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Friday, May 27, 2011

वक्त और इंसानियत

सलीम अख्तर सिद्दीकी
सुबह के दस बजे हैं। मैं आॅफिस जाने के लिए सिटी बस का इंतजार कर रहा हूं। धूपी बहुत तीखी है। एक दुकान के शेड के नीचे जाने की सोचता ही हूं कि बस आती दिखाई दे जाती है। बस को हाथ से रूकने का इशारा करता हूं। बस में सवार होता ही हूं कि कंडक्टर की आवाज आती है, ‘कहां जाना है?’ मैं समझता हूं, कंडक्टर मुझसे मुखातिब है। मैं पैसे निकालने के लिए जेब में हाथ डालता हुआ आवाज की दिशा में देखता हूं तो कंडक्टर एक महिला से मुखातिब था। महिला की उम्र यही कोई 30-35 साल रही होगी। वह निहायत ही गंदे कपड़े पहने हुए थी। उसके पास एक गंदी से पोटली थी, जिसमें से उसकी ‘गृहस्थी’ का सामान कुछ-कुछ नुमायां हो रहा था। चेहरे मोहरे से वह स्थानीय नहीं लग रही थी। उसकी गोद में लगभग दो साल का बच्चा था। वह सूरत से ही बीमार लग रहा था। उसकी नाक बह रही थी। बच्चे के हाथ में खुला हुआ ग्लूकोज के बिस्कुट का पैकेट था। उसमें से उसने एक या दो बिस्कुट ही खाए होंगे। वह शून्य में निहार रहा था। महिला कंडक्टर की बात का जवाब नहीं देती। बस शून्य में निहारती रहती है। कंडक्टर अबकी बार कुछ जोर से उससे कहता है, ‘अरी, कहां जाना है, बता तो सही?’ महिला अबकी बार भी कोई जवाब नहीं देती। कंडक्टर झुंझला जाता है। वह उसे पकड़कर झिंझोड़ना चाहता है, लेकिन उसके गंदे कपड़े देखकर ठिठक जाता है। इस बीच अन्य मुसाफिर भी उसकी ओर मुतवज्जह हो जाते हैं। एक महिला उपहास के स्वर में कहती है, ‘बताओ कैसीऔरत है, जवाब ही नहीं देती है।’ इतना कहकर वह ठहाका मारकर हंस पड़ती है। इस बात का भी कोई असर महिला पर नहीं होता। वह लगातार शून्य में देखे जा रही है। कंडक्टर ड्राइवर से बस रोकने के लिए कहता है। बस साइड में रूक जाती है। बस रूकते ही मुसाफिरों में बैचेनी होने लगती है। उन्हें लग रहा था कि महिला की वजह से उन्हें देर हो रही है। एक मौलाना कंडक्टर से नाराजगी से कहते हैं, ‘अरे यार इसे नीचे उतारो, इसकी वजह से सब लेट हो रहे हैं।’ मैं मौलना से कहता हूं, ‘मौलाना इतना नाराज क्यों हो रहे हो, पता नहीं कौन है ये? एक बार फिर पूछ लो, इसे कहां जाना है, आफिस के लिए तो मैं भी लेट हो रहा हूं?’ मौलाना तल्खी से कहते हैं, ‘तुम्हें इतना तरस आ रहा है, तो तुम्हीं पूछ लो, इसे कहां जाना है।’ मैं उसे झिंझोड़कर बार-बार उसके बारे में पूछता हूं, लेकिन वह टस से मस नहीं होती। बस उसके चेहरे पर दर्द भरे भाव आते हैं। उसकी आंखों में बेबसी और लाचारी साफ झलक रही है। मौलाना के सब्र का पैमाना छलक जाता है। वह बहुत ही तल्खी से कंडक्टर से महिला को नीचे उतारने का आदेश देते हैं। कंडक्टर कुछ हिचकिचाता है। शायद उसके दिल में महिला के प्रति कुछ हमदर्दी है। थोड़ी देर में सब मुसाफिर उसे नीचे उतारने के लिए कंडक्टर पर जोर देने लगते हैं। कंडक्टर उसे जबरदस्ती बस से उतार देता है। उसकी पोटली सड़क पर पटक दी जाती है। बस चल दी है। महिला जाती हुई बस की तरफ देखती भी नहीं। वह गुमसुम पोटली उठाकर चारों तरफ देखने लगती है। धूप और ज्यादा तीखी हो गई है। शायद कोई साया तलाश करने लगी है। मुसाफिरों के चेहरों पर संतोष के भाव उभर आए हैं। मौलाना विजयी मुस्कान के साथ बस में चारों तरफ नजर दौड़ाते हुए जेब से मोबाईल निकालकर उसमें वक्त देखते हुए बड़बड़ाते हैं, ‘इस औरत की वजह से पूरे पंद्रह मिनट लेट हो गए हैं।’

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