबरी मसजिद और गुजरात का कैसा बदला लिया जाता है, यह समझ से बाहर है। और यह भी कि कौन-सा इसलाम इस बात की इजाजत देता है? पाकिस्तान में नमाजियों से भरी मसिजद को बमों से उड़ाकर कौन सी मसजिद विध्वंस का बदला लिया जाता है? आत्मघाती हमलों में बेकसूर लोगों की जान लेकर किस गुजरात का बदला लिया जाता है?&lt;br /&gt;अब अमेरिका को समझ में आ रहा है कि जो भस्मासुर उसने सोवियत यूनियन के लिए तैयार किया था, उसका रुख अब पूरी दुनिया के ओर हो गया है। इस भस्मासुर को तैयार करने में मदद करने वाला पाकिस्तान भी अब दोराहे पर खड़ा है। उसके लिए ‘इधर कुआं, उधर खाई’ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। यदि वह हक्कानी गुट के सफाए के लिए आगे आता है, तो आतंकवादी उसका जीना हराम कर देंगे। नहीं करता है, तो अमेरिका आगे आने लिए तैयार है। बहुत दिनों से यह बात की जा रही है कि अमेरिका के निशाने पर अब पाकिस्तान है, लेकिन अमेरिका फिलहाल इराक और अफगानिस्तान में उलझा हुआ है, इसलिए पाकिस्तान उसे आंखें दिखा रहा है, लेकिन बकरे मां कब तक खैर मनाएगी?  &lt;br /&gt;(लेखक जनवाणी से जुडेÞ हैं)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-7937535713124921076?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/7937535713124921076/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=7937535713124921076' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/7937535713124921076'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/7937535713124921076'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='अमेरिका पोषित ‘इसलाम’ का कहर'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-4962861996709554040</id><published>2011-07-07T06:56:00.000-07:00</published><updated>2011-07-07T06:57:01.351-07:00</updated><title type='text'>‘बोल्डनेस’ शादी से पहले क्यों नहीं दिखाई थी?</title><content type='html'>&lt;h3 class="post-title entry-title"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/h3&gt; &lt;div class="post-header"&gt;  &lt;/div&gt;  &lt;p&gt;&lt;span class="bodyd" style="font-family: mangal; color: rgb(44, 44, 44);"&gt;‘अजब   प्रेम की गजब की कहानी’ कह लीजिए या कुछ और। मामला एकता कपूर के सीरियल  की  कहानी से भी आगे का है। एकता कपूर ने भी वह सब दिखाने की हिम्मत नहीं   दिखाई, जो आरती ने असल जिंदगी में कर दिखाया। रुद्रपुर की आरती का विवाह   मेरठ के नीतिश के साथ हुआ था। पहले दिन ही आरती ने नीतिश से कह दिया कि वह   विनीत से शादी कर चुकी है। नितीश ने भी शायद भावनाओं में बहकर उसे ‘बहन’   बना डाला। रिश्तों का इस तरह से शायद ही कभी मजाक बना हो। पहले दिन ही आरती   का नितीश को असलियत बता देना उसका ‘बोल्ड’ कदम कहा जा सकता है, लेकिन  सवाल  यह है कि उसने यह ‘बोल्डनेस’ शादी से पहले क्यों नहीं दिखाई थी? आरती  जो  कुछ कर चुकी थी, उसमें वह सब अपने पिता को बताने की हिम्मत नहीं थी।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="bodyd" style="font-family: mangal; color: rgb(44, 44, 44);"&gt;   सवाल यह है कि शादी के फौरन बाद उसमें अपने पति को असलियत बताने की  हिम्मत  कैसे आ गई? यदि वह शादी से पहले ऐसा कर पाती तो नितीश की जिंदगी  दोराहे पर  खड़ी नहीं होती। न ही उसके परिवार की इज्जत तार-तार होती। जैसे  इतना ही  काफी नहीं था। अब वही आरती अपने पिता के पास पहुंचते ही नितीश और  उसके  परिवार को अदालत में खींचने की साजिश कर रही है और ‘पत्‍नी’ के बाद  ‘बहन’  के रिश्ते को भी बदनाम करने पर तुली नजर आ रही है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="bodyd" style="font-family: mangal; color: rgb(44, 44, 44);"&gt;   दरअसल, मीडिया ने युवा पीढ़ी को जेट रफ्तार से बहुत आगे पहुंचा दिया है,   जबकि समाज अभी पुरानी मान्यताओं और रूढ़िवाद में ही फंसा हुआ है। आरती   प्रकरण को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। आरती घर वालों से   छुपकर शादी तो कर लेती है, लेकिन रूढ़िवादी पिता के सामने उसे बताने की   हिम्मत नहीं जुटा पाती। अब जब वह पिता के संरक्षण में चली गई है तो एक बार   फिर वह सब कुछ करने तैयार है, जो पिता चाहता है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="bodyd" style="font-family: mangal; color: rgb(44, 44, 44);"&gt;   सच तो यह है कि हम सब के अंदर कहीं न कहीं जातिवाद और धर्म इतना गहरे पैठ   किए हुए है कि उससे बाहर आना नहीं चाहते। जो बाहर आना चाहते हैं, उनमें  से  कई को अपनी जान देकर उसकी कीमत चुकानी पड़ती है। कहने को तो समाज के एक   वर्ग ने आधुनिकता और प्रगातिशीलता का लबादा ओढ़ लिया है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="bodyd" style="font-family: mangal; color: rgb(44, 44, 44);"&gt;   पाश्चाज्य जीवन शैली अपना ली है। खड़े होकर खाना सीख गए हैं। बारातों में   सड़कों पर डांस करना सीख लिया है। हम यह कहते नहीं अघाते कि ‘जोड़ियां   स्वर्ग’ में बनती हैं, लेकिन जब परिवार का लड़का या लड़की अपनी मर्जी से   शादी कर लेते हैं तो पता चलता है कि जोड़ियां स्वर्ग में नहीं बनतीं, समाज   बनाता है। प्रेम और विवाह के मामले में घोर परंपरावादी और पक्के भारतीय   संस्कृति के रखवाले बन जाते हैं। इन्हीं लोगों में कहीं न कहीं तालिबान   वाली मानसिकता छिपी होती है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="bodyd" style="font-family: mangal; color: rgb(44, 44, 44);"&gt;   हम यह क्यों नहीं सोचते कि इक्कसवीं सदी चल रही है। इस सदी में वह सब कुछ   हो रहा है, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी। भारत में मल्टीनेशनल  कंपनियों  की बाढ़ आई हुई है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="bodyd" style="font-family: mangal; color: rgb(44, 44, 44);"&gt;   इन कंपनियों में सभी जातियों और धर्मो की लड़कियां और लड़के कंधे से कंधा   मिलाकर काम कर रहे हैं। सहशिक्षा ले रहे हैं। साथसा थ कोचिंग कर रहे हैं।   इस बीच अंतरधार्मिक, अंतरजातीय और एक गोत्र के होते हुए भी प्रेम होना   अस्वाभाविक नहीं है। प्रेम होगा तो शादियां भी होंगी। समाज और परिवार से   बगावत करके भी होंगी। अब कोई लड़की किसी गैर जाति लड़के से प्रेम कर बैठे   तो उसकी जान ले लेना तालिबानी मानसिकता नहीं तो और क्या कही जाएगी? याद   रखिए, संकीर्णता और आधुनिकता एक साथ नहीं चल सकतीं। आजकल चल यह रहा है कि   आधुनिकता की होड़ में पहले तो लड़कियों को पूरी आजादी दी जाती है। उनसे यह   नहीं पूछा जाता कि उन्होंने भारतीय लिबास को छोड़कर टाइट जींस और स्लीवलेस   टॉप क्यों पहनना शुरू कर दिया है? मां-बाप कभी अपनी बेटी का मोबाइल भी  चैक  नहीं करते कि वह घंटों-घंटों किससे बतियाती रहती है। उसके पास महंगे  कपड़े  और गैजट कहां से आते हैं। जब इन्हीं मां-बाप को एक दिन पता चलता है  कि उनकी  लड़की किसी से प्रेम और वह भी दूसरे धर्म, जाति या समान गोत्र के  लड़के से  करती है तो उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसकती नजर आती है।  उन्हें फौरन ही  अपनी धार्मिक और जातिगत पहचान याद आ जाती है। भारतीय  परंपराओं की दुहाई  देने लगते हैं। जमाना तेजी के साथ बदल रहा है। लड़कियां  आत्मनिर्भर हुई हैं  तो उन्हें अपने अधिकार भी पता चले हैं।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="bodyd" style="font-family: mangal; color: rgb(44, 44, 44);"&gt; उदारीकरण के इस दौर में प्रेम और शादी के मामले में युवा उदार हुए हैं। लेकिन मां-बाप और भाई उदार होने को तैयार नहीं हैं।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="bodyd" style="font-family: mangal; color: rgb(44, 44, 44);"&gt;   ‘इज्जत’ के नाम पर कितनी ही बबलियों को मार दीजिए, युवाओं में परिवर्तन  की  इस आंधी को नहीं रोका जा सकता है। वक्त बदल रहा है। सभी को वक्त के साथ   बदलना पड़ेगा। वरना फिर मान लीजिए कि अफगानिस्तान में तालिबान और भारत  में  खाप पंचायतें जो कुछ भी कर रही हैं, ठीक कर रही हैं।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="bodyd" style="font-family: mangal; color: rgb(44, 44, 44);"&gt;   दरअसल, भारतीय समाज संकीर्णता और आधुनिकता के बीच झूल रहा है। वह यह ही  तय  नहीं कर पा रहा है कि उसे किधर जाना है। समाज को यह तो तय करना ही  पड़ेगा  कि हमारी प्रगतिशीलता की सीमा क्या है? हमें किधर जाना है? (लेखक  जनवाणी से  जुड़े हैं) उदारीकरण के इस दौर में प्रेम और शादी के मामले में  युवा उदार  हुए हैं। लेकिन मां-बाप और भाई उदार होने को तैयार नहीं हैं।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-4962861996709554040?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/4962861996709554040/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=4962861996709554040' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/4962861996709554040'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/4962861996709554040'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2011/07/blog-post_07.html' title='‘बोल्डनेस’ शादी से पहले क्यों नहीं दिखाई थी?'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-6488961417833358328</id><published>2011-07-05T07:54:00.000-07:00</published><updated>2011-07-05T07:57:20.207-07:00</updated><title type='text'>‘बोल्डनेस’ शादी से पहले क्यों नहीं दिखाई थी?</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;span class="bodyd"   style="font-family:mangal;color:#2c2c2c;"&gt;‘अजब  प्रेम की गजब की कहानी’ कह लीजिए या कुछ और। मामला एकता कपूर के सीरियल की  कहानी से भी आगे का है। एकता कपूर ने भी वह सब दिखाने की हिम्मत नहीं  दिखाई, जो आरती ने असल जिंदगी में कर दिखाया। रुद्रपुर की आरती का विवाह  मेरठ के नीतिश के साथ हुआ था। पहले दिन ही आरती ने नीतिश से कह दिया कि वह  विनीत से शादी कर चुकी है। नितीश ने भी शायद भावनाओं में बहकर उसे ‘बहन’  बना डाला। रिश्तों का इस तरह से शायद ही कभी मजाक बना हो। पहले दिन ही आरती  का नितीश को असलियत बता देना उसका ‘बोल्ड’ कदम कहा जा सकता है, लेकिन सवाल  यह है कि उसने यह ‘बोल्डनेस’ शादी से पहले क्यों नहीं दिखाई थी? आरती जो  कुछ कर चुकी थी, उसमें वह सब अपने पिता को बताने की हिम्मत नहीं थी।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="bodyd"   style="font-family:mangal;color:#2c2c2c;"&gt;  सवाल यह है कि शादी के फौरन बाद उसमें अपने पति को असलियत बताने की हिम्मत  कैसे आ गई? यदि वह शादी से पहले ऐसा कर पाती तो नितीश की जिंदगी दोराहे पर  खड़ी नहीं होती। न ही उसके परिवार की इज्जत तार-तार होती। जैसे इतना ही  काफी नहीं था। अब वही आरती अपने पिता के पास पहुंचते ही नितीश और उसके  परिवार को अदालत में खींचने की साजिश कर रही है और ‘पत्‍नी’ के बाद ‘बहन’  के रिश्ते को भी बदनाम करने पर तुली नजर आ रही है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="bodyd"   style="font-family:mangal;color:#2c2c2c;"&gt;  दरअसल, मीडिया ने युवा पीढ़ी को जेट रफ्तार से बहुत आगे पहुंचा दिया है,  जबकि समाज अभी पुरानी मान्यताओं और रूढ़िवाद में ही फंसा हुआ है। आरती  प्रकरण को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। आरती घर वालों से  छुपकर शादी तो कर लेती है, लेकिन रूढ़िवादी पिता के सामने उसे बताने की  हिम्मत नहीं जुटा पाती। अब जब वह पिता के संरक्षण में चली गई है तो एक बार  फिर वह सब कुछ करने तैयार है, जो पिता चाहता है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="bodyd"   style="font-family:mangal;color:#2c2c2c;"&gt;  सच तो यह है कि हम सब के अंदर कहीं न कहीं जातिवाद और धर्म इतना गहरे पैठ  किए हुए है कि उससे बाहर आना नहीं चाहते। जो बाहर आना चाहते हैं, उनमें से  कई को अपनी जान देकर उसकी कीमत चुकानी पड़ती है। कहने को तो समाज के एक  वर्ग ने आधुनिकता और प्रगातिशीलता का लबादा ओढ़ लिया है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="bodyd"   style="font-family:mangal;color:#2c2c2c;"&gt;  पाश्चाज्य जीवन शैली अपना ली है। खड़े होकर खाना सीख गए हैं। बारातों में  सड़कों पर डांस करना सीख लिया है। हम यह कहते नहीं अघाते कि ‘जोड़ियां  स्वर्ग’ में बनती हैं, लेकिन जब परिवार का लड़का या लड़की अपनी मर्जी से  शादी कर लेते हैं तो पता चलता है कि जोड़ियां स्वर्ग में नहीं बनतीं, समाज  बनाता है। प्रेम और विवाह के मामले में घोर परंपरावादी और पक्के भारतीय  संस्कृति के रखवाले बन जाते हैं। इन्हीं लोगों में कहीं न कहीं तालिबान  वाली मानसिकता छिपी होती है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="bodyd"   style="font-family:mangal;color:#2c2c2c;"&gt;  हम यह क्यों नहीं सोचते कि इक्कसवीं सदी चल रही है। इस सदी में वह सब कुछ  हो रहा है, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी। भारत में मल्टीनेशनल कंपनियों  की बाढ़ आई हुई है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="bodyd"   style="font-family:mangal;color:#2c2c2c;"&gt;  इन कंपनियों में सभी जातियों और धर्मो की लड़कियां और लड़के कंधे से कंधा  मिलाकर काम कर रहे हैं। सहशिक्षा ले रहे हैं। साथसा थ कोचिंग कर रहे हैं।  इस बीच अंतरधार्मिक, अंतरजातीय और एक गोत्र के होते हुए भी प्रेम होना  अस्वाभाविक नहीं है। प्रेम होगा तो शादियां भी होंगी। समाज और परिवार से  बगावत करके भी होंगी। अब कोई लड़की किसी गैर जाति लड़के से प्रेम कर बैठे  तो उसकी जान ले लेना तालिबानी मानसिकता नहीं तो और क्या कही जाएगी? याद  रखिए, संकीर्णता और आधुनिकता एक साथ नहीं चल सकतीं। आजकल चल यह रहा है कि  आधुनिकता की होड़ में पहले तो लड़कियों को पूरी आजादी दी जाती है। उनसे यह  नहीं पूछा जाता कि उन्होंने भारतीय लिबास को छोड़कर टाइट जींस और स्लीवलेस  टॉप क्यों पहनना शुरू कर दिया है? मां-बाप कभी अपनी बेटी का मोबाइल भी चैक  नहीं करते कि वह घंटों-घंटों किससे बतियाती रहती है। उसके पास महंगे कपड़े  और गैजट कहां से आते हैं। जब इन्हीं मां-बाप को एक दिन पता चलता है कि उनकी  लड़की किसी से प्रेम और वह भी दूसरे धर्म, जाति या समान गोत्र के लड़के से  करती है तो उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसकती नजर आती है। उन्हें फौरन ही  अपनी धार्मिक और जातिगत पहचान याद आ जाती है। भारतीय परंपराओं की दुहाई  देने लगते हैं। जमाना तेजी के साथ बदल रहा है। लड़कियां आत्मनिर्भर हुई हैं  तो उन्हें अपने अधिकार भी पता चले हैं।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="bodyd"   style="font-family:mangal;color:#2c2c2c;"&gt; उदारीकरण के इस दौर में प्रेम और शादी के मामले में युवा उदार हुए हैं। लेकिन मां-बाप और भाई उदार होने को तैयार नहीं हैं।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="bodyd"   style="font-family:mangal;color:#2c2c2c;"&gt;  ‘इज्जत’ के नाम पर कितनी ही बबलियों को मार दीजिए, युवाओं में परिवर्तन की  इस आंधी को नहीं रोका जा सकता है। वक्त बदल रहा है। सभी को वक्त के साथ  बदलना पड़ेगा। वरना फिर मान लीजिए कि अफगानिस्तान में तालिबान और भारत में  खाप पंचायतें जो कुछ भी कर रही हैं, ठीक कर रही हैं।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="bodyd"   style="font-family:mangal;color:#2c2c2c;"&gt;  दरअसल, भारतीय समाज संकीर्णता और आधुनिकता के बीच झूल रहा है। वह यह ही तय  नहीं कर पा रहा है कि उसे किधर जाना है। समाज को यह तो तय करना ही पड़ेगा  कि हमारी प्रगतिशीलता की सीमा क्या है? हमें किधर जाना है? (लेखक जनवाणी से  जुड़े हैं) उदारीकरण के इस दौर में प्रेम और शादी के मामले में युवा उदार  हुए हैं। लेकिन मां-बाप और भाई उदार होने को तैयार नहीं हैं।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-6488961417833358328?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/6488961417833358328/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=6488961417833358328' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/6488961417833358328'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/6488961417833358328'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='‘बोल्डनेस’ शादी से पहले क्यों नहीं दिखाई थी?'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-7187993340807273920</id><published>2011-05-27T10:49:00.000-07:00</published><updated>2011-05-27T10:50:31.122-07:00</updated><title type='text'>वक्त और इंसानियत</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;सलीम अख्तर सिद्दीकी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;सुबह के दस बजे हैं। मैं आॅफिस जाने के लिए सिटी बस का इंतजार कर रहा हूं। धूपी बहुत तीखी है। एक दुकान के शेड के नीचे जाने की सोचता ही हूं कि बस आती दिखाई दे जाती है। बस को हाथ से रूकने का इशारा करता हूं। बस में सवार होता ही हूं कि कंडक्टर की आवाज आती है, ‘कहां जाना है?’ मैं समझता हूं, कंडक्टर मुझसे मुखातिब है। मैं पैसे निकालने के लिए जेब में हाथ डालता हुआ आवाज की दिशा में देखता हूं तो कंडक्टर एक महिला से मुखातिब था। महिला की उम्र यही कोई 30-35 साल रही होगी। वह निहायत ही गंदे कपड़े पहने हुए थी। उसके पास एक गंदी से पोटली थी, जिसमें से उसकी ‘गृहस्थी’ का सामान कुछ-कुछ नुमायां हो रहा था। चेहरे मोहरे से वह स्थानीय नहीं लग रही थी। उसकी गोद में लगभग दो साल का बच्चा था। वह सूरत से ही बीमार लग रहा था। उसकी नाक बह रही थी। बच्चे के हाथ में खुला हुआ ग्लूकोज के बिस्कुट का पैकेट था। उसमें से उसने एक या दो बिस्कुट ही खाए होंगे। वह शून्य में निहार रहा था। महिला कंडक्टर की बात का जवाब नहीं देती। बस शून्य में निहारती रहती है। कंडक्टर अबकी बार कुछ जोर से उससे कहता है, ‘अरी, कहां जाना है, बता तो सही?’ महिला अबकी बार भी कोई जवाब नहीं देती। कंडक्टर झुंझला जाता है। वह उसे पकड़कर झिंझोड़ना चाहता है, लेकिन उसके गंदे कपड़े देखकर ठिठक जाता है। इस बीच अन्य मुसाफिर भी उसकी ओर मुतवज्जह हो जाते हैं। एक महिला उपहास के स्वर में कहती है, ‘बताओ कैसीऔरत है, जवाब ही नहीं देती है।’ इतना कहकर वह ठहाका मारकर हंस पड़ती है। इस बात का भी कोई असर महिला पर नहीं होता। वह लगातार शून्य में देखे जा रही है। कंडक्टर ड्राइवर से बस रोकने के लिए कहता है। बस साइड में रूक जाती है। बस रूकते ही मुसाफिरों में बैचेनी होने लगती है। उन्हें लग रहा था कि महिला की वजह से उन्हें देर हो रही है। एक मौलाना कंडक्टर से नाराजगी से कहते हैं, ‘अरे यार इसे नीचे उतारो, इसकी वजह से सब लेट हो रहे हैं।’ मैं मौलना से कहता हूं, ‘मौलाना इतना नाराज क्यों हो रहे हो, पता नहीं कौन है ये? एक बार फिर पूछ लो, इसे कहां जाना है, आफिस के लिए तो मैं भी लेट हो रहा हूं?’ मौलाना तल्खी से कहते हैं, ‘तुम्हें इतना तरस आ रहा है, तो तुम्हीं पूछ लो, इसे कहां जाना है।’ मैं उसे झिंझोड़कर बार-बार उसके बारे में पूछता हूं, लेकिन वह टस से मस नहीं होती। बस उसके चेहरे पर दर्द भरे भाव आते हैं। उसकी आंखों में बेबसी और लाचारी साफ झलक रही है। मौलाना के सब्र का पैमाना छलक जाता है। वह बहुत ही तल्खी से कंडक्टर से महिला को नीचे उतारने का आदेश देते हैं। कंडक्टर कुछ हिचकिचाता है। शायद उसके दिल में महिला के प्रति कुछ  हमदर्दी है। थोड़ी देर में सब मुसाफिर उसे नीचे उतारने के लिए कंडक्टर पर जोर देने लगते हैं। कंडक्टर उसे जबरदस्ती बस से उतार देता है। उसकी पोटली सड़क पर पटक दी जाती है। बस चल दी है। महिला जाती हुई बस की तरफ देखती भी नहीं। वह गुमसुम पोटली उठाकर चारों तरफ देखने लगती है। धूप और ज्यादा तीखी हो गई है। शायद कोई साया तलाश करने लगी है। मुसाफिरों के चेहरों पर संतोष के भाव उभर आए हैं। मौलाना विजयी मुस्कान के साथ बस में चारों तरफ नजर दौड़ाते हुए जेब से मोबाईल निकालकर उसमें वक्त देखते हुए बड़बड़ाते हैं, ‘इस औरत की वजह से पूरे पंद्रह मिनट लेट हो गए हैं।’&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-7187993340807273920?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/7187993340807273920/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=7187993340807273920' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/7187993340807273920'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/7187993340807273920'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2011/05/blog-post_1104.html' title='वक्त और इंसानियत'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-5833664040815357836</id><published>2011-05-27T10:07:00.000-07:00</published><updated>2011-05-27T10:09:06.044-07:00</updated><title type='text'>वोट कटवा’ मुसलिम राजनैतिक दल</title><content type='html'>&lt;h2 class="title"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/h2&gt;&lt;br /&gt;                   &lt;div class="entry"&gt;                                       &lt;a href="http://hastakshep.com/wp-content/uploads/images76.jpeg" target="_blank" rel="bookmark" title="‘वोट कटवा’ मुसलिम राजनैतिक दल"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;                 &lt;p&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="text-decoration: underline; color: #ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;सलीम अख्तर सिद्दीकी&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;strong&gt; &lt;div id="attachment_1140" class="wp-caption alignright" style="width: 160px"&gt;&lt;a rel="attachment wp-att-1140" href="http://hastakshep.com/?attachment_id=1140"&gt;&lt;img class="size-thumbnail wp-image-1140" title="saleem akhtar siddiki, सलीम अख्तर सिद्दीकी" src="http://hastakshep.com/wp-content/uploads/saleem-akhtar-siddiki-150x150.jpg" alt="" height="150" width="150" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;p class="wp-caption-text"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt; &lt;/strong&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="text-decoration: underline; color: #ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उत्तर  प्रदेश सरकार ने पिछले दिनों अपने चार साल मुकम्मल कर लिए हैं। इधर  नगर  निकायों का कार्यकाल भी समाप्त होने को है, इसलिए नगर निकाय और  विधानसभा  चुनाव की सरगर्मियां तेज हो गर्इं हैं। राजनैतिक दलों ने कुछ  उम्मीदवारों  की घोषणा भी कर दी है। जब चुनाव आते हैं,  तो मुसलिम वोट बैंक  को हर राजनैतिक दल ललचाई नजरों से देखता है। देखे भी  क्यों नहीं? उत्तर  प्रदेश में मुसलिम आबादी लगभाग 20 प्रतिशत है। भले ही  भाजपा का आधार  मुसलिम विरोध पर टिका हो, लेकिन वह भी मुसलिम वोटों की चाहत  रखती है। ये  अलग बात है कि मुसलिमों की और कदम बढ़ाते ही उसका अपना वोट बैंक  उसे  ‘कांग्रेस की कार्बन कापी’ बताने लगता है, लेकिन उसकी ये चाहत कभी भी  उभर  ही आती है। जब से  बसपा के साथ आंखें बंद करके दलित वोट बैंक जुड़ा है, तब  से मुसलमानों में  भी सवाल कौंधता रहता है कि मुसलिमों की पार्टी क्यों  नहीं हो सकती? ऐसा  नहीं है, यह कोई नया विचार हो। अतीत में कई प्रयोग हुए,  लेकिन सफल नहीं  हुए। आजादी के बाद से ही मुसलमानों ने अपना रहनुमा  हिंदुओं को ही माना है।  नेहरु से लेकर विश्वप्रताप सिंह तक, उन्होंने अपना  समर्थन हिंदु नेताओं को  ही दिया। यदि मुसलमान  धर्म के नाम पर बनने वाले  राजनैतिक दल की हिमायती होते तो, उनके लिए  मुसलिम लीग सबसे बेहतर पार्टी  हो सकती थी, लेकिन मुसलमानों ने उसे हमेशा ही  नकारा। आजादी के बाद वह  धीरे-धीरे हाशिए पर चली गई। थोड़ा बहुत वजूद सिर्फ  केरल में बचा हुआ है।&lt;br /&gt;अस्सी और नब्बे के दशक में जब राममंदिर और बाबरी  मसजिद विवाद के चलते  हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एक दीवार सी खिंच गई थी,  तब सैयद शहाबुद्दीन  ने  इंसाफ पार्टी बनाकर मुसलमानों की रिझाने की कोशिश की थी, लेकिन  मुसलमानों  ने उसे कोई भाव नहीं दिया। बसपा से अलग होकर डॉ मसूद अहमद ने  नेशनल  लोकतांत्रिक पार्टी बनाई। पूरे पन्द्रह साल तक वह उसे सींचते रहे,  पौधा कभी  पेड़ नहीं बन पाया। आखिरकार मसूद साहब को पार्टी का विलय सपा में  करना पड़ा।  मेरठ के मौजूदा बसपा विधायक याकूब कुरैशी और उनके भाई युसूफ  कुरैशी ने  उत्तर प्रदेश यूडीएफ का  गठन किया था। पिछला चुनाव इसी बैनर पर  लड़कर मात्र याकूब कुरैशी ही  जैसे-तैसे जीत पाए थे। बाकी जगहों पर बस  ठीक-ठाक वोट मिले थे। पता नहीं  किन्हीं मजबूरियों के चलते याकूब कुरैशी ने  चुनाव जीतते ही ‘बहनजी का दामन’  थाम लिया था। इसके साथ ही यूडीएफ की  ‘नवजात मौत’ गई थी। इतिहास से सबक  नहीं लेते हुए पिछले एक दो सालों में  मुसलमानों के  नाम पर कई पार्टियां  खड़ी हो गर्इं हैं। उत्तर  प्रदेश में  आज की तारीख में नेशनल लोकहिंद, उलेमा काउंसिल, पीस पार्टी,  कौमी एकता दल,  मोमिन कांफ्रेंस, परचम पार्टी और भारतीय एकता पार्टी जैसी  पार्टियां  मुसलिमों के नाम पर मैदान में हैं। जाहिर है, ये तमाम दल उन दलों  को  निशाने पर रखते हैं, जिनके बारे में यह समझा जाता है कि मुसलमान उनसे   हमदर्दी रखते हैं।&lt;br /&gt;ये कारण भी खोजने होंगे कि आखिर मुसलमानों के नाम पर  इतनी पार्टियां कैसे   वजूद में आ गयी हैं। दरअसल, सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों ने   मुसलमानों को भाजपा का डर और सब्जबाग दिखाकर छला है। मुसलमानों की आर्थिक व   शैक्षिक तरक्की के लिए किसी राजनैतिक दल ने कुछ नहीं किया। 1992 में  बाबरी  मस्जिद विध्वंस के बाद कांग्रेस से छिटके मुस्लिम वोटर ने अपना  भविष्य  क्षेत्रीय दलों में देखना शुरू किया। भाजपा को हराने के लिए उसने  उप्र में  समाजवादी पार्टी, लोकदल  और बसपा का साथ दिया, तो बिहार में राजद  और लोजपा के साथ रहा। आंध्र  प्रदेश में वह तेदेपा से जुड़ा, तो पश्चिम  बंगाल में वामपंथी पार्टियों को  वोट देता रहा। मुसलमानों को धक्का तब लगा,  जब  तेदेपा, जनता दल (यू),  तृणमूल कांगेस, बसपा, लोजपा और नेशनल  कांफे्रंस जैसे क्षेत्रीय दलों ने  1999 में भाजपा के साथ सत्ता में  भागीदारी की। 2002 में गुजरात दंगों के  दौरान ये दल मूकदर्शक बने रहे।  उत्तर  प्रदेश में तो मायावती ने तीन-तीन बार भाजपा के साथ सरकार बनाई।  मुसलमान  केवल भाजपा को हराने के लिए वोट करते रहे और उनके वोटों के बल पर  क्षेत्रीय  दल भाजपा के साथ ही मिलकर सत्ता का सुख भोगते रहे।&lt;br /&gt;अब मुसलमानों के  नाम पर खडे हुए दल मुसलमानों से कह रहे हैं कि सबको आजमा  लिया है, इसलिए  अपना झंडा अलग होना जरूरी है। यही वजह है कि ‘नाना प्रकार  के दल’ मुसलमानों  का भावनात्मक शोषण करने  के लिए मैदान में आ गए हैं।  आजमगढ़ के मदरसे के एक मौलाना आमिर रशादी ने  ‘उलेमा काउंसिल’ नाम की पार्टी  ही बना डाली। बाहुबली मुख्तार अंसारी ने  ‘कौमी एकता दल’ बना डाला।  डॉक्टरी के पेशे को ठोकर मारकर डॉ अयूब को  मुसलमानों का रहनुमा बनने का  शौक चर्राया, तो उन्होंने ‘पीस पार्टी’ का गठन  कर लिया। सवाल यह है कि  क्या इन पार्टियों के आने से मुसलमानों को कोई  फायदा मिलेगा? सवाल यह भी  है  कि क्या ये पार्टियां वास्तव में मुसलमानों का भला चाहती हैं? जवाब  नहीं  में ही दिया जा सकता है। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि इनमें से  कुछ  पार्टियां किसी ऐसी पार्टी के इशारे पर मैदान में हों, जिनको मुसलिम  वोट  बंटने से फायदा होता है। एक ऐसी ही मुसलिम पार्टी के नेता सपा, बसपा  और  कांग्रेस को मुसलमानों का सबसे बड़ा दुश्मन बताते रहे हैं, जबकि भाजपा  के  बारे में वह हमेशा मौन रहते  हैं।&lt;br /&gt;यह सही है कि कुछ हजार वोट पाकर ये पार्टियां अपनी उपस्थिति तो  दर्ज करा  रही हैं, लेकिन इनको सिर्फ मुसलमानों के वोटों से ही संतोष करना  पड़ रहा  है। हालांकि ये पार्टियां महज दिखावे के लिए दलितों, पिछड़ों और  शोषित  तबकों को जोड़ने की बात करती हैं, लेकिन इनके नेताओं के भाषणों के  केंद्र  में सिर्फ मुसलमान ही रहते हैं। यही वजह है कि इनके साथ दूसरे  समुदाय के  लोग नहीं जुड़ पाते। इस  तरह से देखें तो इन पार्टियों की हैसियत सिर्फ ‘वोट  कटवा’ से ज्यादा नहीं  है। ये सभी पार्टियां पूर्वांचल में वजूद में आयी  हैं, पश्चिम में इनका  कोई नाम भी सही तरीके से नहीं जानता, इसलिए ये सबसे  ज्यादा नुकसान सपा का  करेंगी। फायदा भाजपा का होगा। मसला अलग पार्टी बनाने  से नहीं, संसद और  विधानसभाओं में पढ़े-लिखे और सही मायनों में  धर्मनिरपेक्ष लोगों को भेजने से  हल होगा। ऐसे  लोगों से बचने से होगा, जो  कभी स्कूल नहीं गए और सिर्फ अपने कारोबार को  बचाने या बढ़ाने की नीयत से  मुसलमानों के वोटों का इस्तेमाल करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #888888;"&gt;(यह लेख जनवाणी, मेरठ के 26 मई के अंक में प्रकाशित हो चुका है)&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-5833664040815357836?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/5833664040815357836/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=5833664040815357836' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/5833664040815357836'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/5833664040815357836'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2011/05/blog-post_27.html' title='वोट कटवा’ मुसलिम राजनैतिक दल'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-4682562915999855056</id><published>2011-05-16T08:29:00.000-07:00</published><updated>2011-05-16T08:30:40.687-07:00</updated><title type='text'>हिंदुओं-मुसलमानों की खाई को पाटा था टिकैत ने</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;सलीम अख्तर सिद्दीकी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;महेंद्र  सिंह टिकैत का किसान नेता के रूप उभार अस्सी के दशक के अंत की अभूतपूर्व  घटना थी। मेरठ के लिए वे सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल के तौर पर भी याद किए  जाएंगे। मेरठ में 1987 में भयंकर सांप्रदायिक दंगा हो चुका था। सूबे में  कांगे्रस की सरकार थी।  मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह थे। हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अविश्वास की  काली छाया हटने का नाम नहीं ले रही थी। मुसलमान वीरबहादुर सिंह से सख्त खफा  थे। फरवरी 1988 में महेंद्र सिंह टिकैत किसानों की मांगों को लेकर मेरठ  कमिश्नरी पर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गए थे। धरने को सभी वर्गों का भरपूर  समर्थन मिला था। मुसलमानों ने इस धरने में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था। टिकैत  साहब को  ‘महात्मा’ की उपाधि से नवाजा जा चुका था। हम कुछ दोस्तों का प्रोग्राम  टिकैत साहब से मिलने का बना। हम वहां पहुंचे तो किसानों का हुजूम था। उस  हुजूम के बीच में टिकैत बैठे हुए थे। हम जैसे ही उनकी तरफ जाने के लिए चले,  तो उनके सुरक्षा गार्डों ने हमें रोककर पूछा, ‘कहां जा रहे हो?’ हमने सीधे  जवाब दिया, टिकैत साहब से मिलना है। सुरक्षा गार्ड ने कहा, ‘वे ऐसे ही हर  किसी से नहीं मिलते, जाओ  यहां से।’ मेरे दोस्तों ने मजाक उड़ाया, ‘आया था टिकैत साहब से मिलने?’ मैं  खिसिया गया था। मैंने उनसे कहा, ‘अच्छा दूसरे गेट से चलते हैं।’ हम दूसरे  गेट पर पहुंचे। जैसे ही अंदर जाने लगे, सुरक्षा गार्ड ने फिर वही सवाल  दोहराया। इस बार मैं तैयार था। मैंने कहा, ‘हम लोग महाराष्ट्र से आए हैं,  टिकैत जी से मिलना है।’ ‘महाराष्ट्र’ शब्द ने जादू जैसा कम किया। सुरक्षा  गार्ड हमें खुद टिकैत  साहब के पास तक छोड़कर आया। सुरक्षा गार्ड वहां मौजूद अपने लोगों को खास  हिदायत देकर आया कि ये लोग महाराष्ट्र से आए हैं, इन्हें महात्मा जी से  मिलवा देना। उस समय वह किसी विदेशी महिला पत्रकार से दुभाषिया के माध्यम से  बात कर रहे थे। वे बातचीत से फारिग हुए तो हमारा परिचय ‘महाराष्ट्रवासी’  के तौर पर कराया जाने लगा तो मैंने कहा, ‘नहीं, टिकैत साहब हम तो मेरठ से  ही हैं। ये सब तो आप तक  पहुंचने के लिए करना पड़ा।’ इस पर उनके सुरक्षा गार्डों के तेवर तीखे हुए,  तो टिकैत साहब ने अपनी ‘भाषा’ में उनसे कहा, ‘अरे, ये भी तो देखो इन्होंने  सच बोल दिया है। ये मुझसे महाराष्ट्र का बनकर ही मिलकर चले जाते, तो हमें  क्या बता चलता।’ उन्होंने बड़े प्यार से एक-एक का नाम पूछा। जब उन्हें पता  चला कि हम मुसलिम हैं, तो उन्हें और ज्यादा खुशी हुई। बस इतना ही कहा, ‘एक  बुरा दौर था, गुजर गया।  आगे की सोचो। सांप्रदायिक सद्भाव बना रहना चाहिए।’ विदा लेते समय टिकैत  साहब ये कहना नहीं भूले थे, ‘रोटी खाए मत जाना।’ दंगों के बाद हिंदुओं और  मुसलमानों की बीच, जो खाई बनी थी, उस धरने ने उसे बहुत हद तक पाट दिया था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-4682562915999855056?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/4682562915999855056/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=4682562915999855056' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/4682562915999855056'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/4682562915999855056'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2011/05/blog-post_16.html' title='हिंदुओं-मुसलमानों की खाई को पाटा था टिकैत ने'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-7524760856654928331</id><published>2011-05-01T06:16:00.000-07:00</published><updated>2011-05-01T06:17:26.426-07:00</updated><title type='text'>पश्चिम बंगाल : खतरे में 'लाल किला'</title><content type='html'>बंगाल के विधानसभा चुनाव कई मायनों में  अलग हैं। नतीजों से पहले ही वामदलों के लिए 'मर्सिया' पढ़े जाने लगे हैं।  वाम दलों का परंपरागत वोट बैंक समझे जाने वाले मुसलमान इस बार क्या करेंगे?  यह सवाल फिजा में तैर रहा है। हालांकि पिछले लोकसभा और पंचायत चुनावों में  मुसलमानों ने वाम दलों को अपनी दूरी को नतीजों का रूप दे दिया था। यही वजह  है कि इस बार राजनीतिक पार्टियां मुसलिम वोट बैंक का हिसाब लगा रही हैं।  बंगाली वाममोर्चा को गलतफहमी हो गई है कि अब पहले जैसे हालात नहीं हैं और  मुसलमान उसके साथ हैं। इसमें शक नहीं कि सिंगूर और नंदीग्राम में मुसलमानों  के साथ वाममोर्चा ने ज्यादती की, जो उसकी कामयाबी में बड़ी भूमिका अदा करते  रहे हैं। &lt;p style="text-align: justify;"&gt;    &lt;/p&gt; &lt;p style="text-align: justify;"&gt;इस बार मुसलमान ममता बनर्जी को राइटर्स  बिल्डिंग में लाने को बेताब हैं। वामदल सांप्रदायिकता के मुद्दे पर  मुसलमानों पर 'इमोशन अत्याचार'  करते रहे हैं। अबकी बार सांप्रदायिकता का  मुद्दा गायब है। मुद्दा 2008 और 2009 के भूमि अधिग्रहण के खिलाफ चलाए गए  आंदोलन को निर्ममता से कुचलने के लिए मुसलमानों पर अत्याचार का है।&lt;/p&gt; &lt;p style="text-align: justify;"&gt;यही वजह थी कि 2009 के लोकसभा चुनाव में  मुसलिम बहुल क्षेत्रों में वाम को करारी शिकस्त हुई थी। तब सीपीएम का केवल  एक मुसलमान सांसद पश्चिम बंगाल से चुनाव जीत सका था। कोलकाता, पूर्व  मेदिनीपुर, हावड़ा, हुगली, मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर, उत्तर और  दक्षिण 24 परगना और वीरभूम जैसे मुसलिम बहुल जैसे जिलों से तो वामदलों को  बिल्कुल ही नकार दिया गया था। नकारे जाने की शिद्दत का अंदाजा इस बात से से  लगाया जा सकता है कि 67 प्रतिशत वोटर वाले मुर्शिदाबाद जिले वाले लोकसभा  चुनाव में वहां की एकमात्र जलंगी विधानसभा सीट पर वाममोर्चा आगे रहा था। 55  प्रतिशत वोटर वाले जिले मालदा की 12 विधानसभा सीटों में सिर्फ एक सीट ही  जीत सका था। उत्तर दिनाजपुर की सभी नौ सीटों पर हालत खराब रही थी। उत्तर 24  परगना के बशीरहाट, बारासात और बैरकपुर लोकसभा सीटों के अंतर्गत आने वाली  वाली 21 विधानसभा सीटों में केवल तीन पर वामदल आगे रहे थे। अन्य जिलों की  भी कमोबेश भी यही हालत रही थी।&lt;/p&gt; &lt;p style="text-align: justify;"&gt;बंगाल की 294 सीटों में से 115 सीटों पर  मुसलिम निर्णायक साबित होते हैं। 70 सीटें पूरी तरह से मुसलिम बहुल हैं, तो  45 सीटों पर हार-जीत मुसलमान ही तय करते हैं। 2009 के बाद मुसलमानों को  अपनी ओर करने के लिए वामदलों ने कुछ किया हो, सामने नहीं आया है। सिंदूर और  नंदीग्राम को भी मुसलमान भूल गए हैं, ऐसा भी नहीं है। हालांकि मुसलिम  मतदाताओं की नाराजगी दूर करने के लिए मुसलमानों को ओबीसी आरक्षण का लाभ  देने की घोषणा की गई है, लेकिन लगता नहीं कि मुसलमानों की नाराजगी दूर करने  के लिए इतना काफी है।&lt;/p&gt; &lt;p style="text-align: justify;"&gt;इसमें दो राय नहीं कि वामदलों ने हमेशा ही  सांप्रदायिकता के मुद्दे पर कड़ा स्टैंड लिया। मुसलमान उन्हें अपने करीब  पाते थे। यही वजह थी कि पश्चिम बंगाल के मुसलमानों ने भी कभी वामदलों को  निराश नहीं किया। लेकिन अफसोसनाक बात यह है कि इसके बदले में वामदलों ने  अन्य राजनैतिक दलों की तरह ही उन्हें सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक विकास से  दूर रखा। सच्चर समिति रिपोर्ट बताती है कि बंगाल के मुसलमान स्वास्थ्य,  शिक्षा और रोजगार के मामले में सबसे ज्यादा पिछड़े हुए हैं। यदि कोलकाता और  उसके आसपास के शहरों को छोड़ दिया जाए तो शेष बंगाल में मुसलमानों की हालत  बेहद खराब है। यह सवाल बार-बार उठता है कि आखिर चार दशक तक सत्ता में रहने  बाद भी वाम सरकार ने मुसलमानों की अनदेखी क्यों की? पिछले दो दशकों में  बंगाल में हुए आर्थिक विकास का लाभ मुसलमानों को कुछ नहीं मिला है।&lt;/p&gt; &lt;p style="text-align: justify;"&gt;सच यह है कि वाम सरकार मुसलमानों को सिर्फ  धर्मनिरपेक्षता की घुट्टी पिलाती रही और दंगे न होने देने का आश्वासन देती  रही। यह सही है कि पश्चिम बंगाल में दंगे नहीं होते। क्या मुसलमान इसे ही  बहुत कुछ मान लें कि वे दंगों से सुरक्षित हैं? क्या उन्हें रोजी-रोटी नहीं  चाहिए? बंगाल की कुल आबादी का एक चौथाई आबादी मुसलमानों की है, लेकिन  सरकारी नौकरियों में सिर्फ 2.1 प्रतिशत मुसलमान हैं। सरकार के अपने  उपक्रमों में तो हालत और भी ज्यादा खराब है। इनमें सिर्फ 1.2 प्रतिशत  मुसलमान उच्च पदों पर हैं। यह तथ्य चौंकाने वाला है कि मुस्लिम विरोधी माने  जाने वाले नरेंद्र मोदी के गुजरात में सिर्फ 9.1 प्रतिशत मुसलमान होने के  बाद भी सरकारी नौकरियों में 5.4 प्रतिशत मुसलमान हैं। यह भी तथ्य है कि वाम  दलों की सरकार से पहले सरकारी नौकरियों में ज्यादा मुसलमान थे।&lt;/p&gt; &lt;p style="text-align: justify;"&gt;पश्चिम बंगाल में शिक्षा के क्षेत्र में  भी मुसलमानों की दशा बेहाल है। जहां पूरे देश में 24 प्रतिशत मुसलमान  मैट्रिक कर लेते हैं, वहीं पश्चिम बंगाल में सिर्फ 12 प्रतिशत मुसलमान ही  मैट्रिक तक पढ़ पाते हैं। सच्चर समिति की रिपोर्ट कहती है कि पश्चिम बंगाल  में औसतन एक बैंक खाते में 30,000 रुपये जमा हैं, लेकिन औसत मुसलमान के  खाते में सिर्फ 14,000 रुपये हैं। शिक्षा और रोजगार से पिछड़ा बंगाली  मुसलमान इसराईल, फिलस्तीन, बाबरी मसजिद और तस्लीमा नसरीन में ही उलझा रहा।  उसकी आंखें तब खुलीं, जब सिंगूर और नंदीग्राम में उसी कॉमरेड के हाथों मारा  गया, जिसे वे अपना सबसे बड़ा हितैषी समझते थे। यही वजह है कि पश्चिम बंगाल  के मुसलमान दूसरा विकल्प तलाश करने पर मजबूर हो रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस  और कांग्रेस के रूप में उनके पास एक विकल्प मौजूद है। दोनों के बीच समझौता  होने से मुसलमानों के वोटों में बिखराव नहीं आएगा। चार दशकों के बाद बंगाल  में परिर्वतन की आंधी चली है।&lt;/p&gt; &lt;p style="text-align: justify;"&gt;ओपिनियन पोल भी तृणमूल कांग्रेस और  कांग्रेस को भारी सफलता मिलने की भविष्यवाणी कर रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस  को 170 सीटें मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। यदि परिर्वतन हुआ, तो इसमें  निश्चित रूप से मुसलमानों की अहम भूमिका होगी। राइटर्स बिल्डिंग में कौन  आएगा, यह अभी भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इतना तय है कि यदि वामदलों की  विदाई होती है, तो इसकी तुलना सोवियत संघ के अभेद्य दुर्ग के ढह जाने से की  जाएगी। सोवियत संघ के ढहने के बाद कई मुसलिम रियासतों को आजादी मिलने की  तरह ही बंगाल में भी मुसलमानों के शैक्षणिक और आर्थिक विकास की नई राहें  खुल सकती हैं। ममता बनर्जी जानती हैं कि गुजरात और बिहार की तरह लंबी पारी  खेलने के लिए विकास ही अब एक रास्ता है। यदि विकास का लाभ मुसलमानों को भी  मिलेगा, तो वे दूसरी 'नीतीश कुमार' साबित हो सकती हैं।&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-7524760856654928331?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/7524760856654928331/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=7524760856654928331' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/7524760856654928331'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/7524760856654928331'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='पश्चिम बंगाल : खतरे में &apos;लाल किला&apos;'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-51946246279658083</id><published>2011-04-12T07:14:00.000-07:00</published><updated>2011-04-12T07:16:04.462-07:00</updated><title type='text'>जमाअत इसलामी हिंद की राजनैतिक शाखा की ‘वैलयफेयर पार्टी’</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;खुरशीद आलम, उर्दू पत्रकार&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इन दिनों मुसलिम राजनीति नए परीक्षण के दौर  से गुजर रही है। कहीं मुसलिम पार्टियां एक मंच पर एकत्र होने का प्रयास कर  रह हैं, तो कहीं राष्ट्रीय स्तर पर मुसलिम राजनैतिक पार्टियां वजूद में आ  रही हैं। पीपुल्स डैमोक्रेटिक  फ्रंट के गठन के साथ ही जमाअत इसलामी ने एक  नई सियासी पार्टी की  रूपरेखा तैयार कर ली है। इसकी औपचारिक घोषणा 18 अप्रैल को नई दिल्ली के  फिक्की सभागागर में आयोजित एक कार्यक्रम में की जाएगी। इस प्रसंग में  जमाअत-ए-इसलामी हिंद का सियासी सफर बहुत दिलचस्प है। इसमें कई उतार-चढ़ाव  हैं। जमाअत पहले राजनीति में हिस्सा लेने की ही विरोधी रही है। लेकिन  आपातकाल में जिस तरह तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आरएसएस पर  प्रतिबंध लगाया और जमाअत  इसलामी पर बैलेंस करने की नीयत से प्रतिबंध लगाकर इसके सदस्यों को जेल भेज  दिया था, उससे उसे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया। जमाअत का यह आत्मंथन  ही था कि उसने पहली बार मतदान में भाग लेने का फैसला किया। इसके सदस्यों ने  खुलकर 1977 के आम चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ वोट किया था। इस फैसले के  बाद ही जमाअत के अंदर राजनीति में उतरने का सवाल चर्चा में रहा। कुछ  सदस्यों का मानना था कि  जमाअत को राजनीति में कूद जाना चाहिए, जबकि कुछ सदस्य यह तो मानते थे कि  वे राजनीति में तो आए, लेकिन अभी इसका माहौल नहीं है। इसलिए हमें माहौल  बनाना चाहिए और समय आने पर अपनी योग्यता दिखानी चाहिए।&lt;br /&gt;इसको लेकर जमाअत  के अंदर काफी आत्मंथन हुआ और चुनाव में जमाअत के भाग न लेने की वकालत करने  वाले सदस्यों ने अपनी बात पर अडिग रहते हुए जमाअते इसलामी हिंद से स्वयं  को अलग कर लिया। इस  प्रकार जमाअत इसलामी हिंद से वह लोग निकल गए, जो अपने विचारों को लेकर  कट्टर थे। अब जमाअत में बहुसंख्यक उन लोगों की थी, जो वर्तमान में जमाअत के  राजनीति के आने के अनुकूल नहीं मान रहे थे और समय का इंतजार करने की बात  कर रहे थे। जमाअत ने अपने एक महत्वपर्ण फैसले के तहत निर्णय लिया कि  राजनीति, जिसमें आमतौर पर लोग ऊपर से नीचे जाते हैं और वह अपनी जमीनी  सच्चाई की अनदेखी करते हैं, यदि  नीचे से सफर शुरू किया जाए तो लक्ष्य की प्राप्ति में             आसानी  होगी।&lt;br /&gt;इस उद्देश्य के तहत जमाअत ने निकाय चुनाव द्वारा राजनीति में आने  का फैसला किया। पहले चरण में जमाअत अच्छी छवि वाले उम्मीदवारों को सामने  लाएगी, ताकि निकाय चुनाव में उन लोगों की उपस्थिति से बेहतर माहौल बन सके।  निकाय संस्थान, जो जनता के हित एवं विकास की शुरुआती श्रंखला है, में यदि  सही  लोग आएंगे और काम करेंगे तो निश्चय ही जन-जन तक आसानी से पहुंचा जा सकता  है। और मानव सेवा का दायित्व भी पूरा होगा। इसी योजना के तहत उसने केरल और  तमिलनाडु में गत दिनों हुए नगर निकाय चुनावों में हिस्सा लिया। उसने लगभग  दो हजार उम्मीदवारों को मैदान में उतारा, लेकिन दस उम्मीदवार भी नहीं जीत  सके । वर्तमान में जमाअत के अंदर व्यवाहारिक राजनीति के सोच रखने वाले तत्व  पूरे देश का  भ्रमण कर रहे हैं और नई राजनैतिक पार्टी के हक में माहौल बनाने का प्रयास  कर रहे हैं। पूरी कवायद के बाद मुसलमानों में इसको लेकर कोई उत्साह नहीं  है। यह एक वैचारिक जमाअत है। इस लिहाज से उसकी कोई राजनैतिक पृष्ठभूमि नहीं  है, जिससे वह लोगों को अपनी ओर आकृषित कर सके।&lt;br /&gt;जमाअत के इस फैसले से  अभी तक किसी राजनैतिक पार्टी ने किसी तरह की परेशानी का इजहार नहीं किया  है। जहां तक मुसलमानों  में पायी जाने वाली राजनैतिक पार्टियों अथवा राजनैतिक गतिविधियों का मामला  है, बाबरी मसजिद गिराए जाने के बाद कांग्रेस से उसका मोह भंग हो गया था।  तब वह उनसे दूर हो गया था और तीसरे मोर्चे को एक विकल्प के तौर पर चुना था,  लेकिन तीसरे मोर्चे के बिखरने और कांग्रेस एवं भाजपा जैसी राष्ट्रीय  पार्टियों द्वारा दो पार्टी व्यवस्था को आगे बढ़ाने के उपाय के बाद मुसलिम  दानिश्वरों का रुख  कांग्रेस की ओर हो गया। ऐसे में जमाअत की राजनैतिक गतिविधियां क्या इस सोच  के विपरीत होेंगी? यदि ऐसा हुआ तो क्या वह मुसलमानों के लिए लाभदायक साबित  होगी, जैसे अनेक सवाल भविष्य के गर्भ में छिपे हुए हैं। जमाअत में धारणा  प्रबल  होती जा रही है कि जमाअत के उद्देश्यों की पूर्ति और उसके उत्थान के  लिए संघर्षशील कार्यकर्ता और पदााधिकारी नेताओं की श्रेणी में शामिल होने  के लिए  व्याकुल हैं। इससे राजनीतिक स्वरूप तो जमाअत का किसी न किसी स्तर से देश  के समक्ष आ जाएगा। लेकिन संगठन ने जिन उद्देश्यों और लक्ष्यों को लेकर आगे  बढ़ा था, वह लुप्त होते जा रहे हैं। जमाअत इसलामी हिंद की राजनैतिक शाखा की  ‘वैलयफेयर पार्टी’ क्या करती है, इसका सभी को इंतजार है। क्या यह भी अन्य  मुसलिम पार्टियों की तरह अपना वजूद खो देगी ?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-51946246279658083?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/51946246279658083/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=51946246279658083' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/51946246279658083'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/51946246279658083'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='जमाअत इसलामी हिंद की राजनैतिक शाखा की ‘वैलयफेयर पार्टी’'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-6478310526660325739</id><published>2011-01-28T04:37:00.000-08:00</published><updated>2011-01-28T04:41:14.822-08:00</updated><title type='text'>दैनिक जनवाणी में आपका स्वागत है</title><content type='html'>&lt;p&gt;दैनिक जनवाणी मेरठ से प्रकाषित होने वाला प्रमुख अखबार है। अखबार में आपका स्वागत है। अखबार के लिए आप अपने आलेख, कविता, गजल, कहानी और लघु कथा आदि भेज सकते हैं। हमारा एक काॅलम वे पढ़ रहें हैं इस काॅलम के लिए आप हमें आजकल किस साहित्यकार की पुस्तक पढ़ रहे हैं। उस पुस्तक में क्या नया है। क्यों पढ़ रहे हैं आदि लिखकर भेज सकते हैं। दूसरा काॅलम जो न पढ़ सका है इस काॅलम के लिए आप हमें उस पुस्तक के बारे में लिख कर भेज सकते हैं, जो आप पढ़ नहीं सके। क्यों नहीं पढ़ सके। क्या मजबूरी रही। क्यों पढ़ना चाहते थे। मलाल एक काॅलम है। इस काॅलम में आप लिख सकते हैं कि जिंदगी में आप को किस बात का मलाल रहा। इनके अलावा एक काॅलम सुकून का दिन है। आप अपना कौनसा दिन सुकून के साथ किस तरह बिताते हैं, इसके बारे में अपने अनुभव भेज सकते हैं। षब्द सीमा 500-600 तक हो। साथ में अपनी पासपोर्ट साइज फोटो भेजना मत भूलिएगा सलीम अख्तर सिद्दीकी&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;a href="mailto:saleem_iect@yahoo.co.in"&gt;saleem_iect@yahoo.co.in&lt;/a&gt;09045582472  &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-6478310526660325739?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/6478310526660325739/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=6478310526660325739' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/6478310526660325739'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/6478310526660325739'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='दैनिक जनवाणी में आपका स्वागत है'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-4835496933695962797</id><published>2010-10-28T02:24:00.000-07:00</published><updated>2010-10-28T02:25:53.451-07:00</updated><title type='text'>'राजीव गांधी हों, वीपी सिंह हों या मुलायम सिंह यादव हों, कोई भी मुसलमानों का हमदर्द नहीं है।'</title><content type='html'>&lt;div style="font-family: times new roman,new york,times,serif; font-size: 12pt;"&gt;&lt;div&gt; &lt;p class="MsoNormal" style="margin: 0in 0in 0pt; text-align: center;" align="center"&gt;&lt;span style="font-size: 15pt; color: black; font-family: Mangal;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 14pt; font-family: Mangal;"&gt;&lt;span style=""&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal" style="margin: 0in 0in 0pt; text-align: center;" align="center"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; font-weight: bold;"&gt;सलीम अख्तर सिद्दीक़ी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 16pt; font-family: Mangal;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal" style="margin: 0in 0in 0pt; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal;"&gt;&lt;span style=""&gt;            &lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt; &lt;/span&gt;अहमद  बुखारी अपने वालिद अब्दुल्ला बुखारी से चार कदम आगे साबित हुए हैं। पिछले  सप्ताह उर्दू अखबार के एक सहाफी (पत्रकार) ने उनसे एक सवाल क्या कर लिया,  वे न सिर्फ आग बबूला हो गए बल्कि सहाफी को 'अपने अंदाज' में सबक भी सिखा  दिया। एक सहाफी को सरेआम पीटा गया, पत्रकार जगत  में कोई खास हलचल नहीं हुई। होती भी क्यों। पिटने वाला पत्रकार किसी बड़े  अखबार या चैनल का नुमाईन्दा न होकर एक अनजान से उर्दू अखबार का नुमाईन्दा  जो था। जरा कल्पना किजिए कि यदि पिटने वाला किसी रसूखदार मीडिया हाउस का  नुमाईन्दा होता तो क्या होता ? पूरी पत्रकारिता खतरे में नजर आने लगती।  प्रेस की आजादी पर हमला माना जाता। एक सवाल यह भी है कि क्या अहमद बुखारी  से सवाल पूछने वाला  पत्रकार किसी बड़े अखबार का नुमाईन्दा होता तो क्या अहमद बुखारी इसी तरह  अपना 'आपा' खोने की जुर्रत कर सकते थे ? शायद नहीं। अहमद बुखारी जैसे लोगों  का चाबुक छोटे लोगों पर ही चलता है। वह बड़े लोगों पर हाथ नहीं डालते।  क्योंकि बड़े लोगों से कुछ मिलने की आशा रहती है। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal" style="margin: 0in 0in 0pt; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal;"&gt;दरअसल,  अब्दुल्ला बुखारी तो एक मस्जिद के पेश इमाम मात्र थे। जिसका काम मस्जिद  में पांच वक्त की नमाज पढ़ाना होता है। उनकी खासियत यह हो सकती है कि वह एक  ऐतिहासिक मस्जिद के पेश इमाम थे। आज वही हैसियत उनके बेटे अहमद बुखारी की  होनी चाहिए थी। लेकिन बाप-बेटे ने ऐतिहासिक जामा मस्जिद को अपनी 'जागीर' तो  नेताओं ने दोनों को पेश  इमाम के स्थान पर भारतीय मुसलमानों का रहनुमा बना डाला। मजेदार बात यह है  कि अब्दुल्ला बुखारी कभी नमाज नहीं पढ़ाते थे और न आज अहमद बुखारी नमाज  पढ़ाने का का फर्ज पूरा करते हैं। अब्दुल्ला बुखारी को मुसलमानों का रहनुमा  बनाने में आरएसएस की खास भूमिका रही है। मुझे याद आता है आपातकाल के बाद का  1977 का लोकसभा का चुनाव। तब मैं बहुत छोटा था। उस वक्त आरएसएस के लोग  नारा लगाते फिरते थे-  'अब्दुल्ला बुखारी करे पुकार, बदलो-बदलों यह सरकार।'&lt;span style=""&gt;  &lt;/span&gt;उस  वक्त देश की जनता में आपातकाल में हुईं ज्यादतियों को लेकर कांग्रेस के  प्रति जबरदस्ती रोष था। खासकर मुसलमान जबरन नसबंदी को लेकर बहुत ज्यादा  नाराज थे। ऐसे में यदि अब्दुल्ला बुखारी कांग्रेस को वोट देने की अपील भी  करते तो मुसलमान उनकी अपील को खारिज ही करते। उस समय की जनसंघ और आज की  भाजपा का विलय जनता  पार्टी में हो गया था। 1977 के लोकसभा और विधान सभा चुनावों में कांग्रेस  की जबरदस्त शिकस्त के बाद जनता पार्टी की सरकार बनी। जनसंघ का जनता पार्टी  में विलय होने के बाद भी जनसंघ के नेताओं ने आरएसएस से नाता नहीं तोड़ा। इसी  दोहरी सदस्यता तथा जनता पार्टी के अन्य नेताओं के बीच सिर फुटव्वल के चलते  1980 में हुए मध्यावधि चुनाव हुए। इस चुनाव में अब्दुल्ला बुखारी ने यह  देखकर कि जनता पार्टी  की कलह के चलते और आपातकाल की ज्यादतियों की जांच करने के लिए गठित शाह  जांच आयोग द्वारा इंदिरा गांधी से घंटों पूछताछ करने और पूछताछ को दूरदर्शन  पर प्रसारित करने से इंदिरा गांधी के प्रति देश की जनता में हमदर्दी पैदा  हो रही है, मुसलमानों से कांग्रेस को वोट देने की अपील कर दी। स्वाभाविक  तौर पर देश की जनता ने जनता पार्टी को ठुकरा कर फिर से कांग्रेस का दामन  थाम लिया। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal" style="margin: 0in 0in 0pt; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal;"&gt;इस  तरह से देश की जनता में यह संदेश चला गया कि देश का मुसलमान अब्दुल्ला  बुखारी की अपील (हालांकि इसे फतवा कहा गया। जबकि अब्दुल्ला बुखारी फतवा  जारी करने की योग्यता नहीं रखते थे। अहमद बुखारी भी नहीं रखते) पर ही मतदान  करते हैं। जबकि हकीकत यह थी कि देश का मुसलमान भी अन्य नागरिकों की तरह  मुद्दों पर ही मतदान करता था। इसका  उदहारण 1989 कर चुनाव भी है। इस चुनाव में राजीव गांधी की सरकार बौफोर्स  तोप दलाली को लेकर कठघरे में थी तो राम मंदिर आंदोलन के चलते उत्तर प्रदेश  के शहर साम्प्रदायिक दंगों की आग में जल रहे थे। दंगों में उत्तर प्रदेश  सरकार एक तरह से पार्टी बन गई थी। पुलिस और पीएसी ने मलियाना और हाशिमपुरा  में जबरदस्त ज्यादती की थी। परिणाम स्वरुप मुसलमान वीपी सिंह के पीछे  लामबंद हो गए थे। ऐसे में  कोई कांग्रेस को वोट देने की अपील करता तो मुंह की ही खाता। यहां भी  अब्दुल्ला बुखारी ने हवा का रुख देख कर जनता दल को समर्थन देने की अपील की  थी। बदले में उन्होंने जनता दल सरकार से जमकर पैसा वसूला और मीम अफजल जैसे  अपने चेलों को जनता दल के टिकट पर राज्य सभा की सीट दिलवाई। जनता दल सरकार  के कार्यकाल में दिल्ली की जामा मस्जिद को जनता दल सरकार ने पचास लाख का  अनुदान दिया था। उन पचास  लाख का अब्दुल्ला बुखारी परिवार ने क्या किया, यह पूछने की हिम्मत ने तो  किसी की हुई और न हो सकती थी। पूछने की जुर्रत करेगा तो उसका वही हश्र  होगा, जो लखनउ के पत्रकार का हुआ है। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal" style="margin: 0in 0in 0pt; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal;"&gt;ऐसा  वक्त भी आया कि अब्दुल्ला बुखारी ने हवा के विपरीत मुसलमानों से किसी दल  को समर्थन देने की अपील की और मुंह की खाई। एक बार तो भाजपा और आरएसएस को  पानी पी-पी कर कोसने वाले अहमद बुखारी दिल्ली विधान सभा चुनाव में  मुसलमानों से भाजपा को समर्थन देने की अपील कर चुके हैं। आज हालत यह हो गयी  है कि अहमद बुखारी पुरानी दिल्ली से  अपने समर्थन से एक पार्षद को जिताने की हैसियत भी खो चुके हैं।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal" style="margin: 0in 0in 0pt; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal;"&gt;एक  घटना का जिक्र जरुर करना चाहूंगा। जब मई 1987 में मलियाना और हाशिमपुरा  कांड हुए थे तो उनकी गूंज पूरी दुनिया मे हुई थी अब्दुल्ला बुखारी ने दोनों  कांड के विरोध में जामा मस्जिद को काले झंडे और बैनरों से पाट दिया था।  1989 में जब उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में जनता दल की  सरकार वजूद में आयी तो मैं अपने दोस्त  मरहूम तारिक अरशद के साथ यह सोचकर अब्दुल्ला बुखारी से मिलने गए थे कि  उनके दिल में मलियाना और हाशिमपुरा के लोगों के लिए हमदर्दी है इसलिए उनसे  जाकर यह कहा जाए कि आप वीपी सिंह और मुलायम सिंह यादव से कहें कि मलियाना  जांच आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक करें और दोषियों को सजा दिलाएं। जब हमने  अब्दुल्ला बुखारी के सामने रखी तो उनका का जवाब था। 'राजीव गांधी हों,  वीपी सिंह हों या  मुलायम सिंह यादव हों, कोई भी मुसलमानों का हमदर्द नहीं है।' उनके इस सवाल  पर मैंने उनसे सवाल किया था कि 'जब कोई राजनैतिक दल मुसलमानों का हमदर्द  ही नहीं है तो आप क्यों बार-बार किसी राजनैतिक दल को समर्थन देने की अपील  मुसलमानों से करते हैं ?' मेरे इस सवाल पर अब्दुल्ला बुखारी हत्थे से उखड़  गए थे और बोले, 'मुझसे किसी की सवाल करने की हिम्मत नहीं होती, तुमने कैसे  सवाल करने की जुर्रत  की।' उस दिन मुझे मालूम हुआ था कि हकीकत क्या है ?&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal" style="margin: 0in 0in 0pt;"&gt;&lt;span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal;"&gt;दरअसल,  राममंदिर आंदोलन के ठंडा पड़ने के बाद इस आंदोलन के चलते वजूद में आए नेता  हाशिए पर चले गए थे। अयोध्या फैसले के बाद ये नेता एक फिर मुख्य धारा में  लौटने की कोशिश कर रहे हैं। संघ परिवार के साथ ही कुछ मुस्लिम नेता भी ऐसे  हैं, जो अयोध्या फैसले को अपनी वापसी के रुप में देख रहे हैं। अहमद बुखारी  भी उनमें से एक हैं। संवाददाता सम्मेलन में एक  मुस्लिम पत्रकार के साथ बेहूदा हरकत इसी कोशिश का नतीजा थी।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-4835496933695962797?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/4835496933695962797/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=4835496933695962797' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/4835496933695962797'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/4835496933695962797'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2010/10/blog-post_28.html' title='&apos;राजीव गांधी हों, वीपी सिंह हों या मुलायम सिंह यादव हों, कोई भी मुसलमानों का हमदर्द नहीं है।&apos;'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-4967858434180875072</id><published>2010-10-27T08:20:00.000-07:00</published><updated>2010-10-27T08:22:34.243-07:00</updated><title type='text'>ये काहे के मुस्लिम नेता?</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;h3&gt;शीबा असलम फहमी&lt;/h3&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial,sans-serif;"&gt;&lt;span style="font-family: arial,sans-serif;"&gt;&lt;div style="margin: 5px 15px; padding-bottom: 20px;"&gt; &lt;div&gt;&lt;div style="text-align: center; border-collapse: collapse; font-size: 13px;"&gt;&lt;span style="font-size: xx-large;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-collapse: collapse; font-size: 13px;"&gt; अहमद बुख़ारी द्वारा लखनऊ की प्रेस वार्ता में एक नागरिक-पत्रकार के ऊपर  किये गए हमले के बाद कुछ बहुत ज़रूरी सवाल सर उठा रहे हैं. एक नहीं ये कई  बार हुआ है की अहमद बुख़ारी व उनके परिवार ने देश के क़ानून को सरेआम ठेंगे  पे रखा और उस पर वो व्यापक बहेस नहीं छिड़ी जो ज़रूरी थी. या तो वे ऐसे  मामूली इंसान होते जिनको मीडिया गर्दानता ही नहीं तो समझ में आता था, लेकिन  बुख़ारी की प्रेस  कांफ्रेंस में कौन सा पत्रकार नहीं जाता? इसलिए वे मीडिया के ख़ास तो हैं  ही. फिर उनके सार्वजनिक दुराचरण पर ये मौन कैसा और क्यों? कहीं आपकी समझ ये  तो नहीं की ऐसा कर के आप 'बेचारे दबे-कुचले मुसलमानों' को कोई रिआयत दे  रहे हैं? नहीं भई! बुख़ारी के आपराधिक आचरण पर सवाल उठा कर भारत के मुस्लिम  समाज पर आप बड़ा एहसान ही करेंगे इसलिए जो ज़रूरी है वो कीजिये ताकि  आइन्दा वो ऐसी फूहड़,  दम्भी और आपराधिक प्रतिक्रिया से भी बचें और मुस्लिम समाज पर उनकी  बदतमीज़ी का ठीकरा कोई ना फोड़ सके. &lt;/div&gt; &lt;div style="border-collapse: collapse; font-size: 13px;"&gt;इसी बहाने कुछ  और बातें भी; भारतीय मीडिया अरसे से बिना सोचे-समझे इमाम बुखारी के नाम के  आगे 'शाही' शब्द का इस्तेमाल करता आ रहा है. भारत एक लोकतंत्र है, यहाँ जो  भी 'शाही' या 'रजा-महाराजा' था वो अपनी सारी वैधानिकता दशकों पहले खो चुका  है. आज़ाद भारत में किसी को 'शाही' या 'राजा' या 'महाराजा' कहना-मानना  संविधान की आत्मा के विरुद्ध है. अगर अहमद बुखारी ने कोई  महान काम किया भी होता तब भी 'शाही' शब्द के वे हकदार नहीं इस आज़ाद भारत  में. और पिता से पुत्र को मस्जिद की सत्ता हस्तांतरण का ये सार्वजनिक नाटक  जिसे वे (पिता द्वारा पुत्र की) 'दस्तारबंदी' कहते हैं, भी भारतीय लोकतंत्र  को सीधा-सीधा चैलेंज है.&lt;/div&gt; &lt;div&gt;&lt;div style="border-collapse: collapse; font-size: 13px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-collapse: collapse; font-size: 13px;"&gt;रही  बात बुख़ारी बंधुओं के आचरण की तो याद कीजिये की क्या इस शख्स से जुड़ी  कोई अच्छी ख़बर-घटना या बात आपने कभी सुनी? इस पूरे परिवार की ख्याति  मुसलमानों के वोट का सौदा करने के अलावा और क्या है? अच्छी बात ये है की  जिस किसी पार्टी या प्रत्याशी को वोट देने की अपील इन बुख़ारी-बंधुओं ने  की, उन्हें ही मुस्लिम वोटर ने हरा दिया.  मुस्लिम मानस एक परिपक्व समूह है. हमारे लोकतंत्र के लिए ये शुभ संकेत  है.लेकिन पता नहीं ये बात भाजपा जैसी पार्टियों को क्यों समझ में नहीं आती ?  वे समझती हैं की 'गुजरात का पाप' वो 'बुख़ारी से डील' कर के धो सकती हैं.&lt;/div&gt; &lt;div style="border-collapse: collapse; font-size: 13px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-collapse: collapse; font-size: 13px;"&gt;एक  बड़ी त्रासदी ये है की दिल्ली की जामा मस्जिद जो भारत की सांस्कृतिक धरोहर  है और एक ज़िन्दा इमारत जो अपने मक़सद को आज भी अंजाम दे रही है. इसे हर  हालत में भारतीय पुरातत्व विभाग के ज़ेरे-एहतेमाम काम करना चाहिए था, जैसे  सफदरजंग का मकबरा है जहाँ नमाज़ भी होती है. क्यूंकि एक प्राचीन निर्माण के  तौर पर जामा मस्जिद इस देश के  अवाम की धरोहर है, ना की सिर्फ़ मुसलमानों की. मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने  इसे केवल मुसलमानों के चंदे से नहीं बनाया था बल्कि देश का राजकीय धन इसमें  लगा था और इसके निर्माण में हिन्दू-मुस्लिम दोनों मज़दूरों का पसीना बहा  है और श्रम दान हुआ है. इसलिए इसका रख-रखाव, सुरक्षा और इससे होनेवाली  आमदनी पर सरकारी ज़िम्मेदारी होनी चाहिए. ना की एक व्यक्तिगत परिवार की?  लेकिन  पार्टियां ख़ुद भी चाहती हैं की चुनावों के दौरान बिना किसी बड़े  विकासोन्मुख आश्वासन के, केवल एक तथाकथित परिवार को साध कर वे पूरा मुस्लिम  वोट अपनी झोली में डाल लें. एक पुरानी मस्जिद से ज़्यादा बड़ी क़ीमत है  'मुस्लिम वोट' की, इसलिए वे बुख़ारी जैसों के प्रति उदार हैं ना की गुजरात  हिंसा पीड़ितों के रेफ़ुजी केम्पों से घर वापसी पर या बाटला-हाउज़ जैसे  फ़र्ज़ी मुठभेढ़  की न्यायिक जांच में!  &lt;/div&gt; &lt;div style="border-collapse: collapse; font-size: 13px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-collapse: collapse; font-size: 13px;"&gt;ये  हमारी सरकारों की ही कमी है की वह एक राष्ट्रीय धरोहर को एक  सामंतवादी, लालची और शोषक परिवार के अधीन रहने दे रहे हैं. एक प्राचीन  शानदार इमारत और उसके संपूर्ण परिसर को इस परिवार ने अपनी निजी मिलकियत बना  रखा है और धृष्टता ये की उस परिसर में अपने निजी आलिशान मकान भी बना डाले  और उसके बाग़ और विशाल सहेन को भी अपने निजी मकान की  चहार-दिवारी के अन्दर ले कर उसे निजी गार्डेन की शक्ल दे दी. यही नहीं  परिसर के अन्दर मौजूद DDA/MCD  पार्कों को भी हथिया लिया जिस पर इलाक़े के  बच्चों का हक़ था. लेकिन प्रशासन/जामा मस्जिद थाने की नाक के नीचे ये सब  होता रहा और सरकार ख़ामोश रही. जिसके चलते ये एक अतिरिक्त-सत्ता चलाने में  कामयाब हो रहे हैं. इससे मुस्लिम समाज का ही नुक्सान होता है की एक तरफ़ वो  स्थानीय स्तर पर इनकी  भू-माफिया वा आपराधिक गतिविधियों का शिकार हैं, तो दूसरी तरफ़ इनकी  गुंडा-गर्दी को बर्दाश्त करने पर, पूरे मुस्लिम समाज के तुष्टिकरण से जोड़  कर दूसरा पक्ष मुस्लिम कौम को ताने मारने को आज़ाद हो जाता है. &lt;/div&gt; &lt;div style="border-collapse: collapse; font-size: 13px;"&gt;बुख़ारी परिवार  किसी भी तरह की ऐसी गतिविधि, संस्थान, कार्यक्रम, आयोजन, या कार्य से नहीं  जुड़ा है जिससे मुसलामानों का या समाज के किसी भी हिस्से का कोई भला हो. ना  तालीम से, ना सशक्तिकरण से, ना हिन्दू-मुस्लिम समरसता से, ना और किसी भलाई  के काम से इन बेचारों का कोई मतलब-वास्ता.... तो ये काहे के मुस्लिम  नेता? &lt;/div&gt; &lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial;"&gt;--&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-4967858434180875072?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/4967858434180875072/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=4967858434180875072' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/4967858434180875072'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/4967858434180875072'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2010/10/blog-post_27.html' title='ये काहे के मुस्लिम नेता?'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-3220028927999933927</id><published>2010-10-04T07:48:00.000-07:00</published><updated>2010-10-04T07:49:04.700-07:00</updated><title type='text'>अयोध्या फैसला : जिसकी लाठी उसकी भैंस</title><content type='html'>&lt;!--[if gte mso 9]&gt;&lt;xml&gt;  &lt;w:worddocument&gt;   &lt;w:view&gt;Normal&lt;/w:View&gt;   &lt;w:zoom&gt;0&lt;/w:Zoom&gt;   &lt;w:punctuationkerning/&gt;   &lt;w:validateagainstschemas/&gt;   &lt;w:saveifxmlinvalid&gt;false&lt;/w:SaveIfXMLInvalid&gt;   &lt;w:ignoremixedcontent&gt;false&lt;/w:IgnoreMixedContent&gt;   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शायद दुनिया का यह पहला अदालती फैसला होगा, जिसमें सबूतों और तथ्यों की अनदेखी करके 'आस्था' को आधार बनाया गया है। इस फैसले से 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' वाली कहावत चरितार्थ हुई है। हद तो यह है जस्टिस धर्मवीर शर्मा ने तो अपने फैसले में भगवा ब्रिगेड की थ्योरी को ज्यों का त्यों का रख दिया है। क्या अब अदालत के फैसले भी 'आस्था' के आधार पर होंगे ? यह फैसला एक गलत नजीर बनने जा रहा है। इसकी कोई गारंटी नहीं है कि आस्था के नाम अन्य धर्म स्थलों पर विवाद खड़ा नहीं किया जाएगा। तीनों ही माननीय जजों ने माना है कि कोई भी पक्ष इस बात के सबूत नहीं दे पाया है कि विवादित स्थल पर उसका मालिकाना हक है। इस सूरत में जिस स्थान का कोई मालिक नहीं है, क्या उस स्थान को सरकार को अपने कब्जे में नहीं ले लेना चाहिए ? हालांकि, भाजपा व अन्य हिन्दुवादी संगठन अब से पहले यह कहते रहे हैं कि 'आस्था' का फैसला अदालत नहीं कर सकती। कैसा अजीब संयोग है कि अदालत ने फैसला देते समय 'आस्था' को ही आधार बनाया है। अब कैसे भगवा ब्रिगेड को 'आस्था' पर दिया गया फैसला मंजूर हो गया ? मेरा मानना है कि भारत की कोई अदालत इससे अलग फैसला दे भी नहीं सकती। भले ही सेन्ट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कर रहा हो, वहां भी इससे अलग फैसला आने की कतई उम्मीद नहीं है। बहुसंख्यकों की 'आस्था' के सामने सुप्रीम कोर्ट भी नममस्तक हो जाएगी। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal;"&gt;&lt;span style=""&gt;            &lt;/span&gt;इस विवाद ने सबसे ज्यादा नुकसान मुसलमानों का ही हुआ है। अब मुसलमानों का बड़ा वर्ग ऐसा है, जो बाबरी मस्जिद जैसे विवादों को भूलकर तरक्की की राह पर जाना चाहता है। यही वजह है कि विपरीत फैसला आने के बाद भी मुसलमानों ने अपना संयम नहीं खोया। इस बात के लिए मुसलमान बधाई के हकदार हैं। जरा कल्पना किजिए यदि फैसला राममंदिर के पक्ष में नहीं आता तो क्या होता ? क्या देश में इसी तरह अमन-ओ-आमान कायम रहता ? हां, हिन्दुवादी संगठनों की इस बात के लिए बहुत ही तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने 6 दिसम्बर 1992 की तर्ज पर शौर्य दिवस या विजय दिवस मनाने की घोषणा नहीं की। यदि ऐसा होता तो हालात खराब हो सकते थे। नरेन्द्र मोदी, मुरली मनोहर जोशी जैसे तथाकथित फायर ब्रांड नेताओं के मुंह से भी धैर्य बनाए रखने की बातें सुनकर सुखद आश्चर्य हो रहा था। सब जानते हैं कि मैं संघ परिवार का घोर विरोधी हूं। लेकिन फैसले के फौरन बाद मोहन भागवत ने जो कुछ कहा, सुनकर अच्छा लगा। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal;"&gt;&lt;span style=""&gt;            &lt;/span&gt;इस सब के बीच यह नहीं भूलना चाहिए कि यह फैसला एक तरह से भाजपा की आशाओं के विपरीत आया है। यह भी याद रखिए कि बाबरी मस्जिद को ढहाना भाजपा के एजेंडे में कभी नहीं था। कहते हैं कि जब बाबरी मस्जिद तोड़ी जा रही थी तो उस वक्त लालकृष्ण आडवाणी की आंखों में आंसू थे। उनके वे आंसू पश्चाताप के नहीं, बल्कि अपनी राजनीति के प्रतीक को ढहते हुए देखने के थे। फैसले के बाद भाजपा नेताओं के दिमाग में कहीं न कहीं यह जरुर सवाल उभर रहा होगा कि उनकी राजनीति अब कैसे चलेगी तारिक अरशद नाम का मेरा एक दोस्त था। वह मेरठ के 1990 के दंगों में एक हिन्दु को बचाते हुए मुसलमानों के हाथों शहीद हुआ था। वो मुझसे कहा करता था कि मुसलमानों को चाहिए कि भाजपा को सत्ता में लाएं। एक बार सत्ता में आने के बाद इनका ऐसा पतन शुरु होगा कि फिर से यह दो सीटों पर न सिमट जाएं तो कहना। वो हमारे बीच नहीं है। यदि होता तो देखता कि ऐसा ही हो रहा है। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-size: 11pt; font-family: Mangal;"&gt;&lt;span style=""&gt;            &lt;/span&gt;बाबरी मस्जिद के टूटने और भाजपा के सत्ता में आने बाद भाजपा ग्राफ लगातार गिरा है। हाईकोर्ट यह फैसला भाजपा के ताबूत में अंतिम कील साबित होने जा रहा है। इस फैसले ने एक तरह से भाजपा की हवा निकाल दी है। सच तो यह है कि राममंदिर के विपक्ष में होने वाला फैसला भाजपा के लिए ज्यादा 'अनुकूल' होता। 'प्रतिकूल' फैसला आने की पीड़ा उनके चेहरों पर साफ पढ़ी जा सकती है। अब हालात यह हैं कि अयोध्या का मुक्कमिल फैसला सुप्रीम कोर्ट करेगी या आपसी बातचीत से मसला हल होगा। बातचीत में भाजपा को कुछ लेना-देना नहीं रहेगा। अदालत के फैसले या आपसी बातचीत से विवादित स्थल पर राममंदिर का निर्माण होता भी है तो इसका श्रेय भाजपा को बिल्कुल नहीं मिलने वाला है। इस विवाद से वह जितना राजनैतिक फायदा उठा सकती थी, उसने उठा लिया है। किसी चैक को बार-बार कैश नहीं कराया जा सकता। अयोध्या विवाद भगवा ब्रिगेड के लिए एक चैक था, जिसे कैश कराकर उसने देश पर 6 साल तक राज कर लिया। हवा उन राजनैतिक दलों की भी निकली है, जो भगवा ब्रिगेड का हव्वा दिखाकर मुसलमानों के वोट लेकर सत्ता का मजा लेते रहे हैं। भाजपा कमजोर होगी तो तथाकथित सैक्यूलर दलों का भी गुब्बारा जरुर पिचकेगा।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-3220028927999933927?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/3220028927999933927/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=3220028927999933927' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/3220028927999933927'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/3220028927999933927'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='अयोध्या फैसला : जिसकी लाठी उसकी भैंस'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-8182251224451698435</id><published>2010-09-15T02:44:00.000-07:00</published><updated>2010-09-15T02:45:12.994-07:00</updated><title type='text'>हिन्दुस्तान व जागरण ने छोटी खबर को बनाया बड़ी</title><content type='html'>&lt;a class="contentpagetitle" href="http://bhadas4media.com/print/6538-2010-09-14-09-12-06.html"&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सलीम अख्तर सिद्दीक़ी&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a title="E-mail" onclick="window.open(this.href,'win2','width=400,height=350,menubar=yes,resizable=yes'); return false;" href="http://bhadas4media.com/component/mailto/?tmpl=component&amp;amp;link=aHR0cDovL2JoYWRhczRtZWRpYS5jb20vcHJpbnQvNjUzOC0yMDEwLTA5LTE0LTA5LTEyLTA2Lmh0bWw%3D"&gt;&lt;/a&gt;&lt;a title="Print" onclick="window.open(this.href,'win2','status=no,toolbar=no,scrollbars=yes,titlebar=no,menubar=no,resizable=yes,width=640,height=480,directories=no,location=no'); return false;" href="http://bhadas4media.com/print/6538-2010-09-14-09-12-06.html?tmpl=component&amp;amp;print=1&amp;amp;layout=default&amp;amp;page=" rel="nofollow"&gt;&lt;/a&gt;&lt;a title="PDF" onclick="window.open(this.href,'win2','status=no,toolbar=no,scrollbars=yes,titlebar=no,menubar=no,resizable=yes,width=640,height=480,directories=no,location=no'); return false;" href="http://bhadas4media.com/print/6538-2010-09-14-09-12-06.pdf" rel="nofollow"&gt;&lt;/a&gt;मेरठ में हिन्दुओं और मुसलमानों का अनुपात लगभग 60-40 का है। अस्सी के दशक में मेरठ 'दंगों का शहर' नाम से कुख्यात हो गया था। लेकिन बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद जब उत्तर प्रदेश के कई शहर साम्प्रदायिक हिंसा से जल रहे थे, तब मेरठ ने शांत रह कर पूरे प्रदेश में एक मिसाल पेश की थी। उसके बाद यह संवेदनशील कहा जाने वाला शहर किसी बड़े दंगे की आग में नहीं जला।&lt;br /&gt;पिछले साल जरुर मुसलमानों की एक विशेष जाति के लोगों ने अपने व्यापारिक हितों की खातिर शहर को दंगों की आग में झोंकने की कोशिश की थी। उस कोशिश को शहर के हिन्दुओं और मुसलमानों ने नाकाम कर दिया था। इस शहर के लोग साथ-साथ रहते हैं, काम करते हैं, एक दूसरे के व्यापार भी आपस में साझा है। एक दूसरे की खुशी और गम में बराबर शरीक होते हैं। यदि सड़क पर कोई आदमी दुर्घटना में घायल हो जाए तो उसे अस्पताल पहुंचाते वक्त उसका धर्म नहीं देखते। जब सब कुछ साझा है तो फिर आपस में तकरार भी होती है। मेट्रो सिटी का दर्जा पा चुके इस शहर में अक्सर किसी छोटी-मोटी बात को लेकर एक ही शहर के नागरिक होने के नाते दोनों के बीच व्यक्तिगत रुप से छोटी-मोटी झड़पें होती रहती हैं।&lt;br /&gt;किसी हिन्दू की मोटर साइकिल किसी मुसलमान से टकराने पर ही झड़प हो जाती है। कभी क्रिकेट खेलने पर ही तू तू-मैं मैं हो जाती है।हद यहां तक है कि एक हिन्दू या मुसलमान के हाथों अंडे का फूटना भी झड़प का सबब बन जाता है। ऐसी झड़पों का साम्प्रदायिकता से दूर-दूर तक भी वास्ता नहीं होता। ऐसी छोटी-मोटी घटनाओं को भी मेरठ का मीडिया ऐसे पेश करता है, जैसे बस दंगा होने ही वाला था।&lt;br /&gt;कल 13 सितम्बर की एक घटना है। यहां के मोहल्ला इमलियान में में कुछ बच्चे अपनी छत पर फुटबाल खेल रहे थे। जिस घर की छत पर फुटबाल खेली जा रही थी, उस घर के पीछे एक हिन्दू टिल्लू का घर है, जिसमें फुटबाल जा गिरी। फुटबाल मांगी गई तो उसने मना कर दिया। इसी बात को लेकर बात बढ़ गयी। टिल्लू ने तैश में आकर अपनी लाईसेंसी बंदूक से फायर कर दिया। गोली के कुछ छर्रे एक मुस्लिम युवक को जा लगे। महज इतना हादसा था। पुलिस और क्षेत्र के लोगों ने मामला शांत करा दिया।&lt;br /&gt;इस हादसे को मेरठ के 'हिन्दुस्तान' और 'दैनिक जागरण' ने बड़ा बनाकर पेश किया। एक हिन्‍दू और मुसलमान के बीच होने वाली छोटी सी व्यक्तिगत झड़प से भी मेरठ के कुछ अखबारों को 'शहर की फिजा' खतरे में नजर आने लगती है। कल की घटना को 'हिन्दुस्तान' और 'दैनिक जागरण' ने पहले पेज पर मुख्य खबर तो बनाया ही, सिटी वाला पूरा एक पेज इसी खबर के नजर कर दिया। दोनों अखबारों ने तस्वीरों के माध्यम से यह बताया कि शहर में दहशत के चलते सड़के सुनसान हो गयीं। जबकि सच यह था कि बारिश की वजह से सड़के सुनसान थीं।&lt;br /&gt;'अमर उजाला' ने संयम बरता। खबर छोटी करके लिखी। इस तरह की झड़पें कितनी महत्वहीन और रुटीन वाली होती हैं, इस बात का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता कि जिस क्षेत्र में इस तरह की झड़पें होती हैं, उस क्षेत्र के लोगों को भी पता नहीं चल पाता कि क्या हुआ। जब वे सुबह का अखबार देखते हैं तो उनके मुंह से यही निकलता है, 'अरे! कल यहां यह हो गया हमें तो पता ही नहीं चला।' उस पर तुर्रा यह कि बॉक्स में यह खबर भी डाल दी जाती है कि 'शहर में अफवाहों का बाजार गर्म हो गया।' पता नहीं अखबार इस तरह की खबरें, जो फिजा को वाकई खराब कर सकती हैं, क्यों छापते हैं। इस तरह की झड़पों की खबर को महज दो शहरियों के बीच की झड़प मान कर ही खबर लिखी जानी चाहिए न कि दो समुदायों के बीच होने वाली झड़प की तरह।&lt;br /&gt;एक और मजे की बात जान लीजिए। ऐसी झड़पों की खबर लिखते समय अखबारों की अपनी आचार संहिता के मुताबिक, जिसमें लड़ने वालों का धर्म नहीं खोला जाता, 'दोनों समुदाय के लोग आमने-सामने आ गए' लिखा जाता है। यह अलग बात है कि बीच में कहीं लड़ने वालों के नाम से यह बता भी दिया जाता है कि मामला हिन्दू और मुसलमानों के बीच का है। ऐसी खबरों की विशेष बात यह भी है कि मुसलमानों को 'एक वर्ग विशेष के लोग' लिखा जाता है तो हिन्दुओं के लिए 'बहुसंख्यक वर्ग के लोग' प्रयोग किया जाता है। जैसे यह लिखा जाता है कि 'एक वर्ग विशेष के लोगों' या 'बहुसंख्यक वर्ग के लोगों' ने जाम लगा दिया या 'नारेबाजी शुरु कर दी'। हालांकि साथ में लगी तस्वीर साफ बता देती है कि जाम लगाने या नारेबाजी करने वाले कौन लोग हैं। समझ में नहीं आता कि इशारों में बताने के बजाय झगड़ा करने वालों का धर्म ही क्यों नहीं बता दिया जाता है। क्या अखबार वाले अपने पाठक को इतना नासमझ समझते हैं कि वे इशारों की बात नहीं समझेगा?&lt;br /&gt;ऐसे में जब अयोध्या विवाद का अदालती फैसला इसी महीने की 24 तारीख को आने वाला है, ऐसे में अखबारों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो गयी है। छोटी सी खबर को बड़ी बनाने से शहर में बेमतलब का तनाव फैलता है। मेरठ एक जो एक संवेदनशील और दंगों के लिए कुख्यात रहा है, में तो अखबारों को और ज्यादा संयम बरतना चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-8182251224451698435?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/8182251224451698435/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=8182251224451698435' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/8182251224451698435'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/8182251224451698435'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='हिन्दुस्तान व जागरण ने छोटी खबर को बनाया बड़ी'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-1096732166786527193</id><published>2010-08-28T06:07:00.000-07:00</published><updated>2010-08-28T06:09:13.727-07:00</updated><title type='text'>मुसलमान ही सुलझाएं अयोध्या</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सलीम अख्तर सिद्दीक़ी&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;अयोध्या विवाद के संभावित फैसले पर मुझे झटका तब लगा, जब मेरे एक दोस्त की पन्द्रह साल की बेटी का एक एसएमएस मिला। एसएमएस में लिखा था- 'बाबरी मस्जिद का फैसला आने वाला है। दुआ कीजिए कि फैसला मुसलमानों के हक में हो। इस एसएमएस को अपने मुसलिम भाईयों को फॉरवर्ड करें।' इस बात का मतलब यह है कि अयोध्या फैसले की सुरसराहट उन बच्चों में भी हो गयी है, जिन्होंने 1992 के बाद दुनिया देखी है।&lt;br /&gt;सन 1949 में जब एक साजिश के तहत अयोध्या बाबरी मसजिद में राम लला की मूर्तियां रख दी गयीं थीं, तब से लेकर 1 फरवरी 1986 तक इसके मालिकाना हक का मुकदमा फैजाबाद की अदालत में चल रहा था। कुछ इक्का-दुक्का लोगों को ही इस बारे में पता था कि इस तरह का कोई मुकदमा भी चल रहा है। लेकिन जब राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में अचानक फैजाबाद की अदालत ने 1 फरवरी 1986 को सन 1949 से ताले में बंद विवादित स्थल का ताला खोलकर पूजा पाठ करने की इजाजत दी तो पूरे देश में साम्प्रदायिक तनाव फैल गया था। तब पूरे देश का पता चला था कि ऐसा भी कोई मामला है। एक अदालती विवाद को संघ परिवार ने इतनी हवा दी थी कि पूरा देश साम्प्रदायिकता की आग में झुलस गया था। इस विवाद के चलते कितने लोग मारे गए। कितनी सम्पत्ति को जला डाला गया, इसका लेखा-जोखा शायद ही किसी के पास हो। इस नुकसान के अलावा जो सबसे बड़ा नुकसान हुआ था, वह देश का धर्मनिरपेक्ष ढांचे का चरमरा जाना था। इस विवाद की आग में केवल संघ परिवार ने ही रोटियां नहीं सेंकी थीं, बल्कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर सपा जैसे कुछ क्षेत्रीय दलों ने भी इस विवाद को सत्ता पाने की सीढ़ी बनाया था। इस विवाद के चलते भाजपा देश पर 6 साल शासन कर गयी तो मुलायम सिंह यादव तथा लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं ने भी सत्ता का मजा लूटा। इस विवाद ने देश की राजनीति की दशा और दिशा बदल दी थी लेकिन विवाद आज भी ज्यों का त्यों है।&lt;br /&gt;बाबरी मसजिद विध्वंस को बीस साल होने को आए हैं, नई पीढ़ी को नहीं पता था कि फैजाबाद की अदालत में बाबरी मसजिद बनाम राममंदिर के मालिकाना हक का भी कोई मुकदमा चल रहा है। पिछले पखवाड़े से अखबारों में अयोध्या के सम्भावित फैसले की खबरें छपने लगी हैं, तब से हमारे बच्चे पूछने लगे हैं कि यह अयोध्या विवाद क्या है? क्या फैसला आने वाला है? हम उनको सारी बातें उसी तरह बताते हैं, जिस तरह हमारे बुजुर्ग विभाजन की त्रासदी सुनाया करते थे। जिन लोगों ने विभाजन की त्रासदी झेली है, वे उस वक्त कहा करते थे कि ऐसा कभी न हो, जैसा अब हुआ है। अस्सी और नब्बे के दशक में हम यह कहते थे कि अल्लाह कभी ऐसी त्रासदी देश में फिर कभी न हो। अब, जब अयोध्या विवाद का फैसला आने वाला है तो अस्सी और नब्बे के दशक की त्रासदी की दुखद यादें ताजा हो रही हैं। फैसला किसके हक में आएगा यह अभी  भविष्य के गर्भ में है। लेकिन फैसला जिसके भी खिलाफ आएगा, क्या वह उसे सहजता से स्वीकार कर लेगा ? दुर्भाग्य से इस सवाल का जवाब नहीं में है। संघ परिवार तो पहले ही यह ऐलान कर चुका है कि उसे किसी भी हालत में बाबरी मसजिद के हक में फैसला स्वीकार्य नहीं होगा। हालांकि मुसलिम पक्ष के कुछ नेता यह कहते रहे हैं  कि उन्हें अदालत का कोई भी फैसला मंजूर होगा, लेकिन मुसलिम वोटों के सौदागर क्या कुछ कर दें, कुछ नहीं कहा जा सकता है। अब तो वैसे भी मुसलिम वोटों के लिए गला काट प्रतिस्पर्धा हो रही है। इस बात से सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि आने वाले दिन कितने दुरुह हो सकते हैं।&lt;br /&gt;कुछ मुसलिम नेता अनौपचारिक बातचीत में यह कहते रहे हैं कि बाबरी मसजिद पर अपना दावा छोड़ दें। लेकिन दिक्क्त यह है कि ये नेता सार्वजनिक रुप से इसके उलट बात करते हैं। इसका कारण यह है कि उन्हें अपनी सियासत डूबती नजर आने लगती है। कुछ लोगों का यह मानना है कि बाबरी मसजिद से दावा छोड़ने का मतलब संघ परिवार का हौसला बढ़ाने वाला काम होगा। उनकी राय में संघ परिवार मथुरा और काशी में वितंडा खड़ा कर देगा। उनका मानना है कि अयोध्या पर डटकर खड़ा रहने से संघ परिवार पर अंकुश लगेगा। ऐसा सोचने वालों की बात सही हो सकती है। लेकिन अब तो इतनी हद हो गयी है कि इस  विवाद का कोई तो हल निकालना ही पड़ेगा। क्या देश की जनता हर दस-बीस साल बाद इस विवाद के भय के साए में रहने को अभिशप्त रहे ? सच तो यह है कि इस विवाद को सिर्फ और सिर्फ मुसलमान ही हल कर सकते हैं। इस विवाद के हल के लिए मुसलिमों का वह नेतृत्व सामने आए, जो वोटों की राजनीति से दूर हो और उदार हो। मेरा मानना है कि यदि फैसला बाबरी मसजिद के विपक्ष में आए तो मुसलिम नेतृत्व उसे सहर्ष स्वीकार करे और फैसले को चैलेन्ज नहीं करे। यदि फैसला बाबरी मसजिद के हक में भी आए तो मुसलमान बाबरी मसजिद से अपना दावा छोड़ने के लिए कवायद करें। मुसलमानों को इसके लिए मानसिक रुप से तैयार करें। मुसलिम उलेमा इसमें अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यदि मुसलमान ऐसा कर पाए तो यह साम्प्रदायिक सद्भाव की नायाब मिसाल होगी और साम्प्रदायिक ताकतों के मुंह पर करारा तमाचा होगा।&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-1096732166786527193?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/1096732166786527193/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=1096732166786527193' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/1096732166786527193'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/1096732166786527193'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2010/08/blog-post_28.html' title='मुसलमान ही सुलझाएं अयोध्या'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-1346983877076200979</id><published>2010-08-23T02:35:00.000-07:00</published><updated>2010-08-23T02:36:32.832-07:00</updated><title type='text'>दिल्ली के रोहिणी इलाके में मुसलमानों को धार्मिक आज़ादी नहीं</title><content type='html'>&lt;p&gt; &lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;शेष नारायण सिंह&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;आज़ादी की लड़ाई की एक और विरासत को दिल्ली के रोहिणी इलाके में दफ़न किया जा रहा है . जंगे-आज़ादी के दौरान हमारे नेताओं ने कभी यह अहसास नहीं होने दिया कि वे हिन्दुओं की आज़ादी के लिए लड़ रहे हैं क्योंकि वे भारत की आज़ादी के लिए लड़ रहे थे . अंगेजों की पूरी कोशिश थी के भारत को हन्दू और मुसलमान के बीच खाई के ज़रिये अलग कर दिया जाए लेकिन वे कामयाब नहीं हुए. कोशिश पूरी की लेकिन सफलता हाथ नहीं आई. उस काम के लिए उन्होंने दो संगठन खड़े किये . कभी कांगेस का ही हिस्सा रही मुस्लिम लीग को जिन्ना और लियाक़त अली के नेतृत्व में झाड़ पोछ कर भारत की आज़ादी के खिलाफ मैदान में उतारा और अंग्रेजों से माफी मांग चुके वी डी सावरकर का इस्तेमाल करके हिन्दू धर्म से अलग एक नयी विचारधारा को जन्म दिया जिसे हिंदुत्व कहा गया . सावरकर ने खुद बार बार कहा है कि हिंदुत्व वास्तव में एक राजनीतिक विचारधारा है . बहरहाल १९२४ में सावरकर की किताब , हिंदुत्व छप कर आई और १९२५ में अंग्रेजों ने नागपुर के एक डाक्टर को आगे करके आर एस एस की स्थापना करवा दी. . मुस्लिम लीग तो अपने मकसद में कामयाब हो गयी . जब वह भारत की आज़ादी को नहीं रोक पाई तो उसने भारत का बँटवारा ही करवा दिया और पाकिस्तान की स्थपाना हो गयी. आज जब पाकिस्तान की दुर्दशा देखते हैं तो समझ में आता है कि कितनी बड़ी गलती मुहम्मद अली जिन्ना ने की थी. लगता है कि मुसलमानों को नुकसान पंहुचाने वाला यह सबसे बड़ा राजनीतिक फैसला था. आर एस एस वाले कोशिश करते रहे लेकिन अँगरेज़ उन्हें कुछ नहीं दे सका . बाद में उनके साथियों ने की महात्मा गांधी को मारा लेकिन उसके बाद वे पूरी तरह से राजनीतिक हाशिये पर आ गए. आज़ादी के आन्दोलन के नेताओं के उत्तराधिकारी कांग्रेस और सोशलिस्ट पार्टियों में आबाद हो गए लेकिन वे आज़ादी की लड़ाई वाले कांग्रेसियों जैसे मज़बूत नहीं थे लिहाजा बाद के वक़्त में आर एस एस और उस से जुड़े संगठन ताक़तवर होते गए और अब उनकी ताक़त का खामियाजा हर जगह राष्ट्र को ही झेलना पड़ रहा है .कहीं आर एस एस लोग वाले महिलाओं को पीट रहे हैं तो कहीं और कुछ कारस्तानी कर रहे हैं . आर एस एस की ताज़ा दादागीरी का मामला दिल्ली का है . उत्तरी दिल्ली के छोर पर बसे उप नगर रोहिणी में कोई मस्जिद नहीं थी . वहां रहने वालों ने डी डी ए में दरखास्त देकर करीब ३६० वर्ग मीटर का एक प्लाट ले लिया .जून २००९ में डी डी ए ने दर्सगाहे-इस्लामिया इंतजामिया कमेटी को प्लाट पर क़ब्ज़ा दे दिया . सरकारी चिट्ठी में साफ़ लिखा था कि ज़मीन मस्जिद के निर्माण के लिए दी जा रही है लेकिन जब २६ जून २००९ को मस्जिद के निर्माण का काम शुरू हुआ तो भगवा ब्रिगेड के लोग वहां पंहुच गए और मार पीट शुरू कर दी. वे माइक लेकर आये थे और पूरे जोर शोर से मुसलमानों के खिलाफ ज़हर उगल रहे थे . शुक्रवार का दिन था और वहां नमाज़ पढ़ कर काम शुरू होना था लेकिन हिन्दुत्ववादी गुंडों ने तूफ़ान खड़ा कर दिया. एक मजदूर का गला काट दिया . बाद में उसे अस्पताल ले जाया गया जहां उसकी जान बचा ली गयी . दर्सगाहे-इस्लामिया इंतजामिया कमेटी को आर एस एस के इरादों की भनक लग गयी थी इसलिए उन्होंने पहले ही पुलिस वालों को चौकन्ना कर दिया था लेकिन मामूली संख्या में मौजूद पुलिस वालों को भी भीड़ ने मारा पीटा और काम रुक गया. तुर्रा यह कि पुलिस ने दर्सगाहे-इस्लामिया इंतजामिया कमेटी की ओर से एफ आई आर तक नहीं लिखा . जब इन लोगों ने कहा तो साफ़ मना कर दिया और कहा कि पुलिस ने अपनी तरफ से ही रिपोर्ट लिख ली है . वह रिपोर्ट हल्की थी , उसमें मजदूर के गले पर धारदार हथिआर से वार करने की बात का ज़िक्र तक नहीं किया गया था. लेकिन इसके बाद जो हुआ वह बहुत ही शर्मनाक है. डी डी ए ने दर्सगाहे-इस्लामिया इंतजामिया कमेटी को सूचित किया कि मुकामी रेज़ीडेंट वेलफेयर अशोसिशन के विरोध के कारण मस्जिद निर्माण के लिए किया गया अलाटमेंट रद्द किया जाता है . यह नौकरशाही में भगवा ब्रिगेड की घुसपैठ का एक मामूली उदाहरण है . बहर हाल मामला माइनारिटी कमीशन में ले जाया गया और उनके आदेश पर एक बार फिर प्लाट तो मिल गया है लेकिन आगे क्या होगा कोई नहीं जानता . अब बात अखबारों में छप गयी है तो मुसलमानों के वोट के चक्कर में राजनीतिक पार्टियों के नेता लोग हल्ला गुला तो ज़रूर करेगें लेकिन नतीजा क्या होगा कोई नहीं जानता . आर एस एस के लोगों की कोशिश है कि ऐसे मुद्दे उठाये जाएँ जिस से साम्प्रदायिकता का ज़हर फैले और हिन्दू उनकी तरफ एकजुट हों . यह देश का दुर्भाग्य है कि आज देश में धर्म निरपेक्षता की लड़ाई लड़ने वाला कोई संगठन नहीं है . आर एस एस की रणनीति है कि इस तरह के मुद्दों को उठाकर वे अपने आपको हिन्दुओं का नेता साबित कर दें . ठीक उसी तरह जैसे जिन्ना ने १९४६ में किया था. हुआ यह था कि जिन्ना ने मांग की कि देश की आज़ादी के बारे में फैसला लेने के लिए जो कमेटी बन रही है ,उसमें मुसलमानों का नामांकन करने का अधिकार केवल जिन्ना को होना चाहिए . महात्मा गाँधी, सरदार पटेल और नेहरू ने साफ़ मना कर दिया . नतीजा यह हुआ कि अपने कोटे के चार मुसलमानों को जिन्ना ने नामांकित किया जबकि कांग्रेस ने अपने कोटे से ३ मुसलमानों को नामांकित कर दिया . और जिन्ना का मुसलमानों का खैरख्वाह बनने का सपना धरा का धरा रह गया. बहरहाल जिस तरह से संघी ताक़तें लामबंद हो रही हैं वह बहुत ही खतरनाक है और देश की एकता को उस से ख़तरा है . कांग्रेस समेत सभी धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पार्टियों को चाहिए उसे फ़ौरन लगाम देने के लिए जागरूकता अभियान चलायें. भारत के संविधान में भी लिखा है कि इस देश में हर आदमी को अपने धर्म का पालन करने की आज़ादी है. और अगर रोहिणी के मुसलमान अपने धर्म का पालन न कर सके तो संविधान के अनुच्छेद २५ का सीधे तौर पर उन्लंघन होगा . अनुच्छेद २५ में साफ़ लिखा है कि भारत के हर नागरिक को अपने धर्म के पालन की पूरी आज़ादी है . इसलिए देश की आबादी के बीस फीसदी को हम उनके अधिकारों से वंचित नहीं रख सकते. &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-1346983877076200979?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/1346983877076200979/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=1346983877076200979' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/1346983877076200979'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/1346983877076200979'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2010/08/blog-post_6025.html' title='दिल्ली के रोहिणी इलाके में मुसलमानों को धार्मिक आज़ादी नहीं'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-8618657579182883070</id><published>2010-08-23T02:31:00.000-07:00</published><updated>2010-08-23T02:33:20.321-07:00</updated><title type='text'>इंसानियत के खिलाफ है कॉमनवेल्‍थ गेम</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;सलीम अख्तर सिद्दीकी&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;कॉमनवेल्थ गेम की तैयारियों में हुए भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने के लिए भावुकता और देशभक्ति का सहारा लिया जा रहा है। कांग्रेसी नेता राजीव शुक्ला कहते हैं, 'भ्रष्टाचार की बात करने से पहले सबसे ज्यादा जरुरी है कि सब मिल जुल कर खेलों को कामयाब बनाने के लिए जुट जाएं। कॉमन वेल्थ गेम देश की इज्जत का सवाल है। खेल कामयाबी के साथ सम्पन्न हो जाएं तो फिर भ्रष्टाचार की बात भी होगी'। इस तरह की बात करने वाले राजीव शुक्ला अकेले नहीं है। दरअसल, राजीव शुक्ला जैसे लोग चाहते यह हैं कि किसी तरह से खेल बिना किसी बाधा के सम्पन्न हो जाएं, फिर भ्रष्टाचार का मामला नेपथ्य में चला जाएगा। पूरा देश और मीडिया भ्रष्टाचार को भूलकर खेलों के भव्य आयोजन के लिए सरकार के हक में कसीदे पढ़ेगा। लेकिन यहां सवाल भ्रष्टाचार का ही नहीं है। सवाल बहुत सारे हैं।&lt;br /&gt;क्या उस देश में, जहां 64 करोड़ लोग गरीबी की रेखा से जीने के लिए मजबूर हों, 46 प्रतिशत बच्चे और 55 प्रतिशत महिलाएं कुपोषण का शिकार हों, चिकित्सा का सर्वथा अभाव हो, स्कूल खंडहरनुमा इमारतों और टेंटों में चलते हों, पीने का साफ पीना मुहैया न हो, वहां पैंतीस हजार करोड़ का खजाना कॉमन वेल्थ गेम पर लुटा देना कहां की इंसानियत है? कॉमनवेल्थ गेम का बजट 1, 899 करोड़ रुपए का था, जो बढ़कर पैंतीस हजार करोड़ हो गया है यानि सीधे-सीधे 1800 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। पैंतीस हजार करोड़ रुपए से न जाने कितने अस्पताल, स्कूल और कालेज खोले जा सकते थे। कॉमनवेल्थ गेम के आयोजन से सबसे बड़ी मार गरीबों पर ही पड़ रही है। सड़क पर खाना बेचने वाले और वहां खाना खाने वाले दोनों ही गरीब होते है। सड़क पर बने स्थायी और अस्थायी ढाबों को बंद किया जा रहा है। एक गरीब आदमी का रोजगार बंद हो गया, दूसरे के हाथ से सस्ता खाना चला गया। दस से बीस रुपए में अपना पेट भरने वाला आदमी कैसे अपना पेट भरेगा?&lt;br /&gt;कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर का यह कहना कहीं से भी गलत नहीं है कि कॉमनवेल्थ गेम छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में क्यों नहीं कराए गए जहां, खेलों के साथ ही वहां का विकास भी हो जाता? मणिशंकर इंग्‍लैंड के मानचेस्टर का उदाहरण देकर कहते हैं, 'ईस्ट मानचेस्टर जैसे पिछड़े इलाके में 2002 में कॉमन वेल्थ गेम कराए गए। इसका नतीजा यह हुआ कि इस बहाने वहां का विकास हुआ और रोजगार बढ़ा।' दंतेवाड़ा तो एक उदाहरण भर है। कह सकते हैं कि वहां नक्सल समस्या के चलते ऐसा सम्भव नहीं था। लेकिन देश में ऐसे बहुत से इलाके हैं, जो आजादी के बाद से ही विकास को तरस रहे हैं। ऐसे की किसी इलाके में खेल कराकर वहां का विकास किया जा सकता था। लेकिन सरकार का अभिजात्य वर्ग कब यह चाहता है कि वो देश के दूर दराज के पिछड़े इलाके में जाकर धूल फांके? हां, विकास के नाम पर पूरी दिल्ली को को खोद डालना उन्हें मंजूर है।&lt;br /&gt;दिल्ली में भी उन्हीं इलाकों को और ज्यादा चमकाया जा रहा है, जो पहले से चमकते रहे हैं, जहां आभिजात्य वर्ग निवास करता है। मलिन बस्तियों की सुध नहीं ली जा रही है।दिल्ली में ही खेल कराने की मजबूरी थी तो समय से पहले ही तैयारी पूरी क्यों नहीं की गईं? तैयारी इतनी अधूरी है कि शक होता है कि खेल हो भी पाएंगे या नहीं? भ्रष्टाचार के कीचड़ को नजरअंदाज करने की बात कहने वाले लोग पता नहीं दिल्ली के उन इलाकों में जाते हैं की नहीं, जहां विकास के नाम पर सड़कों को खोद डाला गया है। वे लोग कभी उधर से गुजरें तो अपनी आंखों से दिल्ली में फैली धूल और कीचड़ देखने की जहमत करें। कनॉट प्लेस की सूरत बिगाड़ दी गयी है। मैं पूरे दो साल से हर हफ्ते देखता हूं कि कनॉट प्लेस को चमकाने की कोशिश की जा रही है। लेकिन काम पूरा नहीं हुआ। ऐसा लगता भी नहीं कि अक्टूबर तक पूरा हो जाएगा। शिवाजी स्टेडियम की निर्माण प्रगति देखकर कोई यह कहने का साहस नहीं कर सकता कि ये पचास दिन में पूरा जो जाएगा। दिल्ली को 'इंटरनेशनल लुक' देने के नाम पर उसका वास्तविक स्वरुप भी बिगाड़ा जा रहा है।&lt;br /&gt;काम इतनी धीमी गति से हो रहा है कि देखकर कोफ्त होती है। सच तो यह है कि कॉमन वेल्थ गेम के लिए दिल्ली को समय से लगभग छह महीने पहले तैयार हो जाना चाहिए था। यह तय है कि आधी-अधूरी तैयारियों के बीच खेल सम्पन्न होने के बाद अधूरे काम कभी पूरे नहीं होंगे। यह जरुर होगा कि ठेकेदार अपना पैसा वसूल कर लेगा। यह कहकर नहीं बचा जा सकता कि बारिश की वजह से काम बाधित हुआ। सबको पता है कि उत्तर भारत में जुलाई से लेकर अक्टूबर मध्य तक बरसात का मौसम होता है। दुनिया को यह भी पता है कि मात्र दो घंटे की बारिश से दिल्ली की सड़कें तालाब में तब्दील हो जाती हैं। भयंकर जाम लग जाता है। ट्रैफिक सिगनल काम करना बंद कर देते हैं। कॉमनवेल्थ गेम का समय भी ऐसा है, जिसमें बारिश हो सकती है। जरा सोचिए यदि उस समय दो-चार घंटे बारिश हो गयी तो तब देश की इज्जत का क्या होगा? इससे इतर, इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि दिल्ली में गुरबत दिखाई न दे। इसके लिए गरीबों को दिल्ली से बाहर खदेड़ा जा रहा है। भिखारियों को उठा कर बंद किया जा रहा है। क्या कीचड़ पर कालीन बिछा देने से कीचड़ का वजूद खत्म हो जाएगा? क्या दुनिया को नहीं पता कि भारत में कितनी गुरबत है ?&lt;br /&gt;क्या दुनिया को यह नहीं पता कि भारत जैसे गरीब देश में अभी तक अनाज भंडारण की भी सही व्यवस्था नहीं है? कॉमन वेल्थ गेम पर पानी की तरह पैसा बहाने वाली सरकार को यह सुध क्यों नहीं आती कि अनाज को सुरक्षित रखना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए? विडम्बना देखिए कि अनाज के सुरक्षित भंडारण का ख्याल एक मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल को आता है। संगठन सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करता है। सुप्रीम कोर्ट सरकारों को अनाज के सुरक्षित भंडारण के लिए नए गोदाम बनाने की सलाह के साथ ही खुले में सड़ रहे अनाज को गरीबों में बांट देने की सलाह देता है। इस देश में कॉमन वेल्थ गेम कराना ऐसे ही है, जैसे एक मजदूर शाम को अपनी मजदूरी को जुए और शराब में उड़ा दे और उसके बच्चे भूखे ही सो जाएं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-8618657579182883070?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/8618657579182883070/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=8618657579182883070' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/8618657579182883070'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/8618657579182883070'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2010/08/blog-post_23.html' title='इंसानियत के खिलाफ है कॉमनवेल्‍थ गेम'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-810266474921746878</id><published>2010-08-13T08:08:00.000-07:00</published><updated>2010-08-13T08:10:22.051-07:00</updated><title type='text'>उत्तर प्रदेश में साम्प्रदायिक दंगों की आहट</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सलीम अख्तर सिद्दीक़ी&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;बहुत दिनों की खामोशी के बाद संघ परिवार राख हो चुके राममंदिर मुद्दे में आग लगाने की कोशिश करेगा। अब आरएसएस ने मंदिर निर्माण की जिम्मेदारी ली है। इसी 16 अगस्त से संघ परिवार पूरे देश में बड़े पैमाने पर कार्यक्रम शुरु करने का ऐलान किया है। सवाल यह है कि आखिर संघ ने अभी क्यों मंदिर निर्माण का राग अलापना शुरु किया है ? बाबरी मस्जिद बनाम राम जन्म भूमि विवाद का फैसला सितम्बर के मध्य में आ सकता है। इसी के मद्देनजर संघ परिवार ने अपना कार्यक्रम तय किया है। संघ परिवार एक माह तक इस मुद्दे को गर्माएगा। इस बीच अदालत का जो भी फैसला आएगा, उसकी रोशनी में संघ परिवार अपनी उग्र हरकतें शुरु करेगा। उदाहरण के लिए, मान लीजिए फैसला संघ परिवार के हक में आया तो वह उसको सहज नहीं लेगा, बल्कि उसको 'हिन्दुत्व' की जीत के रुप में प्रचारित करेगा। गली-गली विजयी जलूस निकाले जाएंगे। मुसलमानों को चिढ़ाने और उकसाने वाले नारे लगाए जाएंगे। जबरदस्त आतिश बाजी की जाएगी। इन हरकतों का क्या परिणाम होगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। यदि फैसला बाबरी मस्जिद के हक में आया तो संघ परिवार उग्र आन्दोलन शुरु करेगा। इसका नतीजा क्या होगा इसका अंदाजा लगाना और भी ज्यादा आसान है। संघ परिवार यही कहता रहा है कि आस्था का फैसला अदालत नहीं कर सकती। उत्तर प्रदेश सरकार को भी साम्प्रदायिक दंगों की आहट लग रही है। इसीलिए उसने सभी जिला प्रशासन को एलर्ट रहने के लिए कहा है।&lt;br /&gt;उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था बिगड़ने का अंदेशा सिर्फ उग्र हिन्दु साम्प्रदायिक संगठनों से ही नहीं है। यह अंदेशा मुसलमानों के नाम पर राजनीति करने वाले उन राजनैतिक दलों से भी है, जो आजकल मुसलमानों के नाराजगी चलते मुस्लिम समर्थन पाने के लिए छटपटा रहे हैं। हालांकि आरएसएस ने कहा है कि 16 अगस्त से शुरु होने वाले कार्यक्रमों में भाजपा की कोई भूमिका नहीं होगी, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा संघ परिवार का अभिन्न अंग है। कहने के लिए संघ परिवार में कई तरह के संगठन हैं, लेकिन सबका एजेण्डा समान ही है। इसलिए यह महज कहने की ही बात है कि भाजपा कार्यक्रमों से दूर रहेगी। क्योंकि भाजपा को आज भी यही लगता है कि राममंदिर ही उसकी नैया को दोबारा पार लगा सकता है।&lt;br /&gt;'बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी', इस हालत में नहीं है कि वह कोई बड़ा आंदोलन खड़ा कर सके। उसका वजूद अब लगभग खत्म हो चुका है। शायद इसीलिए 'बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी' के संयोजक और अदालत में बाहैसियत एक वकील मुसलमानों की तरफ से पैरवी कर रहे जफरयाब जिलानी कहते हैं कि 'हम बाबरी मस्जिद पर मामले पर मुकदमा लड़ रहे हैं। हमें आंदोलन चलाने की कोई जरुरत नहीं है'। 'बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी' के संस्थापक चैयरमैन रह चुके जावेद हबीब का भी जफरयाब जिलानी की तरह यही कहना है कि 'विहिप के प्रस्तावित आंदोलन के जवाब में कोई आंदोलन चलाने का हमारा कोई इरादा नहीं है'। जावेद हबीब तो एक कदम आगे जाकर मसले का हल अदालत से बाहर जाकर बातचीत से करने पर जोर देते हैं। इस तरह से कहा जा सकता है कि आज की तारीख में बाबरी मस्जिद के नाम पर आंदोलन करने के लिए मुसलमानों की न तो इच्छा है और न ही उनके पास कोई संगठन है। उत्तर प्रदेश का मुसलमान फिलहाल चुप है। जो भी मुस्लिम नेतृत्व है, वह अदालत का फैसला, चाहे जो भी हो, मानने की बात करता है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि अब मुसलमान बाबरी मस्जिद से आगे की सोचने लगा है। राममंदिर-बाबरी मस्जिद आन्दोलन के चलते मुसलमानों ने बहुत कुछ खोया है। उन्हें एहसास हो गया है कि किसी भी सूरत में नुकसान उनका ही होता है। धर्मनिरपेक्षता और मुसलमानों का हमदर्द होने का स्वांग रचने वाले राजनैतिक दलों को फायदा होता है। इधर, अब संघ परिवार से मुसलमानों ने डरना छोड़ दिया है। मुसलमानों ने देख लिया है कि भाजपा भी उनके वोटों के लिए ऐसे ही लार टपकाती है, जैसे अन्य राजनैतिक दल टपकाते हैं। हिन्दुओं का एक बहुत बड़ा वर्ग भाजपा के साथ इसलिए लगा था कि वह अपने आप को एक अलग तरह की पार्टी बताती थी। लेकिन उस वर्ग ने भी देखा कि भाजपा के नेता भी उतने ही भ्रष्ट और नाकरा है, जितने अन्य दलों के नेता हैं।&lt;br /&gt;इन हालात में भी यदि संघ परिवार सोचता है कि राममंदिर मुद्दे में फिर से जान डाली जा सकती है तो यही का जाएगा कि वह मूर्खों की जन्न्त में रहते हैं। सवाल यही है कि क्या राख के ढेर में आग लगायी जा सकती है ? हालात तो यह कह रहे हैं कि संघ परिवार को को मुंह की खानी पड़ेगी। अभी पिछले पखवाड़े विहिप के फायर ब्रांड कहे जाने वाले प्रवीण भाई तोगड़िया मेरठ आए थे। नब्बे के दशक में प्रवीण भाई तोगड़िया के बयानों से आग लग जाती थी। लेकिन 2010 में मेरठ के लोगों ने उन्हें बुरी तरह से नकार दिया। उनके कार्यक्रम में मुट्ठी भर लोग ही जमा थे। जो वक्ता थे, वो ही श्रोता भी थे। इन हालात में अंदाजा लगाया जा सकता है कि राममंदिर मुद्दे में जान डालना कितना टेढ़ा काम है। लेकिन यह बात ध्यान में रखी जानी चाहिए कि भले ही संघ परिवार के पास आज की तारीख में मंदिर मुद्दे को गरमाने के लिए जन समर्थन न हो लेकिन संघ परिवार मुद्दे को गर्माने की पूरी कोशिश करेगा। इस कोशिश में उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था को खतरा तो हो ही सकता है। ऐसे में उत्तर प्रदेश सरकार यदि फूंक-फुंक रख रही है तो वह सही कर रही है। उसे पता है कि इस मुद्दे पर उसके किसी भी गलत फैसले से उसका हश्र भी भाजपा और कांग्रेस जैसा हो सकता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-810266474921746878?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/810266474921746878/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=810266474921746878' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/810266474921746878'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/810266474921746878'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2010/08/blog-post_13.html' title='उत्तर प्रदेश में साम्प्रदायिक दंगों की आहट'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-3970754545010045369</id><published>2010-08-06T07:56:00.000-07:00</published><updated>2010-08-06T07:59:18.860-07:00</updated><title type='text'>बहुत हुआ, अब वीएन राय को गरियाना बंद करें</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सलीम अख्तर &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सिद्दीक़ी&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;वीएन राय के माफी मांगने के बाद उन पर कीचड़ उछालना बंद होना चाहिए। पिछले कुछ दिनों से देखा जा रहा है कि किसी न किसी बहाने वीएन राय पर कीचड़ उछाली जा रही है। वीएन राय ने सभी लेखिकाओं को छिनाल नहीं कहा था। जरा उनके शब्दों पर ध्यान दीजिए – ‘हिंदी में लेखिकाओं का एक वर्ग ऐसा है, जो अपने आप को बड़ा छिनाल साबित करने में लगा है’। उनके इस वक्तव्य के बाद यह पता लगाना बेहद मुश्किल है कि उनका इशारा किस ओर था। कुछ लेखिकाओं ने उनके बयान पर तल्ख टिप्पणियां की हैं। मैत्रेयी पुष्पा ने तो उन्हें सीधे-सीधे ‘लफंगा’ ही कह दिया है। वीएन राय ने तो किसी का नाम लेकर कुछ नहीं कहा था, लेकिन मैत्रेयी पुष्पा ने उन्हें लफंगा कहकर यह साबित कर दिया है कि साहित्यकारों में कहीं न कहीं संयम खोने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। वीएन राय ने लेखिकाओं के एक वर्ग को छिनाल कहा तो कयामत आ गयी, लेकिन किसी को लफंगा कहना कहां तक सही है।&lt;br /&gt;मैत्रेयी पुष्पा ने ही नहीं, बल्कि हर वह आदमी, जो प्रगतिशील और स्त्रियों का पैरोकार होने का दम भरता है, वीएन राय को गरियाने में लगा है। बात यहीं खत्म नहीं होती। आलोक तोमर जैसे वरिष्ठ पत्रकार, जिनकी मैं बहुत इज्जत करता हूं, ने भी बहती गंगा में हाथ धो लिये। उन्होंने तो वीएन राय लिखित उपन्यास “शहर में कर्फ्यू” पर ही सवालिया निशान लगा दिया। आलोक तोमर ने यह कह कर कि ‘वीएन राय हिंदी साहित्य के आईएस जौहर साबित हुए हैं, इधर दंगा खत्म हुआ, उधर उपन्यास बाजार में आ गया’ यह साबित करने की कोशिश की है कि वीएन राय का उपन्यास ‘शहर में कर्फ्यू’ मौलिक नहीं था। इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि वीएन राय ने ‘शहर में कर्फ्यू’ लिख कर उस मिथक को तोड़ने का काम किया था, जिसमें यह कहा जाता रहा है कि हर दंगे के लिए मुसलमान ही जिम्मेदार होते हैं। आलोक तोमर की नजर में ‘वीएन राय धर्म विरोधी होने की हद तक धर्मनिरपेक्ष हैं’। मेरा मानना है कि धर्म आदमी का निजी मामला होता है। वह किसी धर्म को माने या नहीं इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए।&lt;br /&gt;याद कीजिए 1987 का मेरठ का हाशिमपुरा कांड। यह वह दौर था, जब मेरठ में मुसलमानों का कत्लेआम किया जा रहा था। मुसलमानों की सुनने वाला कोई नहीं था। यहां तक की मेरठ का तथाकथित मुस्लिम नेतृत्व भी बेहद खौफजदा था। इसी दौर में पीएसी कुछ ट्रकों में मुस्लिम युवकों को भरकर ले गयी थी। पीएसी ने उन मुस्लिम युवकों को गोली मारकर मुरादनगर (गाजियाबाद) की गंग नहर में बहा दिया था। उस वक्त वीएन राय गाजियाबाद के एसएसपी थे। उन्होंने ही पूरे केस को मीडिया को बताया था। पीएसी के खिलाफ मामला दर्ज हुआ था। ‘छिनाल’ प्रकरण से कुछ दिन पहले ही वीएन राय ने दिल्ली की अदालत में चल रहे हाशिमपुरा कांड केस में गवाही दी है। मेरा मानना है कि किसी इंसान के अच्छे कामों को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;इसमें दो राय नहीं, इधर जब से बंगलादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने अपने जीवन के कुछ अंतरंग क्षणों को कागज पर उतारा है और उन्हें शोहरत हासिल हुई है, तब से हमारी हिंदी की कुछ लेखिकाएं भी तस्लीमा नसरीन के रास्ते पर चलती नजर आ रही हैं। उपन्यासों, कहानियों अथवा आत्मकथाओं में लेखिकाएं किसी न किसी बहाने यौन संबंधों का जमकर उल्लेख कर रही हैं। लेखिकाओं में यह प्रवृत्ति नयी नहीं है। तस्लीमा नसरीन की देखा-देखी और ज्यादा बढ़ी है।&lt;br /&gt;इस प्रकरण में वीएन राय से ज्यादा दोषी ‘नया ज्ञानोदय’ के संपादक रवींद्र कालिया हैं। उन्होंने एक संपादक का सही ढंग से या तो निर्वहन नहीं किया अथवा उन्होंने जाबूझकर ‘छिनाल’ शब्द को छपने दिया। शायद वह साक्षात्कार को विवादस्पद बनाकर ‘नया ज्ञानोदय’ के अंक को चर्चा में लाना चाहते हों। इधर हमारे नेताओं ने भी अपना संयम खोया है। लेकिन प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने कहे गये शब्दों को संपादित करके अपनी जिम्मेदार का सही निर्वहन किया है। रवींद्र कालिया भी ऐसा कर सकते थे। &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-3970754545010045369?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/3970754545010045369/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=3970754545010045369' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/3970754545010045369'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/3970754545010045369'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2010/08/blog-post_06.html' title='बहुत हुआ, अब वीएन राय को गरियाना बंद करें'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-6656649965675040870</id><published>2010-08-05T06:07:00.000-07:00</published><updated>2010-08-05T06:08:37.849-07:00</updated><title type='text'>फिर डराया 'चौथी दुनिया' ने</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सलीम अख्तर सिद्दीक़ी&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;            जब मैंने न्यूज पोर्टल 'भड़ास फॉर डाट कॉम' पर यह खबर देखी थी कि 'चौथी दुनिया' का दोबारा प्रकाशन होने जा रहा है तो मुझे बहुत खुशी हुई थी। इसी खुशी में मैंने 'भड़ास' की उस खबर को कॉपी करके अपने ब्लॉग पर डाल दिया था। थोड़ी देर बाद ही भाई यशवंत ने मेरे ब्लॉग पर कमेंट किया कि भाई यह तो भड़ास का माल है, कम से कम साभार तो लिख दिया होता। बहरहाल, 'चौथी दुनिया' का प्रकाशन हुआ। अबकी बार भी सम्पादक वही संतोष भारतीय थे, जो 1986 वाले 'चौथी दुनिया' के सम्पादक थे। पहला अंक देखा तो बहुत मायूसी हुई। नये 'चौथी दुनिया' पर उस संतोष भारतीय की छाप नहीं थी, जिसका में प्रशंसक रहा हूं। मेरे जेहन में तो 1986 वाला 'चौथी दुनिया' बसा हुआ था। लेकिन 1986 के मुकाबले 21वीं सदी का अखबार फुल कलर तो था, लेकिन 1986 वाले तेवर नदारद थे। उस पर तुर्रा यह कि बीस पेज का अखबार बीस रुपए की कीमत में था। पता नहीं अखबार के कर्ता-धर्ताओं को किसने यह समझा दिया था कि अब भारत का हर नागरिक लखपति हो गया है, जो हर हफ्ते बीस रुपए खर्च करने में नहीं हिचकिचाएगा। उस पर भी यह दावा कि अखबार जन सरोकार की पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध होगा। पहला अंक खरीदने के बाद दूसरा अंक खरीदने की हिम्मत नहीं हुई। मेरी तरह और लोगों की भी हिम्मत नहीं हुई होगी। तभी तो हमारे मेरठ के एक बुक स्टॉल पर जितने अखबार आते थे, उतने ही वापस चले जाते थे। फिर एक दिन पता चला कि 'चौथी दुनिया' सोलह पेज का हो गया है, लेकिन कीमत पांच रुपए हो गयी है। तब से 'चौथी दुनिया' लगातार लिया जाने लगा। बुक स्टॉल पर भी अखबार जल्दी ही खत्म होने लगा।&lt;br /&gt;1986 का 'चौथी दुनिया' अपने आप में एक मुकम्मल अखबार था। पूरा ब्लैक एण्ड व्हाइट था। लगभग हर राज्य से खबरें होती थीं, भले ही वह छोटी होती थी। अब तो ऐसा लगता है, जैसे-तैसे अखबार पूरा करना है। घपलों-घोटालों और जनता को डराने वाली खबरों को ही ज्यादा अहमियत दी जाती है। जबरदस्ती पेज पूरा किया जाता है, उसके लिए भले ही हैडिंग का साइज बहुत बड़ा करना पड़े या तस्वीरों को बड़ा करके लगाना पड़े। एक बात और जो समझ नहीं आती आखिर शिरडी के सांई बाबा को हर हफ्ते पूरा एक पेज क्यों दिया जाता है ? यह ठीक है कि अखबार के मालिक या सम्पादक की अपनी आस्था हो सकती है, लेकिन उस आस्था को पाठकों पर थोपना कहां तक सही है ? जो एक पेज सांई बाबा को समर्पित किया जाता है, उस पेज का सदुपयोग किसी अच्छी स्टोरी के लिए भी तो किया जा सकता है।   &lt;br /&gt;अखबार में ऐसी-ऐसी रिपोर्ट छापी जा रही हैं, जिनका कोई सिर पैर नहीं होता। बहुत सी रिपोर्टें तो ऐसी छपी हैं, जो कम शब्दों में पूरी की जा सकती थीं, लेकिन जबरदस्ती खींचतान करके दो पेज की बना दी गयीं। किसी-किसी रिपोर्ट में तो सिवाए लफ्फाजी के कुछ नहीं होता। उदाहरण के लिए 2 से 8 अगस्त के अंक देखा जा सकता है। पहले पेज की स्टोरी है- 'एक बम दिल्ली खत्म'। इस स्टोरी में खोजी पत्रकारिता के नाम पर जो कुछ छापा गया है, वह हॉलीवुड की कई फिल्मों का विषय रहा है। अनेक समाचार-पत्र और पत्रिकाएं भी इस बात को लिख चुकी हैं कि एटमी वार कैसी होगी। इस बात पर भी बार-बार चिंता जताई जा चुकी है कि पाकिस्तान के एटम बम सिरफिरे आतंकवादियों के हाथ लग गए तो क्या होगा। यही बात इस स्टोरी में भी उठायी गयी है। स्टोरी पढ़कर ऐसा लगा जैसे, 'इंडिया टीवी' सरीखे किसी चैनल की स्क्रिप्ट में कुछ फेर बदल करके छाप दिया गया हो। पूरी स्टोरी की थीम इस बात पर टिकी है कि यदि कभी पाकिस्तान या आतंकवादियों ने दिल्ली या मुंबई पर एटम गिराया जो क्या होगा। यह भी सवाल उठाया गया है कि क्या भारत सरकार के पास ऐसे संकट से निपटने के साधन मौजूद हैं ?&lt;br /&gt;'चौथी दुनिया' के सवाल सही हो सकते हैं। लेकिन क्या 'चौथी दुनिया' के सम्पादक यह नहीं जानते की जिस देश की सरकार हर साल बाढ़ आने से होने वाले नुकसान को रोकने के उपाए आज तक नहीं कर पायी,  वह उस हादसे से होने वाले नुकसान को रोकने के उपाए कैसे कर सकती है, जो सिर्फ कल्पना पर ही आधारित हो। भारत ही क्यों, एटमी वार की त्रासदी को झेलने के लिए तो अमेरिका सरीखे विकसित देश भी अभिशप्त होंगे। अमेरिका भी अपने उन शहरों की हिफाजत के लिए कुछ नहीं कर पाया है, जहां अक्सर तूफान आते रहते हैं। कुल मिलाकर स्टोरी से एक बार फिर जनता को डराने की कोशिश की गयी है। ऐसे ही जैसे कुछ टीवी चैनल यह बताकर डराते आ रहे हैं कि  2012 में कयामत आ जाएगी। कभी-कभी तो लगता है कि अखबार अपनी प्रसार संख्या बढ़ाने के फेर में अपने पैर पर खुद ही कुल्हाड़ी मार रहा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-6656649965675040870?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/6656649965675040870/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=6656649965675040870' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/6656649965675040870'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/6656649965675040870'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2010/08/blog-post_05.html' title='फिर डराया &apos;चौथी दुनिया&apos; ने'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-3070037092837682712</id><published>2010-08-03T03:56:00.000-07:00</published><updated>2010-08-03T03:58:15.926-07:00</updated><title type='text'>मुलायम को माफ नहीं करेगा मुसलमान</title><content type='html'>&lt;a href="http://www.visfot.com/index.php/author/saleem/"&gt;सलीम अख्तर सिद्दीक़ी&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मुलायम सिंह यादव ने अपनी 'सल्तनत' बचाने के लिए मुसलमानों से माफी मांगी है। लेकिन अब इतनी देर हो गयी है कि मुसलमानों से माफी मांगने से काम नहीं चलने वाला है। हालांकि माफी के बाद मुलायम सिंह यादव के बंगले पर कुछ उलेमाओं ने 'हाजिरी' देकर मुलायम सिंह यादव की माफी की कद्र की और उनकी शान में 'कसीदे' जरूर पढ़े हैं। पता नहीं इस देश के सियासतदां यह कब समझेंगे कि मुसलमान सियासत में उलेमाओं की हर बात नहीं मानता।&lt;br /&gt;और उलेमा भी कब इस बात को समझेंगे कि यह जरुरी नहीं है कि उलेमाओं की हर बात पर मुसलमान 'लब्बेक' कहें। सियासत के मामले में मुसलमानों की अपनी पसंद और सोच है। इसी तरह किसी उलेमा की सोच और पसंद भी अलग-अलग सियासी पार्टी की बाबत अलग-अलग हो सकती है। इसलिए कुछ उलेमाओं द्वारा माफी को 'काफी' मान लेना जल्दबाजी होगी। सवाल यह है कि आम मुसलमान मुलायम सिंह यादव के बारे में क्या राय रखता है ? वह मुलायम की माफी को 'काफी' मानता है या 'नाकाफी' मानता है ? यह ठीक है कि अक्टूबर 1990 में जब पूरा संंघ परिवार कारसेवा के नाम पर बाबरी मस्जिद को ढहाने के लिए अयोध्या में जमा हो गया था तो उन्होंने कानून का सहारा लेकन एक बड़े हादसे को टाल दिया था। उस एहसान का बदला भी मुसलमानों उन्हें भरपूर समर्थन देकर अदा किया था। लेकिन दिक्क्त तब पैदा हुई, जब मुलायम सिंह ने मुसलमानों को केवल एक वोट बैंक के रुप में देखा। वोट के बदले मुसलमनों को सत्ता में भागीदारी के नाम पर एक दो मुसलमान को मंत्री बनाना ही काफी समझ लिया। सरकारी नौकरियों में केवल यादवों को तरजीह दी गयी। मुलायम सिंह यादव की सरकार एक तरह से यादवों की सरकार रही। मुसलमान केवल वोट देकर सरकार बनवाने तक ही सीमित रहे।समाजवादी पार्टी में पार्टी की बुनियाद के पत्थर कहे जाने वाले आजम खान, राजबब्बर, सलीम शेरावानी, शफीर्कुरहमान बर्क और बेनी प्रसाद वर्मा सरीखे लोगों को हाशिए पर डाल दिया गया। मुलायम सिंह यादव परिवार मोह में ऐसे फंसे कि फिरोजाबाद उपचुनाव में अपनी बहु डिम्पल को उतार दिया। मुलायम सिंह यादव का यह कदम आत्मघाती था। प्रदेश के सभी वर्ग के लोगों को यह लगा कि मुलायम सिंह यादव का परिवार ही सत्ता का सुख भोगना चाहता है.&lt;br /&gt;समाजवादी पार्टी में समाजवाद खत्म किया गया। मुसलामन भी यह देखकर दुखी होते थे कि सपा में पूंजीपतियों का राज कायम हो गया था। अमर सिंह ने सपा को समाजवाद के रास्ते से भटका कर पूंजीवादी पार्टी बनाने के साथ ही उसे पूंजीपतियों और फिल्मों सितारों से सजाकर ग्लैमरस कर दिया था। मुलायम सिंह के परिवार के कुछ सदस्य पथभ्रष्ट हुए। पूरा परिवार पैसा बनाने में जुट गया था। सैफई में फिल्मी अभिनेत्रियों को नचाया गया। इन्हीं सब बातों से खफा पार्टी का एक वर्ग समाजवाद से भटक कर पूंजीवाद को थामने का विरोध करता आ रहा था। इसमें मुसलमान भी शामिल थे। जैसे इतना ही काफी नहीं था। मुलायम सिहं यादव ने यह समझ लिया था कि मुसलमान समाजवादी पार्टी का 'अंध भक्त' है, इसलिए कुछ भी किया जा सकता है। इसलिए सपा से उस साक्षी महाराज को राज्यसभा में भेजा गया, जिसने गर्व से कहा था कि बाबरी मस्जिद पर सबसे पहला फावड़ा उसने चलाया था। मुसलमानों ने इसे भी बर्दाश्त किया। फिर कल्याण सिंह के बेटे राजबीर सिंह को मंत्री बनाया। मुसलमानों ने इसे भी सहा। लेकिन जब 2009 लोकसभा चुनाव में कल्याण सिंह के जिन्दाबाद के नारे लगवाए गए तो मुसलमानों के सब्र का बांध टूट गया। मुसलमान पहले से ही सपा से खफा चल रहा था। कल्याण सिंह की आमद ने नाराजगी को चरम पर पहुंचा दिया। यही वजह रही कि उत्तर प्रदेश में हाशिए पर पड़ी कांग्रेस फिर से 20 सीटें जीतकर मुख्य धारा में आ गयी। मुसलमान इस बात को नहीं पचा पाए कि जिस कल्याण सिंह को मुसलमान अपना दुश्मन मानते रहे हैं, उस आदमी को कैसे समाजवादी पार्टी में बर्दाश्त किया जा सकता है।अब आजम खान की बात करते हैं। आजम खान सपा का तेजतर्रार मुस्लिम चेहरा रहे हैं। उन्होंने मुसलमानों के लिए कुछ किया हो, याद नहीं पड़ता। जब 1987 में मलियाना कांड हुआ था तो उनके दिल में मलियाना के लोगों के लिए बहुत दर्द था। उन पर मेरठ में घुसने की पाबंदी थी। वह बार-बार पाबंदी तोड़कर छुपकर मलियाना आते थे। मेरठ स्टेशन पर कई बार मैंने उन्हें रिसीव किया। मलियाना का दौरा कराया। बड़ी-बड़ी बातें करते थे। कहते थे कि उत्तर प्रदेश में जनता दल की सरकार आयी तो मलियाना कांड की दोषी पीएसी और पुलिस को सजा दिलवाएंगे। 1989 को उत्तर प्रदेश में जनता दल की सरकार बन गयी। आजम खान श्रम मंत्री बने। उसके बाद से उनकी शक्ल मलियाना के लोगों ने नहीं देखी। मेरठ बहुत बार आए, लेकिन मलियाना आना गंवारा नहीं किया। आजम खान अपने भाषणों में मलियाना और हाशिमपुरा का जिक्र करके राजनैतिक लाभ जरुर लेते रहे।  मलियाना कांड की न्यायिक जांच रिपोर्ट सरकार के पास है, मुलायम सिंह यादव की तीन बार प्रदेश में सरकार बनी। हर सरकार में आजम खान मंत्री बने, लेकिन जांच रिपोर्ट अलमारी रखी धूल फांकती रही। सच यह भी है कि आजम खान को इस बात पर नाराजगी नहीं थी कि कल्याण सिंह को सपा में ले लिया गया। उनकी असली नाराजगी तो इस बात पर थी कि रामपुर से जया प्रदा को टिकट क्यों दिया गया। यदि रामपुर सीट मामले में मुलायम सिंह यादव आजम खान की मान लेते तो यकीन जानिए उन्हें कल्याण सिंह कबूल थे। कल्याण सिंह को तो उन्होंने केवल ढाल बनाया था। इस बात का सबूत यह है की जब सपा ने साक्षी महाराज को राज्यसभा में भेजा था और कल्याण सिंह के बेटे राजबीर सिंह को मंत्रीमंडल में शामिल किया था तो आजम खान ने आपत्ति नहीं की थी।मुलायम सिंह यादव की माफी का अब इसलिए भी महत्व नहीं है कि भाजपा और सपा बाबरी मस्जिद बनाम राममंदिर की पैदाइश थीं। राममंदिर मुद्दा अब राख में तबदील हो चुका है। भाजपा और सपा एक दूसरे को ताकत देने का काम करती थीं। भाजपा खत्म हुई है तो सपा को भी खत्म होना ही था। ऐसे में मुलायम सिंह यादव की माफी सपा को फिर से खड़ा कर सकेगी, इसमें संदेह है। उत्तर प्रदेश में अब दो राजनैतिक ताकतें रह गयी हैं। भाजपा को रोकने के लिए मुसलमानों के पास अब कांग्रेस और बसपा के रुप में दो विकल्प हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-3070037092837682712?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/3070037092837682712/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=3070037092837682712' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/3070037092837682712'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/3070037092837682712'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2010/08/blog-post_03.html' title='मुलायम को माफ नहीं करेगा मुसलमान'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-7405106243222845259</id><published>2010-06-19T06:20:00.000-07:00</published><updated>2010-06-19T06:21:09.633-07:00</updated><title type='text'>भोपाल गैस त्रासदी और फैसले के बीच</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सलीम अख्तर सिद्दीकी&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;भोपाल गैस त्रासदी जैसे भूले-बिसरे मौत के तांडव को एक फैसले ने इतनी शिद्दत से याद दिला दिया है कि इस की जद में आने से कोई नहीं बच सकता है। राजनैतिक पार्टियां, मीडिया और नौकरशाही भी कठघरे में खड़ा हो गयी है। पच्चीस साल का वक्फा कम नहीं होता। सब कुछ बदल गया है। यदि नहीं बदला तो गैस त्रासदी में मारे गए लोगों के परिजनो का दर्द और हताशा। सबसे बडे+ लोकतान्त्रिक देश का दम भरने वाले भारत में अनेकों सरकार आई और चली गयीं, लेकिन भोपाल गैस त्रासदी को सबने भुला दिया। पच्चीस साल बाद जब एक फैसले में भोपाल गैस त्रासदी के जिम्मेदारों को महज दो-दो साल की सजा सुनाई जाती है तो चारों और विधवा विलाप शुरु हो जाता है। मीडिया बहुत ही बेशर्मी के साथ वॉरेन एण्डरसन पर हमलावर हो जाता है। अचानक मीडिया पता लगा लेता है कि एण्डरसन कैसे भागा ? उसको भागने में किसने मदद की ? भोपाल के तत्कालीन जिलाधिकारी की अन्तरआत्मा भी जाग गयी। मीडिया ने वे पायलट भी ढूंढ निकाले, जो एण्डरसन को भोपाल से दिल्ली ले गए थे। यहां बहुत सारे ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब मीडिया, राजनैतिक दलों और नौकरशाहों को देना चाहिए। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि सब की जबान तभी क्यों खुल रही है, जब सब कुछ खत्म हो गया ? मीडिया के पास एण्डरसन के भागने वक्त का वह विजुअल भी मीडिया के हाथ अभी क्यों लगा ? पिछले पच्चीस सालों से जब हर दो दिसम्बर को गैस पीड़ित अपने-अपने तरीके से इंसाफ की गुहार लगाने सड़कों पर आते थे, तब किसी की आंख क्यों नहीं खुली ? यदि उस वक्त के नौकरशाहों ने सरकारों के इशारे पर एण्डरसन को भगाया तो यह मानना ही पड़ेगा कि नौकरशाह सरकार के गुलाम ज्यादा है, जनता के हितेषी कम हैं। भोपाल गैस त्रासदी के जिम्मेदार लोग नेताओं और सरकार के जरखरीद गुलाम नौकरशाहों की वजह से कम सजा पाने से बच गए। अब खबर आयी है कि सरकार गैस पीड़ितों को भारी मुअवाजा देने का इरादा कर रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार गैस पीड़ितों की वास्तव में मदद करेगी।&lt;br /&gt;2 दिसम्बर 1984 और 7 जून 2010 के बीच बहुत कुछ घटा। कई सरकारें आईं। जब भोपाल गैस त्रासदी हुई थी तो उस वक्त इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश नाजुक दौर से गुजर रहा था। लोकसभा के चुनाव घोषित हो चुके थे। चुनाव प्रचार चल रहा था। इसी प्रचार के दौरान एण्डरसन को भगाया गया। इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति को वोट में तब्दील करने की कोशिश हुई, जो कामयाब रही। कांग्रेस को 425 सीटें हासिल हुईं। राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने। राजीव गांधी को खयाल नहीं रहा कि भोपाल के लोगों का हत्यारा देश को छोड़कर भाग गया है। 1986 में देश में राम मंदिर और बाबरी मस्जिद का बखेड़ा शुरु हो गया। मंदिर और मस्जिद की बात करने वालों को गैस से मरने वाले हजारों लोगों की लाशें नजर नहीं आईं बल्कि और ज्यादा लाशें बिछाने में मशगूल हो गए। इसी दौरान देश पर बोफार्स तोप दलाली का भूत सवार हो गया। विश्वनाथ प्रताप सिंह कांग्रेस से अलग होकर कांग्रेस को जड़ से उखाड़ फेंकने की मुहिम में जुट गए। वह हर सभा में कहते थे कि बौफोर्स तोप में दलाली खाने वालों के नाम की लिस्ट मेरी जेब में पड़ी है, वक्त आने पर देश को बताउंगा। वीपी सिंह प्रधानंत्री बन गए। लेकिन बौफोर्स तोप में दलाली खाने वालों के नाम सामने नहीं आए। वीपी सिंह को भी, जिन्हें गरीबों का मसीहा कहा जाता था, भोपाल के गैस पीड़ित याद नहीं आए। भाजपा ने देश को राममंदिर के नाम पर आग में झोंक दिया। हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच दीवार खड़ी करने का काम किया। राम के नाम पर सत्ता का सुख भोगा। भोपाल गैस पीड़ितों को भाजपा ने भी भुला दिया। जानते हैं ऐसा क्यों हुआ। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि भोपाल गैस त्रासदी में मरने वाले गरीब-गुरबे लोग थे। उनकी लाशों पर राजनीति करने से वोट नहीं मिल सकते थे। उस वक्त इंदिरा गांधी की हत्या में वोट थे। बौफोर्स तोप दलाली में वोट थे। राममंदिर और बाबरी मस्जिद में वोट थे। इसलिए भोपाल गैस से मरने वालों की चीत्कारों का असर किसी पर भी नहीं हुआ था।       &lt;br /&gt;अब इस बात पर आते हैं कि क्या भोपाल गैस त्रासदी के शिकार लोगों को ही इस देश में इंसाफ नहीं मिला है ? जरा दिमाग पर जोर देकर सोचिए कि लगभग पच्चीस साल पहले ही हुए अनेक सामूहिक नरसंहारों के शिकार लोगों को कितना इंसाफ मिला है ? यह भी याद रखिए कि देश में हुए सामूहिक नरसंहारों के दोषी एण्डरसन की तरह विदेशी नहीं थे, यहीं के लोग थे और एण्डरसन की तरह भागे भी नहीं है, बल्कि देश में ही रह कर शासक रह चुके हैं और आज भी हैं। सामूहिक नरसंहारों को भी नेताओं के इशारे पर उन नौकरशाहों की देख-रेख में किया गया था, जिन नौकरशाहों ने एण्डरसन को भगाने में मदद की थी। जब भोपाल गैस त्रासदी हुई थी तो उससे ठीक एक महीना पहले इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में सिखों का कत्लेआम किया गया था। क्या आज तक इंसाफ मिला ? कत्लेआम को आयोग-दर-आयोग बैठाकर भुला दिया गया। राम मंदिर आंदोलन के बहाने पूरे देश में कई सामूहिक नरसंहार हुए, आयोग बैठे। नतीजा सिफर। मलियाना, हाशिमपुरा, कानपुर, मुंबई, भागलपुर, मुरादाबाद, अलीगढ़ और भिवंडी। कहां तक नाम लें। 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद को तोड़ दिया गया। उसके अपराधी तो देश पर छह साल तक देश पर शासन ही करके चले गए। सत्रह साल बाद लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट आयी। क्या हुआ ? कुछ दिन बहस हुई और फिर सब कुछ शांत हो गया। फरवरी 2002 में गुजरात में जो हुआ, वह तो इतना हौलनाक था कि सोच कर भी रुह कांप जाए। जब कातिल ही मुंसिफ हो तो इंसाफ की उम्मीद कैसे की जाए ? मुंबई दंगों की जांच करने वाले श्रीकृष्णा आयोग की रिपोर्ट को डस्टबिन में डाल दिया गया। गुजरात दंगों की जांच कई आयोग कर चुके हैं लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। दरअसल, सामूहिक नरसंहारों के दोषियों को सजा मिले यह कोई नहीं चाहता। सरकार भी नहीं और न्याय पालिका भी नहीं। मामले को लम्बा लटका कर भुलाने की कोशिश की जाती है। कोशिश कामयाब भी हो जाती है। इससे पहले कि किसी सामूहिक नरसंहार के दोषियों को अदालतें बाइज्जत बरी कर दें, मीडिया को इधर भी ध्यान देना चाहिए। वैसे मीडिया तभी हाय-तौबा मचाता है, जब कुछ ऐसा हो जाए, जिससे उसकी टीआरपी बढ़े।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-7405106243222845259?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/7405106243222845259/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=7405106243222845259' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/7405106243222845259'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/7405106243222845259'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2010/06/blog-post_19.html' title='भोपाल गैस त्रासदी और फैसले के बीच'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-3424868278233216205</id><published>2010-06-16T23:33:00.000-07:00</published><updated>2010-06-16T23:37:00.933-07:00</updated><title type='text'>कब तक केवल मुसलमान पकड़े जाते रहेंगे?</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt; शेष नारायण सिंह&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;पुणे की जर्मन बेकरी के विस्फोट के मामले में महाराष्ट्र पुलिस ने मुंह की खाई है। राज्य के पुलिस महानिदेशक डी शिवनंदन ने बयान दे दिया है कि जर्मन बेकरी केस में पुलिस का काम बिलकुल गलत ढर्रे पर चल रहा था और अब तक जो कुछ भी जांच हुई है, उसका केस से कोई मतलब नहीं है। जांच फिर से करनी होगी। जांच का काम एटीएस को दिया गया था। राज्य के सबसे बड़े पुलिस अधिकारी ने ऐलानिया कहा है कि अब तक की जांच को कूड़ेदान के हवाले करके नये सिरे से तफ्तीश होगी। उन्होंने अखबार वालों को बताया कि एटीएस को केस का ठीक से अध्ययन करना पड़ेगा, वैज्ञानिक तरीके से सबूत हटाना पड़ेगा और तब उन लोगों के पहचान करनी पड़ेगी जो जर्मन बेकरी कांड के लिए वास्तव में जिम्मेदार हैं। यानी अब तक पुलिस ने जो भी किया, उसमें पेशागत ईमानदारी बिलकुल नहीं है। इस बात की जांच की जानी चाहिए कि जिन लोगों को भी पुलिस ने पकड़ रखा था, उनके खिलाफ केस क्यों बनाया गया।&lt;br /&gt;वैसे भी महाराष्ट्र पुलिस आजकल तरह तरह के गैरकानूनी काम के सिलसिले में खबरों में है। उनके एक इंसपेक्टर को गिरफ्तार किया गया है क्योंकि उसने सुपारी लेकर एक बिल्डर को जान से मारने की कोशिश की थी। ऐसे और भी बहुत से मामले सामने आ चुके हैं, जिसमें पुलिस के तथाकथित इनकाउंटर स्पेशलिस्टों ने निरीह लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। जर्मन बेकरी का मामला थोड़ा पेचीदा है। जिस आदमी के बारे में सर्वोच्च पुलिस अधिकारी ने बताया है कि उसके खिलाफ कोई मामला नहीं है, जब उसे एटीएस वालों ने पकड़ा था तो क्या माहौल था, उस पर नजर डाल लेने से पुलिस की मानसिकता ठीक से समझ में आ जाएगी।&lt;br /&gt;पुणे की जर्मन बेकरी में करीब 4 महीने पहले हुए धमाके में 17 लोग मारे गये थे। पुलिस ने अब्दुल समद उर्फ भटकल नाम के एक आदमी को 24 मई को कर्नाटक से गिरफ्तार किया था। बताया गया कि समद इंडियन मुजाहिदीन के सदस्य यासीन भटकल नाम के आदमी का भाई है। तो क्या पुलिस किसी प्रतिबंधित संगठन के सदस्य के भाई को बिना किसी बुनियाद के गिरफ्तार करने के लिए आजाद है? अब्दुल समद की गिरफ्तारी के बाद तो माहौल ही बदल गया। पुलिस ने दावा किया कि जर्मन बेकरी में लगे क्लोज सर्किट टीवी की तस्वीरें देखने के बाद यह गिरफ्तारी हुई थी और वास्तव में जो आदमी बेकरी के अंदर बम रख रहा था, वह भटकल ही है और उसे गिरफ्तार करके एटीएस वालों ने बड़ी वाहवाही बटोरी थी। हद तो तब हो गयी जब केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने महाराष्ट्र एटीएस को सार्वजनिक रूप से बधाई दी और कहा कि समद जर्मन बेकरी धमाके का एक प्रमुख संदिग्ध है और उसको पकड़ कर पुलिस ने बहुत बड़ा काम किया है। आज जब पुलिस ने खुद यह स्वीकार कर लिया है कि उसके खिलाफ कोई केस नहीं है, तो समद के नागरिक अधिकारों का मलीदा बनाने वालों के साथ क्या सलूक किया जाना चाहिए?&lt;br /&gt;किसी भी आतंकवादी मामले में किसी भी मुसलमान को पकड़ लेने की पुलिस की मानसिकता का इलाज किये जाने की जरूरत है। समद को गलत तरीके से हिरासत में ले लेने का यह कोई इकलौता मामला नहीं है। मुंबई में ही ऐसे कई नौजवान बंद हैं, जनके ऊपर पोटा का केस बनाकर पुलिस ने पकड़ लिया था लेकिन बाद में पता चला कि उन पर कोई मामला ही नहीं था। इन हालात को दुरुस्त करने की जरूरत है। जब से गुजरात में नरेंद्र मोदी का राज आया है, वहां की पुलिस अपने राजनीतिक आका को खुश करने के लिए किसी भी मुसलमान को पकड़ लेती है और उसे प्रताड़ना देकर छोड़ देती है। गुजरात पुलिस ने मुंबई की लड़की इशरत जहां को भी इसी तरह के मामले में पकड़ा था और बाद में फर्जी मुठभेड़ दिखा कर मारा डाला था। उसी मामले में पुलिस वाले आजकल जेल की हवा खा रहे हैं। लेकिन वह तब संभव हुआ, जब मामला सुप्रीम कोर्ट तक पंहुचा।&lt;br /&gt;जरूरत इस बात की है कि शक की बिना पर लोगों को गिरफ्तार करने की पुलिस की ताकत की कानूनी समीक्षा की जाए। वरना मुंबई और गुजरात की जेलों में ऐसे सैकड़ों मुसलमान बंद हैं, जिनके ऊपर जो दफाएं लगायी गयी हैं, उनमें कहीं तीन साल, तो कहीं सात साल की सजा होती है लेकिन ये लड़के पिछले 8-10 सालों से बंद हैं और बाद में उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया जाएगा। यह न्याय व्यवस्था की एक बड़ी कमी है और इस पर फौरन सिविल सोसाइटी, मीडिया और राजनीतिक बिरादरी की नजर पड़नी चाहिए और अंग्रेजों के वक्त की नजरबंदी की पुलिस की ताकत को कम करके देश को एक सभ्य प्रशासन देने की कोशिश करनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;(शेष नारायण सिंह। मूलतः इतिहास के विद्यार्थी। पत्रकार। प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया। 1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की। महात्‍मा गांधी पर काम किया। अब स्‍वतंत्र रूप से लिखने-पढ़ने के काम में लगे हैं। उनसे sheshji@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-3424868278233216205?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/3424868278233216205/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=3424868278233216205' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/3424868278233216205'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/3424868278233216205'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2010/06/blog-post_16.html' title='कब तक केवल मुसलमान पकड़े जाते रहेंगे?'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-5924036154954708707</id><published>2010-06-09T07:47:00.000-07:00</published><updated>2010-06-09T07:48:20.919-07:00</updated><title type='text'>फतवों को दरकिनार करता मुस्लिम युवा</title><content type='html'>&lt;strong&gt;सलीम अख्तर सिद्दीकी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;इस्लाम में फतवे की बहुत मान्यता है। फतवा मुफ्ती से तब मांगा जाता है, जब कोई ऐसा मसला आ जाए जिसका हल कुरआन और हदीस की रोशनी में किया जाना हो। लेकिन पिछले कुछ सालों में ऐसा हुआ है कि फतवों की बाढ़ आ गयी है। इससे एक तो इस्लाम के बारे में गलतफहमियां पैदा हो रही हैं, दूसरे फतवे बेअसर होते जा रहे हैं। दिक्कत यह भी आ रही है कि जब से फतवा ऑन लाइन दिया जाने लगा है, तब से मीडिया का एक वर्ग खबरें क्रिएट करने की नीयत से फतवा मांगता है और फिर उस पर एक बहस चलाता है। ऑन लाइन फतवा देने वाले मुफ्ती को यह पता नहीं चल पाता कि फतवा मांगने वाला दरअसल कोन है ? फतवा मांगने के पीछे उसकी नीयत क्या है ? मसला किस तरह का है ? उसके पीछे जमीनी हकीकत क्या है ? ताजा उदाहरण सहारनपुर का है। सहारनपुर की देवी बालासुदंरी मंदिर मेला कमेटी में एक मुस्लिम प्रतिनिधि भी रखा गया है। इस पर यहां के एक एडवोकेट राघवेन्द्र कंसल ने दारुल उलूम देवबंद के मुफ्तियों से एक लिखित सवाल में यह पूछा कि क्या देवी बालासुंदरी मंदिर कमेटी में किसी मुस्लिम का प्रतिनिधि होना शरई ऐतबार से जायज है अथवा नाजायज ? यहां सवाल पूछने वाले की नीयत का पता चलता हैं। यदि इस सवाल पर दारुल उलूम कुछ भी राय देता, विवाद होना तय बात थी। यह तो अच्छा हुआ कि मुफ्तियों ने इसका जवाब यह कह कर नहीं दिया कि इस तरह का सवाल सम्बन्धित आदमी को ही पूछना चाहिए। इस सवाल पर अपनी राय देने से बचना यह दर्शाता है कि पिछले दिनों कुछ फतवों पर विवाद होने के बाद दारुल उलूम देवबंद ने फतवे देने में एहतियात बरतना शुरु कर दिया है।&lt;br /&gt;अभी पिछले कुछ दिन पहले कुछ ऐसे फतवे आए हैं, जिससे यह संदेश गया है कि इस्लाम में औरतों को कतई आजादी नहीं है। यहां तक कि वह अपने भरण-पोषण के लिए बाहर काम नहीं कर सकती है। एक फतवे में कहा गया है कि मुस्लिम औरतों को मर्दो के साथ काम नहीं करना चाहिए और न ही अपने साथ काम करने वाले पुरुषों से बातचीत करनी चाहिए। सवाल यह है कि जिस औरत के घर में कोई मर्द कमाने वाला न हो तो वह औरत क्या करे ? क्या अपने आप को और अपने बच्चों को भूखा रखे ? यदि उसे काम ही ऐसी जगह मिले जहां पुरुष भी काम करते हों तो वह उसकी मजबूरी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मुसलमानों में कोई ऐसा संगठन है, जो बेसहारा औरतों के भरण-पोषण के लिए फंड रखता हो ? जब हमारे पास बेसहारा औरतों के परिवार के भरण-पोषण के लिए कोई व्यवस्था नहीं है तो फिर हम किस तरह से किसी मुस्लिम औरत को काम करने से रोक सकते हैं ? यदि परिवार की कोई औरत इतनी काबिल है कि वह कहीं नौकरी कर सके तो इसमें भी क्यों किसी को आपत्ति होनी चाहिए ? मंहगाई के इस दौर में लोगों को खर्च चलाना भारी पड़ रहा है। यदि कोई औरत अपने परिवार की आर्थिक जरुरतों को पूरा करने के लिए बाहर बाहर नौकरी करने जाती है तो इसमें कोई बुराई नहीं है। इस्लाम आदमी को जिन्दा रहने का पूरा हक देता है। कहा गया है कि यदि रसद पहुंचने के सभी रास्ते बंद हो जाएं तो जिन्दा रहने के लिए हराम समझी जाने वाली चीज को भी खाया जा सकता है। यहां तो पुरुषों के साथ काम करने की ही बात है।  &lt;br /&gt;एक फतवे में कहा गया कि मुसलमानों को बैंक की नौकरी नहीं करनी चाहिए। एक और फतवे में कहा गया कि मुसलमानों को शराब से सम्बन्धित विभागों में काम नहीं करना चाहिए। इस तरह कि फतवे देकर पता नहीं हमारे मुफ्ती और उलेमा क्या संदेश देना चाहते हैं। एक तो वैसे ही मुसलमानों के पास रोजगार के अवसर नहीं है, दूसरे उस पर यह पाबंदी भी लगा दो कि यहां नौकरी मत करो वहां नौकरी मत करो। कभी कहते हैं कि तस्वीर मत खिंचवाओ। टीवी मत देखो। इंटरनेट से दूर रहो। मजे की बात यह है कि यही उलेमा और मुफ्ती इंटरनेट पर फतवे जारी करते हैं। टीवी चैनलों पर बैठकर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। लेकिन आम मुसलमान को इन सब चीजों से दूर रहने की हिदायत देते हैं। यह तो कहा जा सकता है कि टीवी पर अच्छी चीजें देखिए। इंटरनेट से अच्छी जानकारियां हासिल कीजिए। यह ठीक है कि फिल्म, टीवी और इंटरनेट से बेहयाई और बेशर्मी फैली है। लेकिन इन चीजों से फायदे भी तो नुकसान से ज्यादा हैं। एक चाकू आदमी की अहम जरुरत है। लेकिन कुछ लोग उसी चाकू से किसी की जान भी ले लेते हैं। लेकिन क्या चाकू बनाना बन्द कर देना चाहिए ? वक्त के साथ-साथ बदलाव आते हैं। यह अलग बात है कि पिछले बीस सालों में बहुत तेजी के साथ बदलाव हुए है। दिक्कत यही है कि बदलाव के साथ समाज बदलने को तैयार नहीं है। यदि हमारे उलेमा और तथाकथित खाप पंचायतें यह सोचती हैं कि कई सौ साल पहले की सोच, रीति-रिवाज और परम्पराएं आज भी लागू करवा सकते हैं तो वह गलत सोचते हैं। आज का मुस्लिम युवा फतवों से ज्यादा अपनी पढ़ाई और कैरियर पर ज्यादा ध्यान दे रहा। दिल्ली के कुछ युवाओं ने जिसमें युवतियां भी शामिल हैं, एक साप्ताहिक अखबार से बातचीत में फतवों को तरक्की की राह में रोड़ा बताते हुए दरकिनार कर दिया है। यह अच्छा हो रहा है कि आज का मुस्लिम युवा फतवों को दरकिनार करके जमाने के साथ चलने की कोशिश कर रहा है। कभी-कभी तो लगता है कि हमारे मुफ्तियों को क्योंकि रोजगार की चिंता नहीं है, इसलिए वे एसी कमरों में बैठकर इस तरह के फतवे जारी कर देते हैं, जो जमीनी हकीकत से कोसों दूर होते हैं। जिनका आज के जमाने में कोई औचित्य नहीं है। आज मुसलमानों को फतवों की नहीं, शिक्षा की जरुरत है। रोजगार की जरुरत है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-5924036154954708707?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/5924036154954708707/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=5924036154954708707' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/5924036154954708707'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/5924036154954708707'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2010/06/blog-post_09.html' title='फतवों को दरकिनार करता मुस्लिम युवा'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-3323115524022559541</id><published>2010-06-07T01:29:00.000-07:00</published><updated>2010-06-07T01:32:43.265-07:00</updated><title type='text'>गुजरात में मुसलमान का जिंदा रहना उतना ही मुश्किल है जितना कि पाकिस्तान में हिन्दू का</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;शेष नारायण सिंह&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;गुजरात में एक दलित नेता और उनकी पत्नी को पकड़ लिया गया है . पुलिस की कहानी में बताया गया है कि वे दोनों नक्सलवादी हैं और उनसे राज्य के अमन चैन को ख़तरा है . शंकर नाम के यह व्यक्ति मूलतः आंध्र प्रदेश के रहने वाले हैं लेकिन अब वर्षों से गुजरात को ही अपना घर बना लिया है . गुजरात में साम्प्रदायिकता के खिलाफ जो चंद आवाजें बच गयी हैं , वे भी उसी में शामिल हैं. विरोधियों को परेशान करने की सरकारी नीति के खिलाफ वे विरोध कर रहे हैं और लोगों को एक जुट करने की कोशिश कर रहे हैं .उनकी पत्नी, हंसाबेन भी इला भट के संगठन सेवा में काम करती हैं , वे गुजराती मूल की हैं लेकिन उनको गिरफ्तार करते वक़्त पुलिस ने जो कहानी दी है ,उसके अनुसार वे अपने पति के साथ आंध्र प्रदेश से ही आई हैं और वहीं से नक्सलवाद की ट्रेनिंग लेकर आई हैं . ज़ाहिर है पुलिस ने सिविल सोसाइटी के इन कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करने के पहले होम वर्क नहीं किया था. इसके पहले डांग्स जिले के एक मानवाधिकार कार्यकर्ता ,अविनाश कुलकर्णी को भी गिरफ्तार कर लिया गया था . किसी को कुछ पता नहीं कि ऐसा क्यों हुआ लेकिन वे अभी तक जेल में ही हैं .गुजरात में सक्रिय सभी मानवाधिकार संगठनों के कार्यकर्ताओं को चुप कराने की गुजरात पुलिस की नीति पर काम शुरू हो चुका है और आने वाले वक़्त में किसी को भी नक्सलवादी बता कर धर लिया जाएगा और उसक अभी वही हाल होगा जो पिछले १० साल से गुजराती मुसलमानों का हो रहा है .नक्सलवादी बता कर किसी को पकड़ लेना बहुत आसान होता है क्योंकि किसी भी पढ़े लिखे आदमी के घर में मार्क्सवाद की एकाध किताब तो मिल ही जायेगी. और मोदी क एपुलिस वालों के लिए इतना ही काफी है . वैसे भी मुसलमानों को पूरी तरह से चुप करा देने के बाद , राज्य में मोदी का विरोध करने वाले कुछ मानवाधिकार संगठन ही बचे हैं . अगर उनको भी दमन का शिकार बना कर निष्क्रिय कर दिया गया तो उनकी बिरादराना राजनीतिक पार्टी , राष्ट्रवादी सोशलिस्ट पार्टी और उसके नेता , एडोल्फ हिटलर की तरह गुजरात के मुख्यमंत्री का भी अपने राज्य में एकछत्र निरंकुश राज कायम हो जाएगा .अहमदाबाद में जारी के बयान में मानवाधिकार संस्था,दर्शन के निदेशक हीरेन गाँधी ने कहा है कि 'गुजरात सरकार और उसकी पुलिस विरोध की हर आवाज़ को कुचल देने के उद्देश्य से मानवाधिकार संगठनो , दलितों के हितों की रक्षा के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं और सिविल सोसाइटी के अन्य कार्यकर्ताओं को नक्सलवादी बताकर पकड़ रही है ' लेकिन विरोध के स्वर भी अभी दबने वाले नहीं है . शहर के एक मोहल्ले गोमतीपुर में पुलिस का सबसे ज़्यादा आतंक है, . वहां के लोगों ने तय किया है कि अपने घरों के सामने बोर्ड लगा देंगें जिसमें लिखा होगा कि उस घर में रहने वाले लोग नक्सलवादी हैं और पुलिस के सामने ऐसी हालात पैदा की जायेगीं कि वे लोगों को गिरफ्तार करें . ज़ाहिर है इस तरीके से जेलों में ज्यादा से ज्यादा लोग बंद होंगें और मोदी की दमनकारी नीतियों को राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बनाया जाएगा.वैसे भी अगर सभ्य समाज के लोग बर्बरता के खिलाफ लामबंद नहीं हुए तो बहुत देर हो चुकी होगी और कम से कम गुजरात में तो हिटलरी जनतंत्र का स्वाद जनता को चखना ही पड़ जाएगा. वैसे गुजरात में अब मुसलमानों में कोई अशांति नहीं है , सब अमन चैन से हैं . गुजरात के कई मुसलमानों से सूरत और वड़ोदरा में बात करने का मौक़ा लगा . सब ने बताया कि अब बिलकुल शान्ति है , कहीं किसी तरह के दंगे की कोई आशंका नहीं है . उन लोगों का कहना था कि शान्ति के माहौल में कारोबार भी ठीक तरह से होता है और आर्थिक सुरक्षा के बाद ही बाकी सुरक्षा आती है.बड़ा अच्छा लगा कि चलो १० साल बाद गुजरात में ऐसी शान्ति आई है .लेकिन कुछ देर बाद पता चला कि जो कुछ मैं सुन रहा था वह सच्चाई नहीं थी. वही लोग जो ग्रुप में अच्छी अच्छी बातें कर रहे थे , जब अलग से मिले तो बताया कि हालात बहुत खराब हैं . गुजरात में मुसलमान का जिंदा रहना उतना ही मुश्किल है जितना कि पाकिस्तान में हिन्दू का . गुजरात के शहरों के ज़्यादातर मुहल्लों में पुलिस ने कुछ मुसलमानों को मुखबिर बना रखा है , पता नहीं चलता कि कौन मुखबिर है और कौन नहीं है . अगर पुलिस या सरकार के खिलाफ कहीं कुछ कह दिया गया तो अगले ही दिन पुलिस का अत्याचार शुरू हो जाता है. मोदी के इस आतंक को देख कर समझ में आया कि अपने राजनीतिक पूर्वजों की लाइन को कितनी खूबी से वे लागू कर रहे हैं . लेकिन यह सफलता उन्हें एक दिन में नहीं मिली . इसके लिए वे पिछले दस वर्षों से काम कर रहे हैं . गोधरा में हुए ट्रेन हादसे के बहाने मुसलमानों को हलाल करना इसी रणनीति का हिस्सा था . उसके बाद मुसलमानों को फर्जी इनकाउंटर में मारा गया, इशरत जहां और शोहराबुद्दीन की हत्या इस योजना का उदाहरण है . उसके बाद मुस्लिम बस्तियों में उन लड़कों को पकड़ लिया जाता था जिनके ऊपर कभी कोई मामूली आपराधिक मामला दर्ज किया गया हो . पाकेटमारी, दफा १५१ , चोरी आदि अपराधों के रिकार्ड वाले लोगों को पुलिस वाले पकड़ कर ले जाते थे , उन्हें गिरफ्तार नहीं दिखाते थे, किसी प्राइवेट फार्म हाउस में ले जा कर प्रताड़ित करते थे और अपंग बनाकर उनके मुहल्लों में छोड़ देते थे . पड़ोसियों में दहशत फैल जाती थी और मुसलमानों को चुप रहने के लिए बहाना मिल जाता था .लोग कहते थे कि हमारा बच्चा तो कभी किसी केस में पकड़ा नहीं गया इसलिए उसे कोई ख़तरा नहीं था . ज़ाहिर है इन लोगों ने अपने पड़ोसियों की मदद नहीं की ..इसके बाद पुलिस ने अपने खेल का नया चरण शुरू किया . इस चरण में मुस्लिम मुहल्लों से उन लड़कों को पकड़ा जाता था जिनके खिलाफ कभी कोई मामला न दर्ज किया गया हो . उनको भी उसी तरह से प्रताड़ित करके छोड़ दिया जाता था . इस अभियान की सफलता के बाद राज्य के मुसलमानों में पूरी तरह से दहशत पैदा की जा सकी. और अब गुजरात का कोई मुसलमान मोदी या उनकी सरकार के खिलाफ नहीं बोलता ..डर के मारे सभी नरेन्द्र मोदी की जय जयकार कर रहे हैं. अब राज्य में विरोध का स्वर कहीं नहीं है . कांग्रेस नाम की पार्टी के लोग पहले से ही निष्क्रिय हैं . वैसे उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती क्योंकि विपक्ष का अभिनय करने के लिए उनकी ज़रूरत है .यह मानवाधिकार संगठन वाले आज के मोदी के लिए एक मामूली चुनौती हैं और अब उनको भी नक्सलवादी बताकर दुरुस्त कर दिया जाएगा. फिर मोदी को किसी से कोई ख़तरा नहीं रह जाएगा. हमारी राजनीति और लोकशाही के लिए यह बहुत ही खतरनाक संकेत हैं क्योंकि मोदी की मौजूदा पार्टी बी जे पी ने अपने बाकी मुख्यमंत्रियों को भी सलाह दी है कि नरेन्द्र मोदी की तरह ही राज काज चलाना उनके हित में होगा &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-3323115524022559541?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/3323115524022559541/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=3323115524022559541' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/3323115524022559541'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/3323115524022559541'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2010/06/blog-post_07.html' title='गुजरात में मुसलमान का जिंदा रहना उतना ही मुश्किल है जितना कि पाकिस्तान में हिन्दू का'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-410917284513408069</id><published>2010-06-04T05:27:00.000-07:00</published><updated>2010-06-04T05:29:15.602-07:00</updated><title type='text'>राजनीति का घिनोना चेहरा दिखाती है 'राजनीति'</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सलीम अख्तर सिद्दीकी&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;सत्ता हासिल करने के लिए क्या कुछ नहीं होता, इसे देखने के लिए प्रकाश झा की 'राजनीति' जरुर देखनी चाहिए। सत्ता हासिल करने के लिए घात-प्रतिघात और विश्वासघात का घिनौना खेल कैसे खेला जाता है, इसकी बानगी 'राजनीति' में देखी जा सकती है। फिल्म यह भी बताती है कि कैसे परिवार पर आधारित राजनैतिक दल केवल परिवार के बपौती बनकर रह जाते हैं। परिवार के लोग सत्ता हथियाने के लिए एक दूसरे का खून बहाने से भी गुरेज नहीं करते। फिल्म को रोचक बनाने के लिए फिल्म में कुछ घटनाएं ऐसी दिखयी गयी हैं, जिन्हें दिल और दिमाग मानने के लिए तैयार नहीं होता। लेकिन प्रकाश झा यह बताने में कामयाब रहे हैं कि राजनीतिज्ञों के दिलों में आम आदमी केवल वोट अलावा कुछ नहीं है। सत्ता के आगे भावनाएं गौण हो जाती हैं। तभी तो एक अरबपति बाप पार्टी को चुनाव लड़ने के लिए पैसा देने के एवज में अपनी लड़की की शादी उस लड़के से करता है, जिसे प्रदेश का भावी मुख्यमंत्री माना जाता है। लड़की किसे अपना जीवन साथी बनाना चाहती है, बाप के लिए इसकी अहमियत नहीं है। फिल्म यह भी बताती है कि टिकट ही नहीं बिकते है, बल्कि चुनाव जीत ती दिखने वाली पार्टी से गठबंधन करने वाली पार्टी को कुछ सीटें लेने के लिए भी पैसा देना पड़ता है। फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि हालात उस आदमी को सत्ता के शीर्ष पर ले जाते हैं, जिसने कभी राजनीति में आने की सोची भी नहीं थी। यहां प्रकाश झा ने उन हालात को क्रियेट किया, जिन हालात के तहत इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बन गए थे। &lt;br /&gt;फिल्म के प्रोमो में दिखाया जा रहा वह सीन, जिसमें कैटरीना कैफ सोनिया गांधी स्टाइल में भाषण देती है, फिल्म के अंत में केवल दो मिनट का है। यह अच्छी बात रही कि फिल्म में गाने नहीं है, वरना फिल्म की गति में बाधा आती। इसमे कोई शक नहीं कि फिल्म के प्रत्येक फ्रेम में प्रकाश झा की मेहनत झलकती है। बात अगर करें फिल्म के कलाकारों की तो इतना ही कहा जा सकता है कि नसीरुद्दीन शाह, मनोज वाजपेयी, नाना पाटेकर, अर्जुन रामपाल, अजय देवगन जैसे मंझे हुए कलाकारों ने फिल्म को शानदार बना दिया है। प्रकाश झा का निर्देशन कमाल का है। कैटरीना कैफ दिन प्रतिदिन अदाकारी के नए आयाम बना रही हैं। रणबीर कपूर ने भी अपने किरदार के साथ न्याय किया है। सिर्फ एक बात की खलिश आखिर तक रही। नसीरुद्दीन शाह को बहुत छोटा से किरदार दिया गया है, वह भी फिल्म की शुरुआत में। हॉल में देर से पहुंचने वाले दर्शकों को तो उनका रोल देखने को ही नहीं मिला। दर्शक फिल्म के अंत तक नसीरुद्दीन शाह की रि-एन्ट्री का इंतजार ही करते रहे।&lt;br /&gt;जब मैं अपने मित्र धर्मवीर कटोच के साथ फिल्म देखने निकला था तो मैंने कहा था कि देख लेना हॉल में बीस-पच्चीस से ज्यादा दर्शक नहीं होगे। लेकिन मैं गलत साबित हुआ। पहला शो ही हाउसफुल गया। और जब दर्शक फिल्म देखकर हॉल से बाहर निकले तो सबके चेहरे बता रहे थे कि उनके पैसे जाया नहीं हुए। एक खास बात और थी, दर्शकों में उनकी संख्या ज्यादा थी, जो परिपक्व थे। मल्टीप्लेक्सों में हाथ में हाथ डाले फिल्म देखने जाने वाले लड़के-लड़कियों की संख्या नगण्य थी। इससे पता चलता है कि उन लोगों की संख्या भी बहुत ज्यादा है, जो गम्भीर फिल्म देखना पसंद करते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-410917284513408069?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/410917284513408069/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=410917284513408069' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/410917284513408069'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/410917284513408069'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='राजनीति का घिनोना चेहरा दिखाती है &apos;राजनीति&apos;'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-8987937096164394175</id><published>2010-05-25T23:02:00.000-07:00</published><updated>2010-05-25T23:04:31.604-07:00</updated><title type='text'>26/11 और मलियाना-हाशिमपुरा नरसंहार का अन्तर</title><content type='html'>&lt;strong&gt;सलीम अख्तर सिद्दीकी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;26/11 यानि मुंबई पर देश का सबसे बड़ा आतंकी हमला। एक आतंकवादी अजमल कसाब जिन्दा बचा था। मुकदमा चला और डेढ़ साल के भीतर ही उसे सजा-ए-मौत सुना दी गयी। कसाब सजा-ए-मौत का ही हकदार था। संसद पर हुए हमले के आरोपी अफजल गुरु को भी फांसी लगने का इंतजार किया जा रहा है। मासूम और बेकसूरों की जान लेने वालों को फांसी की सजा भी कम है। लेकिन अफसोस इस बात का है कि इससे बड़ी सजा कोई नहीं है। यदि दूसरे देश के कुछ आतंकवादी हमारे देश में धुसकर लोगों को गोलियों से भून दें या बमों से उड़ा दें तो निःसंदेह देश के बच्चे-बच्चे को उसका अफसोस ही नहीं होता, बल्कि आतंकवादियों के खिलाफ दिलों में नफरत भी घर कर जाती है। ऐसा होना स्वाभाविक है। आतंकवादियों का मकसद ही लोगों की जान लेकर दहशत फैलाना होता है। लेकिन जब अपने ही देश के सुरक्षा बल, जिनकी जिम्मेदारी नागरिकों को सुरक्षा देने की होती है, स्वयं ही अपने ही देश के नागरिकों को गोलियों से भून दें, उसे किस आतंकवाद की श्रेणी में रखा जाना चाहिए ? उस पर भी मारने वालों का बचाव और मरने वालों को इंसाफ न देना किस नीयत को दर्शाता है ? यूं तो देश में ऐसे बहुत से नरसंहार हुए हैं, जिनमें सीधे-सीधे सरकारों का हाथ रहा है, लेकिन 22 मई और 23 मई 1987 को हुए हाशिमपुरा और मलियाना नरसंहार ऐसे हैं, जो आजाद भारत की बदतरीन मिसालें हैं और देश के नाम पर कलंक की तरह हैं। यह कलंक और तब बढ़ जाता है, जब नरसंहार के चौबीस साल भी  पीड़ितों को न्याय तो दूर, दोषियों को बचाने की कोशिश की जाती है।&lt;br /&gt;मई 1987 को मेरठ में एक दिन के अंतराल पर दो ऐसे नरसंहार हुए थे, जिनकी गूंज आज भी सुनाई देती है।  22 मई 1987 मेरठ के हाशिमपुरा से उत्तर प्रदेश के प्रांतीय सशस्त्र बल ( पीएसी ) ने 44 मुसलमान नौजवानों को अपने ट्रकों में भरा और उन्हें मुराद नगर (गाजियाबाद) की गंग नहर पर ले जाकर गोलियों से भूना और लाशों को नहर में बहा दिया था। क्या यह नरसंहार ऐसा ही नहीं था, जैसे मुंबई में पाकिस्तानी आतंकवादियों ने किया था ? सवाल यह है कसाब को क्यों डेढ़ साल में फांसी की सजा दे दी गयी और हाशिमपुरा और मलियाना नरसंहार के दोषी क्यों आजाद घूम रहे हैं ? सवाल यह है कि 26/11 और मलियाना-हाशिमपुरा के नरसंहार में क्या अन्तर है ? क्या मलियाना और हाशिमपुरा नरसंहार में मरने वाले भारतीय नागरिक नहीं थे ?&lt;br /&gt;22 मई को हाशिमपुरा में क्या हो गया था इसका पता बाकी मेरठ को नहीं था। 23 मई 1987 को पीएसी ने एक और ऐसे नरसंहार को अंजाम दिया, जो क्रूरता की मिसाल बन गयी। मेरठ से लगभग पांच किलाोमीटरा दूर है मलियाना। लगभग दस हजार की इस आबादी में मुसलमानों की संख्या दस प्रतिशत भी नहीं है। मेरठ शहर में दंगे होते रहते थे, लेकिन मलियाना साम्प्रदायिक हिंसा में कभी नहीं झुलसा था। भले ही 18/19 मई की रात से पूरे मेरठ में भयानक दंगा भड़का हूआ था, लेकिन मलियाना शांत था और यहां पर कफ्ूर्य भी नहीं लगाया गया था। यहां कभी हिन्दू-मुस्लिम दंगा तो दूर तनाव तक नहीं हूआ था। हिन्दू और मुसलमान साथ-साथ सुख चैन से रहते आ रहे थे। लेकिन कुछ साम्प्रदायिक शक्तियों, पुलिस और पीएसी ने मलियाना को वो जख्म दिए, जिसकी पीड़ा उन्हें आज भी होती है। पूरे परिवार खत्म कर दिए गए थे। उस मंजर को याद करके यहां के लोग आज भी कांप उठते हैं। लगभग दोपहर बारह बजे से पुलिस और पीएसी ने मलियाना की मुस्लिम आबादी को चारों ओर से घेरना शुरु किया। यह घेरे बंदी लगभग ढाई बजे खत्म हुई। घेरेबंदी कुछ इस तरह की जा रही थी मानो दुष्मन देष के सैनिकों पर हमला करने के लिए उनके अड्डों को घेर रही हो। पूरे इलाके को घेरने के बाद कुछ पुलिस और पीएसी वालों ने घरों के दरवाजों पर दस्तक देनी शुरु कर दी। दरवाजा नहीं खुलने पर उन्हें तोड़ दिया गया। घरों में लूट और मारपीट शुरु कर दी नौजवानों को पकड़कर एक खाली पड़े प्लाट में लाकर बुरी तरह से मारा-पीट कर ट्रकों में फेंकना शुरु कर दिया गया। दरअसल, पीएसी हाशिमपुरा की तर्ज पर ही मलियाना के मुस्लिम नौजवानों को कहीं और ले जाकर मारने की योजना पर काम रहे थे, लेकिन पीएसी की फायरिंग से इतने ज्यादा लोग मरे और घायल हुए थे कि पीएसी की योजना फेल हो गयी थी। पुलिस और पीएसी लगभग ढाई घंटे तक फायरिंग करती रही। इस ढाई घंटे की फायरिंग में में 73 लोग मारे गए थे।&lt;br /&gt;23 साल बाद इस 23 मई को मलियाना के लोगों ने मरने वालों की याद में एक कार्यक्रम किया था। सब के पास सुनाने के लिए कुछ न कुछ था। मौहम्मद यामीन के वालिद अकबर को दंगाईयों ने पुलिस और पीएसी के सामने ही मार डाला था। नवाबुद्दीन ने उस हादसे में अपने वालिद अब्दुल रशीद और वालिदा इदो को पुलिस और पीएसी के संरक्षण में अपने सामने मरते देखा। आला पुलिस अधिकारियों के सामने ही दंगाईयों ने महमूद के परिवार के 6 लोगों को जिन्दा जला दिया। शकील सैफी के वालिद यामीन सैफी की लाश भी नहीं मिली थी। प्रशासन यामीन सैफी को 'लापता' की श्रेणी में रखता है। आज भी उस मंजर को याद करके लोगों की आंखें नम हो जाती हैं। जब कभी उस हादसे का जिक्र होता है तो लोग देर-देर तक अपनी बदकिस्मती की कहानी सुनाते रहते है। मलियाना के लोगों को राजनैतिक दलों से भी बहुत शिकायतें हैं। उनका कहना है कि सभी राजनैतिक दलों ने मलियाना कांड पर सियासत की, लेकिन इस बात की किसी भी दल ने कोशिश् नहीं की कि मलियाना नरसंहार के लिए गठित जीएल श्रीवास्तव जांच आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक करके दोषियों को सजा दिलाए। मलियाना के लोगों का यह भी लगता है कि सरकार ने मृतक आश्रितों को मुआवजा राशि देने में भी भेदभाव से काम लिया। उनका कहना है कि उन्हें केवल 40-40 हजार रुपयों का मुआवजा दिया गया था, जो अपर्याप्त था। पीड़ितों की मांग है कि उन्हें भी उसी तरह का राहत पैकेज दिया जाए, जिस तरह से सिखों को दिया गया है।  विपक्ष और मीडिया के तीखे तेचरों के चलते इस नरसंहार एक सदस्यीय जांच आयोग से जांच कराने का ऐलान किया गया था। आयोग के अध्यक्ष जीएल श्रीवास्तव ने एक साल में ही जांच पूरी करके सरकार को रिपोर्ट सौप दी थी। लेकिन इस रिपोर्ट का हश्र भी ऐसा ही हूआ, जैसा कि अन्य आयोगों की रिपोर्टां का अब तक होता आया है। कहा जाता है कि जांच आयोग की रिपोर्ट में पुलिस और पीएसी को दोषी ठहराया गया है।&lt;br /&gt;इस अति चर्चित नरसंहार सुनवाई यूं तो फास्ट ट्रेक अदालत में चल रही है, लेकिन अभी भी उसकी चाल बेहद सुस्त है। फास्ट ट्रेक अदालतों का गठन ही इसलिए किया गया था ताकि मलियाना जैसे जघन्य मामलों की सुनवाई जल्दी से जल्दी हो सके। मुख्य गवाहों को धमकाया जा रहा है। बयान बदलने के लिए पैसों का लालच दिया जा रहा है। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;मलियाना और हाशिमपुरा नरसंहार पर वरिष्ठ पत्रकार हरि शंकर जोशी की टिप्पणी&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मैं भी एक ऐसा ही इंसान हूं, जिसने मेरठ के दंगों के सच को भुगता है। दिनमान के रिपोर्टर जसवीर उर्फ जस्सी जो दुर्भाग्य से इस दुनिया में नहीं हैं और मैं सबसे पहले मलियाना पहुंचे थे। जहां पीएसी ने अंधाधुंध गोलियां चलाकर ग्रामीणों का नरसंहार किया था। रात ग्यारह बजे वहां से लौटकर दंगे के इस सच को जस्सी ने बीबीसी में फ्लैष कराया था। मैने उसे अमर उजाला में लिखा था। लेकिन खबर प्रकाषन के लिए तमाम जद्दोजहद के बाद तभी जा सकी थी, जब बीबीसी ने उसे प्रसारित कर दिया था। उसके बाद कुछ संगठनों ने अमर उजाला की प्रतियां जलाईं थीं। पत्रकारों को भुगतने की धमकी दी थी। हाषिमपुरा तो पीएसी की इंतहा थी। मैं जानता हं कि यदि विभूति गाजियाबाद के एसएसपी न होते और 'चौथी दुनिया' न होता तो हाषिमपुरा का नंगा सच कभी सामने न आता। मैं दंगे के दौरान हाषिमपुरा की घटना का काफी हद तक साक्षी रहा हूं। मैने नहर पर नरसंहार की घटना से पहले हाषिमपुरा की फायरिंग भी देखी है, जब एक तरफ से पुलिस गोलियां चला रही थी तो दूसरी तरफ से दंगाई छतों पर चढ़कर बराबर का मुकाबला कर रहे थे, लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि आप चंद सिरफिरे बदमाषों के लिए सामुहिक नरसंहार कर दो। मुझे याद है कि वीरेंद्र सेंगर किस तरह जान हथेली पर रखकर काम कर रहे थे। मैं जिस गली में घुसता वहां वीरेंद्र मिल जाते और पूछते तुम्हें पुलिस व पीएसी नहीं रोकती। लेकिन अफसोस कि आज तक हाषिमपुरा को इंसाफ नहीं मिला और न उन दंगाईयों को सजा जिन्होंने दंगे में निर्दोषों का खून बहाया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-8987937096164394175?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/8987937096164394175/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=8987937096164394175' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/8987937096164394175'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/8987937096164394175'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2010/05/2611.html' title='26/11 और मलियाना-हाशिमपुरा नरसंहार का अन्तर'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-2209819989568182598</id><published>2010-05-10T01:14:00.000-07:00</published><updated>2010-05-10T01:15:56.169-07:00</updated><title type='text'>स्वामी रामदेव स्विस बैंकों से पैसा कैसे वापस लाएंगे ?</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सलीम अख्तर सिद्दीकी &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;            जब कभी किसी आदमी के किसी वजह से कुछ हजार या कुछ लाख प्रशंसक बन जाते हैं तो उसे यह गलतफहमी हो जाती है कि वह देश को चलाने में भी सक्षम है और यदि वह राजनीति में आएगा तो देश की जनता उसे सर-माथे पर बैठाकर देश की बागडोर सौंप देगी। इस प्रकार की गलतफहमी कई लोगों को हो चुकी है। लेकिन जनता ने उन्हें कबूल नहीं किया। अब योग के सहारे टीवी पर दिखाई देने लगे स्वामी रामदेव को शायद कुछ लोगों ने समझा दिया है कि देश की जनता बहुत बेसब्री से इस बात का इंतजार कर रही है कि कब स्वामी रामदेव राजनीति में पदार्पण करें और उन्हें देश की बागडोर सौंप दें। तभी शायद स्वामी रामदेव यह कहते हैं कि 'अब मेरे पास इतनी शक्ति है कि मैं सरकार को उखाड़ सकता हूं।' स्वामी देव की इस बात से उनका बड़बोलापन ही झलकता है। उन्होंने 'भारत स्वाभिमान ट्रस्ट' का गठन कर लिया है। इस ट्रस्ट की राजनैतिक शाखा 'भारत स्वाभिमान जवान' बनायी है। वह 2014 को होने वाले लोकसभा चुनाव में सभी 543 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की योजना पर अमल कर रहे हैं। जब चुनाव लड़ा जाएगा तो जनता को भरमाने के लिए कोई मुद्दा भी चाहिए। स्वामी रामदेव देश की जनता को यह ख्वाब दिखा रहे हैं कि वह स्विस बैंकों में देश का जमा 300 लाख करोड़ रुपया भारत में लाएंगे। देश का पैसा देश में वापस आए यह अच्छी बात है। लेकिन क्या स्विस बैंकों से पैसा वापस लेना इतना ही आसान है, जैसे एटीएम से पैसा निकाल लेना ? क्या स्विस बैंकों से भारत सरकार या किसी भी देश की सरकार यह कहेगी कि हमारे भ्रष्ट लोगों का जो पैसा आपके यहां जमा है, उसे वापस कर दो और स्विस बैंक वापस कर देगा ? यदि स्विस बैंकों से पैसा वापस लाना इतना ही आसान होता तो भ्रष्टाचारी लोग अपना पैसा स्विस बैंक में ही क्यों रखते ? स्विस बैंकों से पैसा वापस लाना तो छोड़िए, स्वामी रामदेव यही पता लगा लें कि इन बैंकों भारत के कितने लोगों का और कितना काला पैसा जमा है ? स्वामी रामदेव को देश की जनता को यह तो हर हाल में बताना ही चाहिए कि वह स्विस बैंकों से पैसे को वापस कैसे लाएंगे ? ऐसा करने के लिए उनके पास क्या रणनीति है ?&lt;br /&gt;            स्विस बैंकों से पैसा वापस लाने की बात करने वाले स्वामी रामदेव खुद इंग्लैंड में एक आईलेंड और अमेरिका के ह्‌यूस्टन शहर में लगभग तीन सौ एकड़ जमीन खरीदते हैं। विदशों में सम्पत्ति खरीदना क्या भारत के पैसे को विदेशों में ले जाना नहीं है ? स्वामी रामदेव को देश की जनता को भी बताना चाहिए कि उन्होंने कुछ ही सालों में साठ-सत्तर हजार करोड़ का विशाल सामा्रज्य कैसे खड़ा कर लिया ? यदि अतीत की बात करें तो साइकिल पर चलने वाले स्वामी रामदेव हरिद्वार में गुरु शंकर देव के शिष्य थे। उनके वह गुरु आजकल कहां हैं, क्या कर रहे हैं, इसका किसी को पता नहीं है। खुद स्वामी रामदेव भी उनके बारे में कुछ नहीं कहते हैं। कहा जाता है कि लोगों की नजरों से दूर होने से पहले गुरु शंकर देव बहुत ज्यादा व्यथित थे।&lt;br /&gt;            स्वामी रामदेव की बातों से पता चलता है कि उन्होंने वह सब गुर सीख लिए हैं, जो भारत की मौजूदा राजनीति करने के लिए बहुत जरुरी है। मसलन, देश के सबसे बड़े वोट बैंक समझे जाने वाले मुसलमानों पर उन्होंने डोरे डालने शुरु कर दिए हैं। इस बात को वह भी समझते हैं कि बगैर मुसलमानों को साथ लिए देश की सत्ता पर काबिज नहीं हुआ जा सकता है। तभी वो वह देवबंद में होने वाले जमीअत उलेमा हिन्द के अधिवेशन में हिस्सा लेते हैं। वह यह भी जानते हैं कि भारत का मुसलमान आरएसएस से दूरी बना कर चलता है। इसलिए उन्होंने अभी से इस प्रकार की बातें करनी शुरु कर दी हैं, जिससे यह आभास हो कि वे आरएसएस को पसंद नहीं करते हैं। एक पाक्षिक पत्रिका से साक्षात्कार में वे कहते हैं-'भाजपा के साथ दिक्कत यह है कि भाजपा युवाओं को हिन्दुत्व का विचार नहीं समझा पा रही है। युवा हिन्दुत्व का अर्थ सिर्फ राम मंदिर समझते हैं।' आरएसएस के बारे में वह कहते हैं-'आरएसएस कारसेवकों का हिन्दुत्व के प्रति अपना विचार है लेकिन वे भी आम आदमी को इसका अर्थ नहीं समझा पा रहे हैं।' हालांकि स्वामी रामदेव का हिन्दुत्व कौनसा है, इसको वह नहीं बताते।&lt;br /&gt;            राजनीति का सबसे बड़ा गुर भी स्वामी रामदेव ने सीखा है। उन्होंने घोषणा की है कि वह न तो चुनाव लड़ेंगे न ही प्रधानमंत्री का पद लेंगे। वह इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि यदि उनकी पार्टी चुना जीत गयी तो देश की जनता उन्हें जबरदस्ती गद्दी पर बैठा देगी। और स्वामी रामदेव किसी सूरत में देश की जनता का आग्रह नहीं ठुकरा पाएंगे। ऐसा भी नहीं है कि स्वामी रामदेव अकेले ही इतना बड़ा दांव अकेले ही खेलने निकले हैं। दरअसल, योग की वजह से बड़ी-बड़ी हस्तियां उनके साथ नजर आने लगी हैं। शायद इन्हीं हस्तियों ने स्वामी रामदेव को चुनाव लड़ने के लिए तैयार किया है। यह भी हो सकता है कि स्वामी रामदेव को कुछ लोग 'मोहरा' बनाकर अपना हित साधने का खेल, खेल रहे हों।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-2209819989568182598?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/2209819989568182598/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=2209819989568182598' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/2209819989568182598'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/2209819989568182598'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2010/05/blog-post_10.html' title='स्वामी रामदेव स्विस बैंकों से पैसा कैसे वापस लाएंगे ?'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-2106112526296768160</id><published>2010-05-06T07:28:00.000-07:00</published><updated>2010-05-06T07:31:30.538-07:00</updated><title type='text'>कोडरमा की “निरुपमा” और मेरठ की “श्रुति” के सबक</title><content type='html'>♦ &lt;strong&gt;सलीम अख्तर सिद्दीकी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;गैर जाति के लड़के के साथ प्यार की पींगे बढ़ाना निरुपमा का गुनाह बन गया। वो प्रेग्नेंट भी थी। किसी लड़की को मारने के लिए ये कारण पर्याप्त होते हैं, उनके लिए जो पढ़े-लिखे होने का दम भर भरने के बावजूद दकियानूसी विचारधारा के होते हैं। निरुपमा का परिवार ऐसा ही था। सच तो यह है कि हम सब के अंदर कहीं न कहीं जातिवाद और धर्म इतना गहरे पैठ चुका है कि उससे बाहर आना नहीं चाहते। जो बाहर आना चाहता है, उसका हश्र निरुपमा जैसा होता है। निरुपमा के मां-बाप जैसे लोग कहने को तो आधुनिक और प्रगातिशील बनते हैं, लेकिन इनकी विचारधारा तालिबान से ज्यादा बुरी है। लेकिन यही लोग तालिबान को दकियानूसी बताने में हिचकते नहीं हैं। ये लोग जीवन शैली तो पाश्चात्य अपनाते हैं, लेकिन प्रेम और विवाह के मामले में घोर परंपरावादी और पक्के भारतीय संस्कृति के रखवाले बन जाते हैं।&lt;br /&gt;यह इक्कसवीं सदी चल रही है। इस सदी में वह सब कुछ हो रहा है, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी। मीडिया ने समाज को पचास साल आगे कर दिया है। भारत में मल्टीनेशनल कंपनियों की बाढ़ आयी हुई है। इन मल्टीनेशनल कंपनियों में सभी जातियों और धर्मों की लड़कियां और लड़के कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे हैं। सहशिक्षा ले रहे हैं। साथ-साथ कोचिंग कर रहे हैं। इस बीच अंतरधार्मिक, अंतरजातीय और एक गोत्र के होते हुए भी प्रेम होना अस्वाभाविक नहीं है। प्रेम होगा तो शादियां भी होंगी। समाज और परिवार से बगावत करके भी होंगी। अब कोई लड़की किसी गैर जाति लड़के से प्रेम कर बैठे तो उसकी जान ले लेना तालिबानी मानसिकता ही कही जाएगी।&lt;br /&gt;याद रखिए संकीर्णता और आधुनिकता एक साथ नहीं चल सकतीं। आजकल चल यह रहा है कि आधुनिकता की होड़ में पहले तो लड़कियों को पूरी आजादी दी जाती है। लड़कियों से यह नहीं पूछा जाता कि उन्होंने भारतीय लिबास को छोड़कर टाइट जींस और स्लीवलेस टॉप क्यों पहनना शुरू कर दिया है। आप ऐसे लिबास पहनने वाली किसी लड़की के मां-बाप से यह कह कर देखिए कि आपकी लड़की का यह लिबास ठीक नहीं है तो वे आपको एकदम से रूढ़ीवादी और दकियानूसी विचारधारा का ठहरा देंगे। मां-बाप कभी अपनी बेटी का मोबाइल भी चैक नहीं करते कि वह घंटों-घंटों किससे बतियाती रहती है। उसके पास महंगे कपड़े और गैजट कहां से आते हैं। जब इन्हीं मां-बाप को एक दिन पता चलता है कि उनकी लड़की किसी से प्रेम और वह भी दूसरे धर्म या जाति के लड़के से करती है तो उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसकती नजर आती है। उन्हें फौरन ही अपनी धार्मिक और जातिगत पहचान याद आ जाती है। भारतीय परंपराओं की दुहाई देने लगते है। जैसे निरुपमा का मामले में हुआ।&lt;br /&gt;निरुपमा के मां-बाप उसको आला तालीम लेने दिल्ली भेजते हैं। निरुपमा एक प्रतिष्ठित अखबार में नौकरी करती है। लेकिन उसको किसी गैर जातीय लड़के से प्रेम करने की सजा इसी प्रकार दी जाती है, जैसे अफगानिस्तान में तालिबान देते हैं। उसे मार दिया जाता है।&lt;br /&gt;इंटरनेट ने दुनिया को छोटा किया है। सोशल नेटवर्किंग के जरिये भी प्यार की पींगें बढ़ रही है। कल का वाकया है। मेरठ के एक प्रतिष्ठित (भारत में पैसों वालों को ही प्रतिष्ठित कहा जाता है) की एक लड़की श्रुति लखनऊ में आर्किटेक्ट का कोर्स कर रही थी। उसका आखिरी साल था। ऑरकुट के जरिये इंदौर के एक लड़के से प्यार की पींगें बढ़ीं। लड़का गाहे-बगाहे लखनऊ आने लगा। कल दोनों में किसी बात को लेकर नोंक-झोंक हुई। लड़की ने मॉल की चौथी मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। लड़के को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। श्रुति के मां-बाप को क्या पता था कि उनकी लड़की पढ़ाई के साथ और कौन सी ‘पढ़ाई’ कर रही है। उन्हें तो उसकी दूसरी ‘पढ़ाई’ का पता उसकी मौत की खबर के साथ ही लगा। जानते हैं श्रुति का प्रेमी कितना पढ़ा-लिखा था। मात्र बारहवीं फेल। बेराजगार।&lt;br /&gt;यहां यह सब कहने का मतलब यह कतई नहीं है कि लड़कियों को शिक्षा या नौकरी के बाहर भेजने पर पाबंदी आयद कर दी जाए। उन्हें कैद करके रखा जाए। कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि जमाना तेजी के साथ बदल रहा है। लड़कियां आत्मनिर्भर हुई हैं तो उन्हें अपने अधिकार भी पता चले हैं। उदारीकरण के इस दौर में प्रेम और शादी के मामले में युवा उदार हुए हैं। लेकिन मां-बाप और भाई (भाई किसी दूसरे की बहन के साथ डेटिंग करने में बहुत उदार होते हैं) उदार होने को तैयार नहीं हैं। कितनी ही निरुपमाओं या बबलियों को मार दीजिए – युवाओं में परिवर्तन की इस आंधी को नहीं रोका जा सकता है। वक्त बदल रहा है। सभी को वक्त के साथ बदलना ही पड़ेगा। वरना फिर मान लीजिए कि अफगानिस्तान में तालिबान और भारत में खाप पंचायतें जो कुछ भी कर रही हैं, ठीक कर रही हैं। दरअसल, भारत का समाज संकीर्णता और आधुनिकता के बीच झूल रहा है। वह यह ही तय नहीं कर पा रहा है कि उसे किधर जाना है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-2106112526296768160?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/2106112526296768160/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=2106112526296768160' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/2106112526296768160'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/2106112526296768160'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2010/05/blog-post_06.html' title='कोडरमा की “निरुपमा” और मेरठ की “श्रुति” के सबक'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-1742465832687018056</id><published>2010-05-03T04:29:00.000-07:00</published><updated>2010-05-03T04:35:35.386-07:00</updated><title type='text'>मुसलमानों के फोन सुनती हैं खुफिया एजेंसियां</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S960lJMNHjI/AAAAAAAAALU/xZuS-newWVg/s1600/phone-tapping.gif"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5467005547889630770" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 222px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S960lJMNHjI/AAAAAAAAALU/xZuS-newWVg/s320/phone-tapping.gif" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सलीम अख्तर सिद्दीकी&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मुसलमानों के लिए आंसू बहाने वाली सरकार की खुफिया एजेंसियों को मुसलमानों के चरित्र पर संदेह है। शायद इसीलिए वे मुसलमानों पर नजर रखने के लिए उनके फोन सुनती है, वह भी बगैर किसी इजाजत के। इस काम के लिए वह भारी भरकम रकम भी खर्च करती है। पिछले दिनों कुछ सत्ताधारी और विपक्षी नेताओं के फोन टेप होने की खबरें आयीं थी। इन खबरों पर खूब हंगामा हुआ। इसे लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन बताया गया। लेकिन सच किसी ने नहीं बताया। सच यह है कि फोन टेप करने के सिस्टम मुस्लिम बाहुल्य शहरों में लगाने के लिए खरीदे गए थे। यह बात नहीं भी खुलती अगर कुछ नेताओं के फोन टेप होने की बात सामने नहीं आई होती। दरअसल, कारगिल युद्ध के बाद एक खुफिया संस्था 'नेशनल टैक्निकल रिसर्च ऑर्गनाईजेशन' (एनटीआरओ) 14 अप्रैल 2006 को वजूद में लायी गयी थी। इस खुफिया संस्था का मुख्य कार्य खुफिया जानकारी जुटाने के लिए तकनीकी सहायता करना है। यह खुफिया संस्था ऑफ-द-एयर जीएसएम मॉनीटरिंग उपकरण के जरिए फोन टेप करती है। यह उपरण दो किलोमीटर के दायरे में किसी भी मोबाइल फोन को टेप कर सकता है। इस उपकरण का कहीं भी प्रयोग किया जा सकता है। इस अनैतिक फोन टेप प्रणाली की खूबी यह है कि इसमें किसी की इजाजत लेने की जरुरत नहीं पड़ती। इस प्रणाली से एक्सचेन्ज को दरकिनार करके मोबाइल और टॉवर के बीच के सिगनल पकड़ कर फोन टेपिंग की जा सकती है। 7 करोड़ रुपए की लागत वाला यह सिस्टम केवल आवाज के नमून के आधार वार्तालाप को पकड़ने की क्षमता रखता है। अब क्योंकि खुफिया एजेंसियां बिना किसी अनुमति के फोन टेप करती हैं, इसलिए वे किसी के प्रति जवाबदेह भी नहीं है। हाय-हल्ला होने पर टेप किए गए फोन को डिलीट कर सकती हैं।&lt;br /&gt;भारत में फोन टेप करने के इस तरह के उपकरण खरीदने की शुरुआत 2005-2006 में हुई थी। आज की तारीख में एनटीआरओ के पास कम से कम 6 ऐसे उपकरण मौजूद हैं, जिन्हें उसने दिल्ली में लगाया हुआ है। केन्द्रीय खुफिया एजेंसी (आईबी) के पास भी इस तरह के 8 उपकरण हैं। सवाल यह है कि क्या एक लोकतांत्रिक सरकार में किसी की बातचीत को सुनना मौलिक अधिकारों का हनन नहीं है ? सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्रा की रिपोर्ट के बहाने मुसलमानों को बहलाने वाली सरकार जवाब दे कि क्यों मुसलमानों के फोन सुने जा रहे हैं ? क्या यूपीए सरकार भी सभी मुसलमानों के चरित्र को संदिग्ध मानती है ? हमारा संविधान लोगों की आजादी और जिंदगी में हस्तक्षेप करने की बिल्कुल भी इजाजत नहीं देता। लेकिन हमारी खुफिया एजेंसियों को इससे कोई मतलब नहीं है। यहां तो खुफिया एजेंसियां धड़ल्ले से पूरे समुदाय को ही संदेह के घेरे में लेकर उनके फोन टेप कर रही है। हैरत की बात तो यह है कि मुसलमानों के फोन टेप एनटीआरओ नाम की वह संस्था कर रही है, जिसका स्वयं का चरित्र संदेहों के घेरे में है। एनटीआरओ पर भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के कई गंभीर आरोप है। सम्भवतः एनटीआरओ भारत की पहली खुफिया संस्था है, जिस पर लगे आरोपों की जांच महालेखा नियंत्रक वित्तीय अंकेक्षण कर रहा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-1742465832687018056?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/1742465832687018056/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=1742465832687018056' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/1742465832687018056'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/1742465832687018056'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='मुसलमानों के फोन सुनती हैं खुफिया एजेंसियां'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S960lJMNHjI/AAAAAAAAALU/xZuS-newWVg/s72-c/phone-tapping.gif' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-9085485165618025056</id><published>2010-04-23T09:05:00.000-07:00</published><updated>2010-04-23T09:11:47.816-07:00</updated><title type='text'>रिपोर्टर ही बने रहना चाहते थे उदयन शर्मा    रिपोर्टर ही बने रहना चाहते थे उदयन शर्मा</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S9HGVECGboI/AAAAAAAAALM/3_ReGqxlpO8/s1600/images.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5463365888139226754" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 109px; CURSOR: hand; HEIGHT: 104px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S9HGVECGboI/AAAAAAAAALM/3_ReGqxlpO8/s320/images.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सलीम अख्तर सिद्दीक़ी&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उदयन शर्मा की पुण्य तिथि 23 अप्रैल पर उनको याद करना 1977 में शुरु हुई उस हिन्दी पत्रकारिता को भी याद करना है, जब उदयन शर्मा, एमजे अकबर और एसपी सिंह ने 'रविवार' के माध्यम से हिन्दी पत्रकारिता को नए तेवर प्रदान किए थे। 11 जुलाई 1949 को जन्मे उदयन शर्मा प्रख्यात पत्रकार ही नहीं बल्कि विचारों से पक्के समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शख्स थे। उन्होंने दीन-हीन हिन्दी पत्रकारिता को नए आयाम दिए थे। जब 23 अप्रैल 2001 को उनका निधन हुआ तो निर्भीक, समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष पत्रकारिता का युग समाप्त हो गया है। उदयन शर्मा का ये विशेष गुण था, वो अपने लिए नहीं जीते थे, वे अपने नहीं लिखते थे। वो नहीं लिखते थे किसी उच्च पद को पाने के लिए। जहां भी पीड़ा हो दर्द हो, जहां भी उत्पीड़न हो, जहां भी मनुष्य विपत्ति में हो, उसकी आवाज उठाने का काम उदयन शर्मा ने किया था। हालांकि एक वक्त में उदयन शर्मा रिपोर्टर से सम्पादक बन गए थे, लेकिन उनकी दिलचस्पी रिपोर्टिंग से कभी नहीं हटी। उनका मानना था कि अगर पत्रकार रहना है तो रिपोर्टर बनकर रहो। वो यह भी कहते थे कि जो सम्पादक रिपोर्टर नहीं रहता उसका सम्बन्ध उसकी अपनी जमीन यानी 'फील्ड' से छूट जाता है। उदयन जी के लिए पत्रकारिता सिर्फ पाठकों तक सूचनाएं पहुंचाने का पेशा नहीं थी। घटनाक्रम, उसके पीछे के कारकों तथा भावी परिणामों के प्रति सजग करना भी वह अपना दायित्व मानते थे। सामाजिक और व्यवस्थापक बदलावों के लिए काम करना भी वह पत्रकार का दायित्व मानते थे।&lt;br /&gt;उदयन जी एक खास बात यह भी थी कि उनका कभी कोई स्थाई दुश्मन या दोस्त नहीं रहा। उन्होंने यदि किसी के खिलाफ लिखा और उस आदमी ने उन्हें बैठाकर अपना नजरिया समझा दिया तो उसके पक्ष में लिखने से भी संकोच नहीं किया। जब वीपी सिंह ने कांग्रेस से निकलकर जनता दल बनाया तो उदयन शर्मा ने 'रविवार' में वीपी सिंह के खिलाफ जबरदस्त अभियान चलाया था। उन्होंने वीपी सिंह को 'बेईमान राजा' से 'शर्मीला ब्रूटस' तक लिख डाला था। बाद में जब वीपी सिंह ने अपना पक्ष उन्हें समझाया तो उन्होंने वीपी सिंह को 'शालीनता की अद्भुत मिसाल' कहने से भी गुरेज नहीं किया। यदि वे किसी के स्थाई दुश्मन थे तो वो थे साम्प्रदायिक लोग, जिन्हें उन्होंने कभी नहीं बख्शा। साम्प्रदायिक लोग हिन्दू थे या मुसलमान इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था। उदयन की साम्प्रदायिक दंगों की रिर्पोटें तो पत्रकारिता के छात्रों के लिए दस्तावेज की तरह हैं। अस्सी का दशक भारत खासतौर से उत्तर भारत साम्प्रदायिक दंगों की चपेट में था। उदयन शर्मा ने साम्प्रदायिक दंगों की वास्तविकता और उनके पीछे लगे दिमाग और हाथों को कस कर बेनकाब किया। जब बेनकाब साम्प्रदायिक ताकतें किसी अन्य समाचार माध्यम से उनकी आलोचना करती थीं तो वे केवल मुस्कराकर कहते थे-'हाथी चलता है, कुत्ते भौंकते हैं।' साम्प्रदायिक दंगों पर उनकी रिर्पोटिंग इतनी अथेंटिक होती थी कि अंग्रेजी साप्ताहिक 'संडे' भी उनकी हिन्दी रिपोर्ट्‌स को अंग्रेजी में अनुवाद करके प्रकाशित करता था। पाठक उनकी रिपोर्ट को पढ़कर जानता था कि सच क्या है। उदयन शर्मा की एक खास बात यह भी थी कि वे पत्रकार के साथ ही एक एक्टिविस्ट भी थे। वे चन्द्रशेखर की भारत यात्रा के साथ पूरी तरह जुड़े रहे। इस यात्रा से उन्हें देश और लोगों को समझने में आसानी हुई। जब चम्बल घाटी के कुछ दस्युओं ने आत्मसमर्पण किया तो समर्पण कराने में उनकी भूमिक भी थी।&lt;br /&gt;उदयन शर्मा ने राजनीति में भी हाथ आजमाए थे। राजनीति में वे केवल इसलिए नहीं आना चाहते थें कि उनके कई पत्रकार मित्र 'जोड़-तोड़' करके राज्यसभा में पहुंच गए थे। उनका मानना था कि राजनीति से भी समाज में बदलाव का काम किया जा सकता था। लेकिन वे राज्यसभा में नहीं बल्कि जनता के द्वारा चुनकर लोकसभा में जाना चाहते थे। लेकिन दूसरों का राजनैतिक आकलन करने में माहिर उदयन शर्मा अपना आकलन करने में गच्चा खा गए। 1985 में जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में कांग्रेस के पक्ष में लहर चल रही थी तो वे चौधरी चरण सिंह की पार्टी 'दलित मजदूर किसान पार्टी' के टिकट पर आगरा से चुनाव लड़े। दूसरी बार 1991 में कांग्रेस विरोधी लहर में कांग्रेस के टिकट पर भिंड से चुनाव लड़ा। दोनों बार ही हार का मुंह देखना पड़ा। उदयन यदि चुनाव जीत जाते तो यकीनन देश को एक ऐसा सांसद मिलता, जो दलितों, अल्पसंख्यकों और वंचितों की मुखर आवाज बनता।&lt;br /&gt;आज जब पत्रकारिता 'मिशन' से 'धन्धा' बन चुकी है, यह देखकर उदयन की आत्मा अगर कहीं है तो जरुर जार-जार रो रही होगी। 1977 में जिस जन पक्षधर पत्रकारिता की शुरुआत उन्होंने एमजे अकबर और स्व0 सुरेन्द्र प्रताप सिंह के साथ मिलकर की थी, आज वह बाजार में बेशर्मी के साथ बिक रही है। पत्रकारिता 'जन पक्षधर' से 'विज्ञापन पक्षधर' हो गयी है। 'पेड न्यूज' के नाम पर कुछ लोग जरुर मुखर हो रहे हैं, लेकिन उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज बन कर रह गयी है। हैरत की बात तो यह है कि 'पेड न्यूज' पर मीडिया कुछ भी दिखाने और लिखने को तैयार नहीं है। पेड न्यूज के बारे जो भी बहस हो रही है, वो केवल मीडिया पोर्टलों पर ही हो रही है। अब सवाल यह है कि मीडिया पोर्टलों के पाठक हैं ही कितने। जो भी हैं, उनमें भी उन पाठकों की तादाद ज्यादा है, जो किसी न किसी रुप से मीडिया से जुड़े हैं। आम आदमी को आज तक यह पता नहीं चल पाया है कि कुछ अखबार और न्यूज चैनल किस तरह से विज्ञापन को खबर बनाकर परोस कर उनके साथ धोखा-धड़ी कर रहे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि आज मीडिया पर विश्वसनीयता का संकट है। अब विज्ञापन विभाग सम्पादकीय पॉलिसी तय करने लगा है। आज भी कुछ लोग 1977 वाली पत्रकारिता करना चाहते हैं, लेकिन उनके सामने इतनी दुश्वारियां खड़ी कर दी जाती हैं कि कुछ हालात से समझौता कर लेते हैं। जो लोग समझौता नहीं करना चाहते, उन्हें हाशिए पर धकेल दिया जाता है। मीडिया को आज उदयन शर्मा, एसपी सिंह और राजेन्द्र माथुर जैसे पत्रकारों की जरुरत है। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-9085485165618025056?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/9085485165618025056/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=9085485165618025056' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/9085485165618025056'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/9085485165618025056'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2010/04/blog-post_23.html' title='रिपोर्टर ही बने रहना चाहते थे उदयन शर्मा    रिपोर्टर ही बने रहना चाहते थे उदयन शर्मा'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S9HGVECGboI/AAAAAAAAALM/3_ReGqxlpO8/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-1057430216842505497</id><published>2010-04-18T23:00:00.000-07:00</published><updated>2010-04-18T23:04:40.074-07:00</updated><title type='text'>एक दिन का दारोगा एक दिन में ही हुआ हलकान</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S8vyAKhUq3I/AAAAAAAAALE/HW3PY61w41k/s1600/d113494-large.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5461725057754901362" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 254px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S8vyAKhUq3I/AAAAAAAAALE/HW3PY61w41k/s320/d113494-large.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सलीम अख्तर सिद्दीक़ी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;किस की किस्मत कब और कैसे बदल जाए कुछ पता नहीं चलता। मेरठ शहर के सराय खैर नगर निवासी जिस बालकराम प्रजापति का कल तक कोई नहीं जानता था, चार दिन से मीडिया की सुर्खियों में बने हुए हैं। वजह, मेरठ के डीआईजी अखिल कुमार ने उन्हें एक दिन के लिए एक पुलिस चौकी का इंचार्ज बनने की चुनौती दी और बालक राम ने चुनौती मंजूर कर ली। हुआ यूं था कि 'मानव समाज कल्याण सेवा समिति' नाम से एक संस्था चलाने वाले और निम्न मध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले 58 साल के समाजसेवी बालकराम प्रजापति ने 15 अप्रैल को डीआईजी से मिलकर पुलिस व्यवस्था सुधारने और जनता के बीच पुलिस की इमेज सुधारने की बात की थी। डीआईजी का कहना था कि जिन हालात में पुलिस काम करती है, उन हालात में ज्यादा कुछ नहीं किया जा सकता है। बालकराम प्रजापति उनकी बात से संतुष्ट नहीं थे। डीआईजी ने बालकराम को यह देखने के लिए कि पुलिस किन हालात में काम करती है। पुलिस के सामने किस प्रकार की दुश्वारियां आती हैं। पुलिस जनता के सामने किस तरह से पेश आती है, एक दिन के लिए एक पुलिस चौकी का इंचार्ज बनाने की पेशकश कर दी। बात के धनी और कुछ कर गुजरने की चाहत रखने वाले बालकराम ने 17 अप्रैल की सुबह दस बजे से और 18 अप्रैल की सुबह दस बजे तक पिलोखेड़ी पुलिस चौकी का इंचार्ज बनना स्वीकार कर लिया।&lt;br /&gt;बालकराम प्रजापति की सोच समाजवादी है। 'मानव सेवा समाज कल्याण समिति' नाम से एक गैर सरकारी संगठन चलाते हैं। बहुत ही ईमानदार आदमी हैं। इसीलिए खटारा स्कूटर पर चलते हैं। वे मल्टीनेशनल कम्पनियों के सख्त खिलाफ हैं। बंगला देश के अर्थशास्त्री युनूस अली से दिल्ली में लम्बी वार्ता कर चुके हैं। अस्सी के दशक में इंदिरा गांधी और राजीव गांधी से भी मिल चुके हैं। हालांकि उनके एक दिन का चौकी इंचार्ज बनने से पहले डीआईजी साहब को फोन करके किसी ने बताया कि बालकराम एक बार जेल जा चुके हैं। उनके पड़ोसी इरशाद अली इस बात का पुरजोर खंडन कहते हुए कहते हैं कि 'उनके बारे में इस तरह की अफवाह उनके विरोधी इसलिए फैला रहें है, ताकि वे चौकी इंचार्ज नहीं बन सकें।' डीआईजी साहब ने बालकराम के साथ एक ज्यादती कर दी। उन्हें उस पुलिस चौकी का इंचार्ज बनाया गया, जिस में शिकायतकर्ताओं की सुबह से शाम तक लाइन लगी रहती है। इस पुलिस चौकी के अर्न्तगत आने वाले मौहल्लों में सट्टा, जुआ, ब्याजखोरी और लड़ाई झगड़ा आम बात है। मेरठ का मशहूर 'कमेला' भी इसी चौकी के अन्तर्गत आता है। बालकराम को लीगल अधिकार भी नहीं दिए गए थे। ऐसा शायद सम्भव भी नहीं था।&lt;br /&gt;17 अप्रैल को बालकराम प्रजापति सुबह अपने पुराने बजाज चेतक स्कूटर से पुलिस चौकी जाने के लिए निकले। स्कूटर की पैट्रोल की टंकी में झांक कर देखा तो टंकी लगभग खाली थी। पहले 20 रुपए का पैट्रोल डलवाने की सोची। फिर पूरा एक लीटर पैट्रोल डलवाया गया। सफारी सूट पहनकर जाने की इच्छा रखते थे, लेकिन सफारी सूट नहीं था। बहरहाल, ठीक नौ बज के पचास मिनट पर बालकराम ने पुलिस चौकी में प्रवेश किया और जाते ही इंचार्ज की कुर्सी सम्भाल ली। जैसा कि अपेक्ष्ित था, फौरन ही बालकराम के सामने शिकायतों का अम्बार लग गया। एक महिला की शिकायत थी कि पुलिस जबरन उसके पति को उठा लायी है। पुलिस ने घर में भी तोड़फोड़ की। एक और महिला का कहना था कि पुलिस उसके बेटे को पुलिस उठा लाई है। एक शिकायत में कहा गया कि स्कूटर चोरी की रिपोर्ट लिखने 500 रुपए मांगे गए। मजे की बात यह रही कि थोड़ी ही देर में बालकराम की भी भाषा बदल गयी। वह भी पुलिस की भाषा बोलने लगे। उन्होंने लोगों को अपने कर्त्तव्य निभाने की सलाह दी। इसी दौरान बालकराम ने एक दम्पति के आपसी मनमुटाव को उन्होंने दूर करके दम्पति को घर वापस भेज दिया। बालकराम ने क्षेत्र का दौरा भी किया। रात को दबिश डालने भी पुलिस के साथ गए। इतनी गनीमत रही कि पुलिस उन्हें अपने साथ यह दिखाने नहीं ले गयी कि पुलिस 'एनकाउंटर' कैसे करती है।&lt;br /&gt;एक दिन का चौकी इंचार्ज बनने पर बालकराम को पता चल ही गया कि पुलिस को चौबीस घंटे भागना-दौड़ना पड़ता है। कम संसाधन और विपरीत परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। उन्हें मानना पड़ा कि पुलिस वालों को भी आराम की जरुरत होती है। एक दिन का दारोग बालकराम एक दिन में ही 'हलकान' हो गया। बालकराम को यह भी पता चला कि शिकायतकर्ता फौरन यह चाहता है कि जिसकी शिकायत लेकर वह आया है, उसको पुलिस बस फौरन बिना की जांच के लॉकअप में डाल दे। बालकराम के इल्म में यह भी आया कि कुछ शिकायतें झूठी भी होती हैं। हालांकि ऐसा होता भी है कि पुलिस किसी एक पार्टी से पैसा खाकर झूठे मुकदमे लिखती है। बालकराम जानते होंगे कि जो थानेदार अपनी चौकी या थाने में रिश्वत लेने नहीं देता, ईमानदारी से काम करता है, उस थानेदार के मातहत ही जल्दी से जल्दी उसका बोरिया बिस्तर बंधवाने की जुगत में लग जाते हैं। पुलिस वाले अक्सर अपने सीनियर के बारे में कहते हुए मिल जाते हैं- 'साला ना खुद खाता है ना हमें खाने देता है, पता नहीं कब दफान होगा यहां से।' बालकराम एक दिन के लिए चौकी इंचार्ज बने थे। एक दिन में वह कोई बदलाव ला पाते यह मुमकिन नहीं था। बालकराम ही क्यों, एक दिन में कोई भी कुछ नहीं कर सकता है। सच तो यह है कि कई सालों तक भी कोशिश की जाए तो इस सड़े-गले 'सिस्टम' को कोई नहीं तोड़ सकता। क्योंकि पुलिस और पब्लिक इस सिस्टम के इतने आदी हो चुके हैं, इसमें इतना रम चुके हैं कि यही सही 'सिस्टम' लगने लगा है। अपनी एक रिपोर्ट में आनंद नारायण मुल्ला यह कह चुके हैं कि 'पुलिस संगठित अपराधियों का गिरोह है।' अपराधियों के इस गिरोह को इसलिए ढील दी जाती है, ताकि राजनीतिज्ञ और सरकारें अपने हित में इस गिरोह का इस्तेमाल कर सकें। पुलिस में सुधार के लिए कई आयोग बने, लेकिन उनकी रिपोर्ट पर कभी भी अमल नहीं किया गया। भारत में आज भी 1861 में बना पुलिस एक्ट ही चलता है। ब्रिटिश हुकूतम ने इस एक्ट को 1857 के गदर के बाद भारतीयों पर जुल्म और ज्यादती करने के लिए लागू किया था। आजादी के बाद हमारे देश के नेता इस एक्ट को खत्म करने को तैयार नहीं है।&lt;br /&gt;इस एक दिन के तमाशे के पीछे डीआईजी साहब की क्या मंशा होगी, यह तो वही जानते होंगे। इस तरह के ड्रामे 'नायक' सरीखी फिल्मों में ही हो सकते हैं। फिल्म में कलाकार एक लिखी-लिखाई स्क्रिप्ट पर काम करते हैं। लेकिन यहां बालकराम ने अपनी स्क्रिप्ट खुद लिखी। हो सकता है कि डीआईजी को 'नायक' फिल्म से ही यह सब ड्रामा करने की प्रेरणा मिली हो। कुछ भी हो बालकराम प्रजापति चार दिन में ही 'आम' से 'खास' आदमी तो हो ही गए हैं। एक बार कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपने राज्य के एक भिश्ती को एक दिन का बादशाह बना दिया था। उस भिश्ती ने उसी दिन चमड़े का सिक्का चलाया था। इसी तरह मेरठ के इतिहास में भी यह दर्ज हो गया है कि बालकराम प्रजापति एक दिन के पुलिस चौकी इंचार्ज बने थे। लेकिन भिश्ती की तरह बालकराम के हाथ खुले नहीं थे, बंधे हुए थे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-1057430216842505497?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/1057430216842505497/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=1057430216842505497' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/1057430216842505497'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/1057430216842505497'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2010/04/blog-post_18.html' title='एक दिन का दारोगा एक दिन में ही हुआ हलकान'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S8vyAKhUq3I/AAAAAAAAALE/HW3PY61w41k/s72-c/d113494-large.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-1137504462780493775</id><published>2010-04-14T00:24:00.000-07:00</published><updated>2010-04-14T00:33:05.943-07:00</updated><title type='text'>क्या अपने ही देश के लोगों के खिलाफ सेना का इस</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सलीम अख्तर सिद्दीक़ी&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;            छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलवादियों द्वारा 76 सीआरपीएफ जवानों की घात लगाकर की गयी हत्याओं के बाद बहस इस बात पर तो हो रही हैं कि सीआरपीएफ जवानों की हत्याएं किस की गलती से हुईं। इस बात पर बहस नहीं हो रही कि आखिर नक्सलवाद ने अपनी जड़ें इतने गहरे कैसे जमा लीं कि अब उनसे निपटना कठिन हो गया है। नक्सलवाद को इस स्थिति तक लाने का जिम्मेदार कौन ? हमारे देश की बहुत बड़ी त्रासदी है कि यहां समस्याओं को पहले इत्मीनान से फलने-फूलने दिया जाता है, और जब समस्या विकट हो जाती है तो समस्या को 'तोप' दाग कर हल करने की कोशिश की जाती है। इसलिए समस्या सुलझने के बजाय और ज्यादा उलझ जाती है। समस्या चाहे किसी शहर की सड़कों पर अतिक्रमण की स्थानीय हो या आतंकवाद या नक्सलवाद जैसे गम्भीर राष्ट्रीय हो। 1980 के दशक में जब स्वर्ण मंदिर को आतंकवादियों ने अपना अड्डा बना लिया तो महज राजनैतिक फायदे के लिए उसको बढ़ने दिया गया। जब समस्या हद से ज्यादा बढ़ गयी तो समाधान सेना को करना पड़ा। उस समाधान की देश को कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी, इसे पूरा देश जानता है। कुछ लोग नक्सल समस्या को भी पंजाब समस्या की तर्ज पर हल करने की वकालत कर हैं। ऐसे सुझाव देने वालों पर केवल हंसा जा सकता है। ऐसे लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि पंजाब में आतंकवाद केवल एक प्रदेश तक सिमटा हुआ था। नक्सलवाद कई प्रदेशों के बड़े हिस्सों को चपेट में ले चुका है। नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों में सेना का इस्तेमाल अपने ही देश के लोगों से युद्ध करना सरीखा होगा। अभी भी नक्सलवादियों के विरुद्ध चलाया जा रहा कथित 'ऑप्रेशन ग्रीन हंट' नक्सलवादियों के खिलाफ युद्ध सरीखा ही तो है। सेना के इस्तेमाल से केवल इतना होगा कि युद्ध का विस्तार थोड़ा और ज्यादा हो जाएगा। जब युद्ध होगा तो लोग तो मारे ही जाएंगे। मरने वालों में दोनों ही तरफ के ही लोग होंगे। सवाल यह है कि क्या अपने ही देश के लोगों के खिलाफ सेना का इस्तेमाल करना नैतिक रुप से सही होगा ?&lt;br /&gt;            देश का अभिजात्य वर्ग इस बात की बहुत वकालत करता है कि नक्सली बंदूकें छोड़कर लोकतान्त्रिक तरीक से संसद और विधानसभाओं में चुनकर आएं और अपनी बात कहें। ये लोग किस लोकतन्त्र की बात करते हैं ? उस लोकतन्त्र की जिसमें एक मुख्यमंत्री हजारों बेगुनाह लोगों को मरवाने के बाद भी एक प्रदेश का तीन बार मुख्यमंत्री बना रह सकता है ? दूसरे मुख्यमंत्री चारा घोटाला में दोषी ठहराए जाने के बाद सत्ता अपने परिवार को सौंपकर जेल काटता है। तीसरी मुख्यमंत्री मूर्तियां तराशने और भव्य पार्क बनाने के नाम पर अरबों रुपए स्वाहा कर देती हैं। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से भी तो विभिन्न राजनैतिक पार्टियों के लोग संसद और विधानसभा में जाते हैं, उन्होंने आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिए आज तक क्या किया है, इसका लेखा-जोखा भी देश की जनता के सामने आना चाहिए। यह भी देश को पता चलना चाहिए कि कैसे बड़े पूंजीपतियों ने आदिवासियों को उनके जल-जंगल-जमीन से बेदखल करके अपना कब्जा कर लिया है। नक्सलवाद को बलपूर्वक कुचलने की बात करने वाले यह क्यों नहीं सोच रहे कि नक्सलवाद को पनपाने में सरकार की भ्रष्ट नौकरशाही भी बराबर की जिम्मेदार है। जब झारखंड जैसे प्रदेश का मुख्यमंत्री मधुकोड़ा केवल दो साल में चार हजार करोड़ रुपए की काली कमाई करेगा तो नक्सलवाद नहीं तो क्या रामराज्य पनपेगा ? सरकार की बंदूकें भ्रष्ट नौकरशाहों और नेताओं की तरफ क्यों नहीं उठतीं ? क्यों उनके गुनाहों को जांच दर जांच में उलझाकर भुला दिया जाता है ? दो जून की रोटी की मांग करने वालों के ही सीने में गोलियां उतारने की बात क्यों की जाती है ? नक्सलवाद को कुचलने की बात करने वालों को पहले भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण और आर्थिक विषमता के खिलाफ भी तो मुहिम चलानी चाहिए।    &lt;br /&gt;            नक्सलवाद तो बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के पिछड़े और आदिवासी इलाकों में है, लेकिन क्या हालात ऐसे नहीं बनते जा रहे हैं कि अब नक्सलवाद का विचार उन राज्यों और शहरों के लोगों को भी अच्छा लगने लगा है, जो साधन सम्पन्न कहलाते हैं। शोषण, अत्याचार और असमानता देखने के लिए नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों में जाने की जरुरत नहीं है। साधन सम्पन्न समझे जाने वाले प्रदेशों में भी  सरकार, नेता और पुलिस अपनी मनमानी करती है। उदहारण के लिए सरकारी सस्ते गल्ले की दुकानों का सारा राशन ब्लैक में बिक जाता है। उस राशन को लेने का हकदार बस देखता रहता है। यदि किसी ने हिम्मत करके दुकानदार की शिकायत अधिकाारियों से कर दी तो राशन की दुकान वाले का तो कुछ नहीं बिगड़ता लेकिन शिकायतकर्ता की मुसीबत आ जाती है। नोएडा की खबर है कि गरीबी की रेखा के नीचे जीने वाले लोगों के लिए बनने वाले बीपीएल राशन कार्ड करोड़पतियों ने बनवा रखे हैं, वास्तविक हकदार तहसील और खाद्य आपूर्ति विभाग के चक्कर काट रहे हैं, जहां उन्हें दुत्कार के अलावा कुछ नहीं मिलता। प्राइवेट नर्सिंग होम लूट के अड्डों में तो सरकारी अस्पताल बूचड़खानों में तब्दील हो गए हैं। वेस्ट यूपी में ही  आए दिन आर्थिक तंगी, कर्ज और बीमार होने पर इलाज न होने पर आत्महत्या करने की खबरें छपती हैं। मेरठ में पिछले सप्ताह एक महिला ने अपने तीन बच्चों के साथ इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि उसका पति एक फैक्टरी में मात्र 2500 रुपयों की नौकरी करता था। इतने पैसों में दो वक्त की रोटी खाना भी दुश्वार था। इन आत्महत्या करने वालों में कितने ही लोग ऐसे होंगे, जो मौजूदा सिस्टम से नाखुश होते होंगे। लेकिन उनमे इतनी ताकत नहीं होती कि वे कुछ कर सकें। इसलिए उन्हें मौत ही एकमात्र आसान रास्ता लगता है। लेकिन भविष्य में कुछ लोग ऐसे भी तो सामने आ सकते हैं, जो सिस्टम के खिलाफ उठ खड़े होने का हौसला रख सकते हैं। कल उनके बीच भी तो कोई कोबाड गांधी आ सकता है।&lt;br /&gt;            दंतेवाड़ा में मारे गए जवानों को श्रंद्धाजलि देने के लिए मोमबत्तियों जलाना ही काफी नहीं है। झारखंड के मुख्यमंत्री मधुकोड़ा जैसे लोगों की काली कमाई को उनसे छीनकर उसे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के विकास में लगाया जाए। यह भी शहीद हुए जवानों को एक श्रंद्धाजलि होगी। एक सच्ची श्रद्धांजलि।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-1137504462780493775?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/1137504462780493775/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=1137504462780493775' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/1137504462780493775'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/1137504462780493775'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2010/04/blog-post_14.html' title='क्या अपने ही देश के लोगों के खिलाफ सेना का इस'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-8768583606708473617</id><published>2010-04-10T05:39:00.000-07:00</published><updated>2010-04-10T05:41:29.737-07:00</updated><title type='text'>मीडिया की शर्मनाक हरकत</title><content type='html'>&lt;a href="http://www.visfot.com/index.php/author/saleem/"&gt;&lt;strong&gt;सलीम अख्तर सिद्दीकी&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;  मीडिया अपनी टीआरपी की हवस में किसी भी हद तक जा सकता है। खासतौर से इलैक्ट्रॉनिक मीडिया ने तो जैसे सारी नैतिकता ही खत्म कर दी है। सानिया ने एक पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक से शादी करने का फैसला क्या लिया पूरा मीडिया सानिया और शोएब मलिक की निजी जिन्दगी में दखलअंदाजी कर बैठा।&lt;br /&gt;उस पर आएशा सिद्दीकी नाम का एक कोण जुड़ जाने से मामले को और ज्यादा मसालेदार बनाने का मौका भी हाथ आ गया। ऐसा लगा जैसे मीडिया के पास सानिया-शोएब-आएशा के अलावा कोई मुद्दा नहीं रहा। सानिया जैसी सेलेब्रेटी हो या आम आदमी, उसकी जिन्दगी में कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जो बहुत निजी होती है। शादी भी ऐसा ही निजी मामला है। लेकिन मीडिया शादी जैसे निजी मामले को भी टीआरपी बटोरने का हथियार मानकर बेतुकी बातों पर ध्यान दे रहा है। हद तो जब हो गयी, जब इलैक्ट्रॉनिक मीडिया ने ऐसी क्लिपिंग दिखायी, जिसमें शोएब और सानिया एक कमरे में बातें कर रहे थे। मीडिया की यह हरकत क्या शर्मनाक नहीं कही जाएगी ? लोगों के कमरों में में झांकने का हक मीडिया को कैसे है ? जैसे इतना ही काफी नहीं था।&lt;br /&gt;अब ऐसा लगता है कि मीडिया ने सानिया-शोएब की शादी को भी 'बेचने' का पूरा-पूरा इन्तजाम कर लिया है। सानिया अपनी शादी के दिन कौनसा लहंगा पहनेगी ? उसकी कीमत क्या होगी ? उसे कौन फैशन डिजाइनर डिजाइन कर रहा है ? शादी में कौन-कौन मेहमान रहेगा ? शादी का वैन्यू और मेन्यू क्या होगा ? कौन खानसामा खाना तैयार करेगा ? सानिया और शोएब अपना हनीमून कहां मनाने जाएंगे ? इन सब सवालों पर मीडिया अब 15 अप्रैल तक माथापच्ची करेगा। सवाल यह है कि मीडिया को ऐसा क्यों करना चाहिए ? क्या एक सेलेब्रेटी को अपनी शादी को अपनी मर्जी से करने का हक नहीं है ? एक सेलेब्रेटी को अपनी शादी का तमाशा क्यों बनने देना चाहिए ? मीडिया में भी कुछ लोग ऐसे हैं, जो सेलेब्रेटी हैं, क्या वे चाहेंगे कि उनकी अपनी या उनकी सन्तान की शादी को भी टीआरपी बटोरने का हथियार बना दिया जाए ? सानिया मिर्जा हो या कोई और सेलेब्रेटी, बात उसके प्रोफेशन की होनी चाहिए, शादी जैसे निजि मामले की नहीं।&lt;br /&gt;मीडिया ने तो खैर इस बात पर हायतौबा नहीं मचायी कि सानिया एक पाकिस्तानी से शादी क्यों कर रही है, लेकिन कुछ लोगों को सानिया का एक पाकिस्तानी से शादी करना बिल्कुल रास नहीं आ रहा है। इस पर कुतर्क दिया जा रहा है कि क्योंकि पाकिस्तान हमारा 'दुश्मन' देश है, इसलिए सानिया को शोएब मलिक से शादी नहीं करनी चाहिए। समझ नहीं आता कि पाकिस्तान 'दुश्मन' देश किस तरह है ? क्या भारत और पाकिस्तान के एक दूसरे के देश में दूतावास नहीं हैं ? क्या दोनों के बीच व्यापारिक सम्बन्ध नहीं हैं ? क्या दोनों देशों के लोग एक दूसरे मुल्क में नहीं जाते ? यदि पाकिस्तान दुश्मन देश होता तो क्या पाकिस्तान के कलाकार भारत आकर टेलीविजन पर अपने प्रोग्राम दे सकते थे ? क्या शोएब मलिक भारत आकर शादी करने की सोच सकते थे ? क्या सानिया मिर्जा दुल्हन बनकर पाकिस्तान जा सकती थीं ? जो लोग पाकिस्तान को दुश्मन देश कह रहे हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि दुश्मन देश वह होता है, जिससे किसी भी प्रकार के सम्बन्ध नहीं होते। पाकिस्तान को अघोषित रुप से दुश्मन देश तो समझा जा सकता है, लेकिन घोषित रुप से पाकिस्तान हमारा दुश्मन नहीं है।&lt;br /&gt;कुछ लोग पाकिस्तान में सानिया की भावी जिन्दगी को लेकर शंका जाहिर कर रहे हैं। उदाहरण दिया जा रहा है रीना रॉय का। सवाल यह है कि क्या दुनिया में सभी शादियां सफल ही होती हैं ? मत भूलिए कि हमारे देश की बहुत सारी लड़कियों की शादी ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका में भी होती है। जन्मपत्री से कुंडली मिलाकर रिश्ता तय होता है। शुभ मुहूर्त में लग्न होता है। क्या  ब्रिटेन और अमेरिका से खबरें नहीं आती कि किस तरह भारत से शादी होकर जाने वाली लड़कियों की जिन्दगी को नरक बना दिया जाता है। पश्चिमी देशों में तो परदा पर्था भी नहीं है। सभी तथाकथित प्रगतिशील और खुले विचारों के लोग है। फिर उन देशों में हमारे देश की लड़कियां क्यों खुश नहीं रह पाती हैं ? याद रखिए बहुत ज्यादा खुलापन और प्रगतिषीलता भी अच्छी नहीं होती है। पष्चिमी देषों में यदि भारत की लड़कियों को नौकरानी बनाकर रखने की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनती है तो इसका कारण यह है कि भारत की लड़कियां पष्चिमी देषों के खुलेपन को अपना नहीं पातीं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-8768583606708473617?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/8768583606708473617/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=8768583606708473617' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/8768583606708473617'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/8768583606708473617'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2010/04/blog-post_10.html' title='मीडिया की शर्मनाक हरकत'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-5282487739167418680</id><published>2010-04-06T07:41:00.000-07:00</published><updated>2010-04-06T07:48:59.850-07:00</updated><title type='text'>वीएम सिंह की गिरफ्तारी अलोकतांत्रिक</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S7tIkXYeKII/AAAAAAAAAKo/kg91Cg5NJX8/s1600/vm.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5457035163078633602" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 269px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S7tIkXYeKII/AAAAAAAAAKo/kg91Cg5NJX8/s320/vm.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सलीम अख्तर सिद्दीकी&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अब इस देश में गरीबों, किसानों और वंचितों की हक की लड़ाई लड़ना भी इतना बड़ा गुनाह हो गया है कि लड़ाई लड़ने वालों सामाजिक कार्यकर्ताओं पर संगीन धाराओं में मुकदमे लगाकर जेल में ठूंस दिया जाता है। किसान मजदूर संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रसिद्ध किसान नेता वीएम सिंह की गिरफ्तारी तो यही बताती है। यहां यह बताना उल्लेखनीय होगा कि पीलीभीत उत्तर प्रदेष के वीएम सिंह सड़क से लेकर कोर्ट तक किसानों को उनकी उपज का वाजिब दाम दिलाने की लड़ाई लड़ते रहे हैं। पिछले साल उन्होंने गन्ना उत्पादक किसानों को उनकी उपज का वाजिब दिलाने में कामयाबी हासिल की थी। अब वह अनाज मंडियों द्वारा गेंहूं के सरकारी समर्थन मूल्य से कम मूल्य पर गेंहूं खरीदे जाने के विरुद्ध आंदोलन कर रहे थे। इसी सिलसिले में वीएम सिंह 4 अप्रैल को हजारा थाना क्षेत्र के राहुल नगर में किसानों की एक बड़ी सभा को सम्बोधित करने जाने वाले थे। लेकिन इससे पहले ही सुबह चार बजे बसपा सरकार की 'बहादुर' पुलिस ने वीएम सिंह पर संगीन धाराओं में मुकदमा दायर करके उन्हें जेल भेज दिया।&lt;br /&gt;वीएम सिंह अपवाद नहीं हैं। सच तो यह है कि अब अन्याय, शोषण और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वालों की लड़ाई को कुन्द करने के लिए सामाजिक कार्यकर्ताओ को झूठे मुकदमों में फंसा देना, उनकी पिटाई करना आम बात हो गयी है। कई बार तो हक की लड़ाई लड़ने वालों के साथ अपराधियों से भी बुरा सलूक किया जाता है। अब अहिंसक रुप से आंदोलन चलाने से सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। लेकिन जब आन्दोलन उग्र हो जाता है तो सरकार की बहादुर पुलिस आंदोलनकारियों पर गोलियां चलाने से भी गुरेज नहीं करती। उस पर तुर्रा यह कि कसूरवार पुलिस का बाल भी बांका नहीं होता। कभी कभी तो लगता है कि हमारी तथाकथित लोकतांत्रिक सरकारें ब्रिटिश सरकार से भी ज्यादा असंवेदनशीलता का मुजाहिरा करती हैं। वीएम सिंह तो कोई हिंसक आंदोलन भी नहीं चला रहे थे। मात्र धरना-प्रदर्शन करने से ही सरकार बौखला गयी। दरअसल, हमने लोकतंत्र का मतलब केवल वोटों के सहारे सरकारें बदलना ही समझ लिया है। वीएम सिंह की गिरफ्तारी सरकार का निहायत ही अलोकतांत्रिक कदम है। सरकार को उन्हें जल्द से जल्द बिना शर्त रिहा करना चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3883942630420148325-5282487739167418680?l=haqbaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://haqbaat.blogspot.com/feeds/5282487739167418680/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3883942630420148325&amp;postID=5282487739167418680' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/5282487739167418680'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3883942630420148325/posts/default/5282487739167418680'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://haqbaat.blogspot.com/2010/04/blog-post_06.html' title='वीएम सिंह की गिरफ्तारी अलोकतांत्रिक'/><author><name>SALEEM AKHTER SIDDIQUI</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16353232432428018949</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S3_iKjw6IfI/AAAAAAAAAKI/c0da-oQjVR4/S220/saleem+2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_K8CMUtq9kD4/S7tIkXYeKII/AAAAAAAAAKo/kg91Cg5NJX8/s72-c/vm.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3883942630420148325.post-8496411041405296605</id><published>2010-04-02T23:16:00.000-07:00</published><updated>2010-04-02T23:18:06.918-07:00</updated><title type='text'>सानिया को क्यों बनाते हो 'सनसनी'</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;a href="http://www.visfot.com/index.php/author/saleem/"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सलीम अख्तर सिद्दीकी&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सानिया मिर्जा किससे शादी करेगी। किससे नहीं करेगी। यह सानिया की मर्जी पर निर्भर है। वह बालिग है। अपना बुरा भला सोच सकती है। देश का कानून भी साफ कहता है कि एक बालिग युवक या युवती अपनी मर्जी से किसी से भी शादी कर सकता है। लेकिन यह भारत है। यहां बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना भी हो सकता है और परेशान भी। आजकल भारत में ऐसे बहुत सारे अब्दुल्ला हैं, जो सानिया की शादी से परेशान हो गए हैं। पाकिस्तान का कोई मामला हो और उसमें शिवसेना अपनी टांग न अड़ाए ऐसा हो ही नहीं सकता।&lt;br /&gt;पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक और टेनिस स्टार सानिया मिर्जा की शादी में भी शिवसेना ने अपनी टांग घुसेड़ दी है। इधर सपा नेता अबू आजमी भी पगला गए लगते हैं। उन्होंने तो यहां तक कह डाला कि मैं शयोब मलिक की कभी तरफदारी नहीं कर सकता। वह कहते हैं कि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच होने वाले क्रिकेट मैच में मैं यह दुआ करुंगा कि मलिक जीरो पर आउट हो जाएं, और पाकिस्तानी टीम हार जाए। ऐसा लगता है कि अबू आजमी खेलों को सद्भावना की नजर से नहीं दुर्भावना की नजर से देखते हैं। अगर शयोब मलिक अच्छी बल्लेबाजी करेगा तो हमें क्यों अपनी सूरत पर बारह बजा लेने चाहिए ? जो अच्छा खेलेगा उसकी तारीफ तो करनी ही पड़ेगी। अब उसमें शयोब मलिक हों या सचिन तेंदुलकर। इससे क्या फर्क पड़ता है। हमारा मानना तो यह है कि खेल दो देशों के बीच सद्भावना कायम रखने के लिए खेले जाते हैं, दुश्मनी बढ़ाने के लिए नहीं। यदि खेलों से दो देशों के बीच दूरियां बढ़ती हैं तो ना खेलना ही बेहतर है।&lt;br /&gt;अबू आजमी के बेटे फरहान आजमी ने हाल ही में एक फिल्म अभिनेत्री आयशा टाकिया से शादी की है। क्या किसी ने सवाल किया कि आपके बेटे ने एक 'नाचने-गाने' वाली लड़की से शादी क्यों की है। पूछने का मतलब भी नहीं है। क्योंकि यह आपके बेटे और आपके परिवार का मामला था। इसमें किसी को दखलअंदाजी करने का मतलब ही पैदा नहीं होता। इसी तरह सानिया मिर्जा और शयोब मलिक के परिवार राजी हैं तो अबू आजमी के पेट में दर्द क्यों हो रहा है ? 1978 के बाद से अब तक हजारों लड़कियों की शादी पाकिस्तान में हो चुकी है। यहां तक की फिल्म अभिनेत्री रीना रॉय भी पाकिस्तानी क्रिकेटर मोहसिन खान से शाद करक
